शुक्रवार, 16 मार्च 2012

जन्मदिन मुबारक हो दादू


बीस हजार की आबादी वाला नगरीय संस्कृति को आत्मसात करता एक अर्धविकसित एक कस्बा ..  पद्मनाभपुर ! महाराज भीखम सिंह कस्बे के मालगुजार हैं ! विरासत में पुरखों ने इतनी सम्पत्ति छोड़ रखी है कि सात पुश्तों तक कुछ काम करने की आवश्यकता ही नहीं ! अतीत की वैभव से आज भी दमकती शानदार हवेली ! हवेली के  सामने दस एकड़ में फैली फूलों की बगिया, सैकड़ों वफादार नौकरचाकर, दिन रात सेवा में इस कदर तत्पर है कि उनका वश चलता तो ईश्वर से महाराज की सारी तकलीफें अपने लिए माँग लेते, और हों भी क्यों न ?  इतना सबकुछ होने के बावजूद महाराज में तिल मात्र का भी अहंकार नहीं ! नौकर-चाकरों को परिवार के सदस्यों सा स्नेह, प्यार, दुलार दिया करते हैं ! उनके हर सुख-दुख में, रीति रिवाजों में छूआछूत, भेदभाव भूलकर स्वयं सम्मिलित होते हैं ! 

अभी पिछले दिनों ही महाराज ने कस्बे की तीन दलित निर्धन कन्याओं के विवाह का सारा खर्च उठाया था ! विवाह भी ऐसी शानदार और शाही कि आसपास के सारे छत्तीस गाँवो के लोगों ने देखा और मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की ! महाराज ने खुद बारातियों का स्वागत किया और पूरे समय ऐसे व्यस्त रहे जैसे उनके स्वयं की बिटिया की शादी हो ! सारा कस्बा उन्हे भगवान की तरह पूजता था ! वे लोगों के लिए थे भी दयानिधि ! सारा जीवन लोगों के दुखदर्द बाँटने और पीड़ा हरने में निस्वार्थ भाव से समर्पित था !

महाराज भीखम सिंह शरीर से भले ही पतले दुबले कृशकाय हों लेकिन चेहरे में ऐसी दबंगता और गंभीरता की लोग सम्मान के साथ साथ भय भी खाते थे ! किसी की हिम्मत नहीं थी कि उनके सामने नजरें उठाकर जबान चलायें ! अजीब शख्सियत थी उनकी इतने उदार होने के बावजूद भी कभी किसी से विनोद या हास परिहास नहीं करते थे ! शायद यही कारण है कि लोग उनसे खौफ भी खाते थे !

लेकिन इससे उलट गाँव के बच्चों का सबसे प्रिय पात्र अगर कोई था तो वो महाराज ही थे ! बच्चे उनकी धोती भी खींचकर भाग जाते थे लेकिन वो गुस्सा होने के प्रयास में असफल हो जाते और चेहरे पर दुर्लभ सी हँसी आने से नहीं रोक पाते ! बच्चों के सामने वे खुद को असहाय पाते थे ! सारी रौबदारी यूँ गायब हो जाती जैसे उषा की किरणों को पाकर फूल पर से ओस की बूँदे ! 

इतना वैभव होने के बावजूद भी महाराज की आँखों में हरदम एक अजीब उदासी छाई रहती है लेकिन कभी वे उसे जाहिर नहीं करते ! इसका कारण भी सभी को पता था ! उनकी बगिया में पूरी दुनिया के सारे किस्म के फूल होने के बावजूद उनके अपने जीवन बगिया के आँगन में कोई नन्हा फूल नहीं था ! विवाह के बाईस वर्ष बाद भी उनकी गोद सूनी थी ! इतने सम्मान, उपाधियों के बावजूद उन्हे पिता कह कर पुकारने वाला कोई नहीं था ! यही गम उन्हे अंदर ही अंदर दीमक की तरह खाये जाती थी !

धीरे धीरे उन्होने इसे नियती मानकर कस्बे के बच्चों में अपनी खुशी ढूँढने लगे थे ! शायद यही कारण था कि बच्चों के आगे उनकी सारी गंभीरता, सारी दबंगई गायब हो जातीं और वे खुद बच्चों से हार जाने में अपनी जीत समझते थे ! सारे बच्चे उन्हे बाबा कहकर पुकारते थे और यही वो शब्द था जिसके कारण उनकी साँसे चल रही थी वरना जीने का और कोई मकसद तो बचा नहीं था !  तमाम अच्छाईयों के बावजूद महाराज की सबसे बड़ी कमजोरी थी उनके बागीचे के फूल ! मजाल है कोई सपने में भी उनके बागीचे के फूलों को हाथ लगाकर देखे !

महाराज का सबसे विश्वस्त और वफादार नौकर है रामू काका, जिसने महाराज को बचपने में गोद में खिलाया है ! महाराज उसे बहुत सम्मान करते थे और रामू काका इस बुढ़ापे में भी अपना भरा पूरा परिवार छोड़कर महाराज की हवेली में ही रहता और महाराज की देखभाल करता ! रामू काका का एक नाती भी है हरिया ! हरिया रोज सुबह अपने घर से हवेली आ जाता और फिर यहीं खेलता फिर स्कूल जा कर पुन: स्कूल से हवेली आकर देर शाम तक रहता ! रात उसके पिता आकर उसे जबरदस्ती ले जाते ! जाता भी क्यूँ पूरी हवेली में वो ही अकेला शख्स था जिसे महाराज के किसी भी निजी सामान को भी छूने, तोड़ने, फेंकने की इजाजत थी ! पूरे समय धमाचौकड़ी मचाता ! मजाल है कोई महाराज के सामने उसे टोक दे !

पूरी दुनिया में हरिया ही वो एकमात्र शख्स है जो महाराज को दादू कहता था और महाराज उसे हरी कह पुकारते थे ! उसी ने महाराज के धोती खींचने की परम्परा भी प्रारंभ की थी ! उसका दैनिक नित्यकर्म था महाराज की धोती खींचना या पीछे से कान मरोड़ना ! महाराज उसे पकड़ने दौड़ायेंगे, वो भागकर बागीचे में जाकर घुस जायेगा और फिर फूल तोड़ने की धमकी देगा ! महाराज उससे फूल ना तोड़ने और बाहर निकलने की मनुहार करेंगे फिर इसके लिए सौदेबाजी होगी ! हरिया को कुछ पैसे मिलते फिर वो स्कूल जाता ! हरिया महाराज की इस फूल ना तोड़ने वाली कमजोरी से भली भाँति परिचित था इसलिए उसे जब-जब जेबखर्च चाहिए होता वो इसी तरह बागीचे में फूल तोड़ने की धमकी देकर महाराज को ब्लैकमेल करता था !

रविवार का दिन है ! आज एक अनहोनी हो गई ! पूरी हवेली में अजीब सी बैचैनी और खामोशी छाई हुई है ! यूँ लग रहा था जैसे कोई सूनामी आकर चली गई हो ! शाम को महाराज को अपने बगीचे में टहलते समय पौधों की डालियों से कुछ फूल गायब दिखे ! टहनियाँ साफ साफ चुगली कर रही थीं कि किसी ने वहाँ से फूलों को चुराया है ! खबर कस्बे में जंगल की आग की  तरह फैल गई !

आज हरिया भी धोती खींचकर अपनी वसूली करने नहीं आया था ! किसी ने आकर बताया हरिया ने ही बागीचे से फूल तोड़ा है ! महाराज क्रोध से ऐसे आग बबूले हो उठे थे जैसे जमीन फट कर आसमान को निगलने वाली हो ! “हरिया जहाँ भी हो फौरन पकड़ कर मेरे सामने लाओ” महाराज ने चीखते हुए आदेश दिया !

पहली बार महाराज ने हरिया को हरी ना कह हरिया कहा था ! रामू काका ने हरिया को महाराज के सामने पेश किया ! हरिया के दोनो हाथ पीछे की ओर छुपे हुए थे ! उसे अचानक सामने देख महाराज अपना आपा खो बैठे और बिना कुछ बोले उसके गालों पर तड़ातड़ कई थप्पड़ जड़ दिये ! हरिया के गालों में महाराज के उँगलियों के निशान यूँ उभर आये जैसे किसी जलजले के बाद मलबा दिखाई देता हो ! हाथों ने थक कर जब और प्रहार करने से इंकार कर दिया तो बदहवास से चीख कर बोले “बता तेरी इतनी हिम्मत कैसे हुई मेरे फूलों को छूने की”

सारा कस्बा हवेली में जमा था लेकिन सन्नाटा यूँ पसरा हुआ था जैसे कोई वीरान बियाबान हो ! हरिया ने सिसकते हुए अपने दोनो हाथ आगे कर उन्ही फूलों का गुलदस्ता महाराज की ओर बढ़ाया जिसे उसने तोड़ने का दुस्साहस किया था और काँपते होंठों से कहा ......   “ जन्मदिन मुबारक हो दादू ”  

इतना सुनते ही महाराज को लगा जैसे उन पर कोई बज्रपात हुआ हो ! जोर से चीख कर बस इतना ही कहा मुझे अकेला छोड़ दो ! अगले ही पल हरिया समेत पूरा कस्बा वहाँ से जा चुका था !

रात घिर आयी थी ! हवेली की बाहरी बत्तियाँ भी आज नहीं जली थी ! रामू काका भोजन के आमंत्रण हेतु महाराज के कमरे में दाखिल हुआ ! दरवाजा पहले से ही खुला हुआ पर महाराज अपने कक्ष में नहीं थे ! उन्हे ढूँढते हुए बागीचे की ओर निकल पड़ा ! पूर्णिमा की चाँदनी बागीचे में फैली तो हुई थी पर दूर से कुछ साफ साफ नजर नहीं आ रहा था !
रामू काका जब बागीचे के निकट पहुँचा तो अचानक उसके मुँह से चीख निकल आयी ! उसकी चीख सुनकर पूरी हवेली इकठ्ठी हो गई !

बाहर आँगन की बत्तियाँ जलाई गईं तो देखा सारा बागीचा तहस नहस पड़ा हुआ है ! सारे पौधे किसी ने उखाड़ फेंके थे ! बागीचे के बीचोंबीच बने फव्वारे पर महाराज अर्ध चेतन से गिरे हुये है ! पास जाकर देखा तो उनके हाथों में हरिया का वही गुलदस्ता, आँखों में अश्रु की अविरल धारा बह रही हैं और सांसे उखड़ती चली जा रही थी ! रामू काका ने उनका सिर अपनी गोद में उठाया और धीरे से पुकारा “महाराज” ! किसी तरह महाराज ने आँखे खोलीं और कहा “ हरी कहाँ है ” ! हरिया उनके पास ही खड़ा था, सामने आया तो महाराज ने उसे जोर से भींच कर छाती से लगाया और कहा “हो सके तो अपने इस बेरहम दादू को मॉफ कर देना मेरे लाल ” !  हरिया कहता भी क्या, इतनी छोटी सी उम्र में भी उसे अपने गालों पर पड़े निशानो की कीमत का पता चल गया था ! उसके आँख से सुबह की मार के आँसू अब बह रहे थे पर जो कीमत उसे इस मार के बदले मिली थी उसके लिए वो रोज ऐसी मार खाने के लिए मन ही मन ईश्वर से याचना कर रहा था !

अजीब नजारा था दोनों की आँखो से अविरल अश्रु बह रहे थे और दोनो ही एक दूसरे को ना रोने की समझाईश दे रहे थे ! और दोनो की ये स्थिति देखकर पूरी हवेली के लोग रो रहे थे ! पर सभी के आँखों में वही आँसू थे जो कमोबेश अत्यधिक खुशी के क्षणोँ में अनायास ही सबके ये वहीं आँखों से निकल आते हैं !

सभी ने समवेत स्वर में कहा " जन्मदिन की बधाई हो महाराज "  

शनिवार, 10 मार्च 2012

मिडिया इवेंट - राईट टू रिकाल


खबरिया चैनलों की बाढ़ और फिर उनका चौबीस घंटे प्रसारण ! आधे घण्टे के समाचार को कितना भी लम्बा  खींच लें 24 घण्टा तो हो नहीं सकता फिर उबाऊ और बोरियत भरी खबरों को सुनसुन कर दर्शकों का टोटा होगा ! TRP घटेगी तो विज्ञापन के लाले पड़ेंगे मतलब साफ है अर्थ व्यर्थ सब अनर्थ ! इसलिए खबरों का चटपटा और मसालेदार होना जरूरी है ! ऐसी ही मसालेदार खबरों के लिए कच्चा माल सप्लाई करने वाला यूपी चुनाव अब बीत चुका है !

मीडिया का दुर्भाग्य कि समाजवादी पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिलने के कारण विधायकों की “मण्डी लाईव” कार्यक्रम आयोजित नहीं हो पाया और एक बड़ा मिडिया इवेंट बनते बंमते रह गया ! किसी के साड़ी पहनने और बच्चों को चुनावी खबर बनाकर परोसने वाली जागृत मिडिया पर ये किसी कठोर वज्रपात से कम नहीं है ! कितनी तैयारी करवाई थी ! एजेंसियों से एक्जिट पोल कराया फिर हन्ग असेम्बली का ब्रह्म भविष्यवाणी किया !  सोचा तो यही था विधायक यहाँ वहाँ हगते फिरेंगे और वे नत्था के जैसे उन्हे पीपली लाइव कव्हर कर सनसनी फैलाकर TRP बटोरेंगे लेकिन हाय री अभागी किस्मत और धोखेबाज जनता , तूने स्पष्ट बहुमत देकर सुहागन मीडिया को भरी जवानी में ही विधवा ही कर दिया !

पाँच राज्यों के चुनावों विशेषकर उत्तरप्रदेश के बाद अचानक आये इस मिडिया सूनामी जलजले से कार्पोरेट मीडिया की TRP तबाह हो गई और अर्थव्यवस्था मंदी के दौर से गुजर रही है !  उसे इस मंदी से उबरनेके लिए बेल आऊट पैकेज में किसी बड़े इवेंट की जरूरत है और इस राष्ट्रहित के नेक कार्य में अन्ना हजारे से बड़ा प्रिमीयम प्रोडक्ट और कौन हो सकता है ? इसलिए अन्ना के आंदोलन से जनता को उत्सुकता ना हो लेकिन मिडिया इस चंदामामा की तरफ चकोर बन रेगिस्तान के प्यासे की तरह टकटकी लगाये देख रही है ! कई अनुष्ठान किये जा रहे होंगे कि अब इस नये तमाशे राईट टू रिकाल में भीड़ का टोटा ना पड़े और हाऊस फुल  शो बन हिट हो जाय तो फिर TRP संजीवनी से नया जीवनदान  मिल जाये ! 

इस नये खेला के लिए अभी मेगा प्रोजेक्ट तैयार हो रहा है, बस बच्चों की बोर्ड परीक्षायें खत्म हो जायें फिर देखिये नया खेला “तू चोर मैं सिपाही”
रोजाना 24 घंटे बार बार लगातार राईट टू रिजेक्ट बिल ! टाईम टेबल भी बन गया है और कालखण्ड का विभाजन पूर्व की तरह ही किया गया है ..  6 घण्टे अन्ना के लिए ( जिसमें नित्य क्रिया
, शौच आदि के कार्यक्रम सम्मिलित है ) , 3 घण्टा केजरी किरण स्पेशल,  3 घण्टा दिग्गी और मनीष का मिकी माऊस शो  2 घण्टे संजय झा, शाजिया इल्मी का डोनाल्ड डक एक्स्पर्ट कामेंट्स और 10 घण्टा मेरी साड़ी उसकी साड़ी से सफेद कैसे वाले विज्ञापन ! सब पहले से फिक्स है !


इन सब चक्करों से इतर इतना समझ लें जन आंदोलन किश्तों में और मिडिया में नहीं होता ! लेकिन बिना जाने बूझे और समझे इसे पढ़ते ही अन्नावादी फाईनेंसियल इरेग्यूलर लोग राशन पानी लेकर चढ़ जायेंगे ! लानत मलामत की बौछार होगी और चीख चीख कर कहेंगे  मिस्टर महापात्र तुम्हारी सोच गंदी है
, कलम का दुरूपयोग करते हो, अपनी हरकतों से बाज आओ, तुम भ्रष्टाचार समर्थक हो ! कुछ उच्च कोटी के गालियों का भी गुफ्तार करेंगे लेकिन हम ठहरे उँगलबाज, आदत है उँगली करते ही रहेंगे ! लेकिन बुध्दजीवियों से अपेक्षा है क्लोरोमिंट खायें दिमाग की बत्ती जलायें क्योंकि ये सिर्फ जुबान पर लगाम लगाता है उँगलियों पर नहीं :):):)

शुक्रवार, 2 मार्च 2012

फुरसतनामा: विशेषाधिकार और अवमानना

फुरसतनामा: विशेषाधिकार और अवमानना:निवेदन - इस लेख हेतु मुझे कोई विशेषाधिकार हनन का नोटिस मिलता है तो अन्ना की टीम की तरह आर्थिक और कानूनी मदद देने को तैयार रहें ! इतना तो आपका नैतिक दायित्व बनता ही है !! JJJ !! 

विशेषाधिकार और अवमानना

यूँ तो अरविंद केजरीवाल ने जो सांसदो  के लिए बयान दिया उससे मैं निजी तौर पर सहमत नहीं हूँ परंतु यदि इस बयान को संसद की छत्र छाया में निवास करने वाले देश के रहनुमाओं और कुछ तथाकथित बुध्दजीवियों ने लोकतंत्र का अपमान और संसद की अवमानना बताया !

केंद्रीय केबिनेट में मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने स्तुतिगान क्षमता की चरमस्थिति को प्राप्त कर अपने कोयला मंत्रालय के नाम के अनुरूप एक सार्वजनिक चुनावी सभा में बयान दिया कि राहुल गाँधी जब चाहें तो रात के बारह बजे भी प्रधानमंत्री बन सकते हैं उन्हे कोई भी नहीं रोक सकता !


उनके इस बयान की समवेत स्वरों में उतनी तीखी आलोचना नहीं हुई जितनी केजरीवाल के बयान की हुई ! इस बयान के पीछे उनकी मूलभावना क्या है ये तो वही बता सकतें हैं लेकिन यदि केजरीवाल के बयान पर उनकी मूल भावनाओं को त्यागकर आलोचना हो रही है तो मेरी नजर में श्रीप्रकाश जायसवाल का ये बयान उससे भी बड़ा लोकतंत्र अपमान और संसद की अवमानना है !

मेरी अल्पबुध्दि के ज्ञान से भारतीय संविधान के अनुसार प्रधानमंत्री लोकसभा के बहुमत दल का नेता होता है और उसे लोकसभा में स्पष्ट बहुमत प्राप्त होता है अर्थात यद्यपि तकनीकि रूप से प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है किंतु संविधान मूल भावना यह है कि लोकसभा के आधे से अधिक सदस्य अपने स्वविवेक और संसदीय क्षेत्र के प्रतिनिधी के तौर पर जिसे चुने वही प्रधानमंत्री होना चाहिए !

श्रीप्रकाश जायसवाल के अनुसार यदि राहुल गाँधी जब भी चाहें प्रधानमंत्री बन सकतें है तो इसका सामान्य अर्थ ये हुआ कि उनको ही व्यक्तिगत रूप से लोकसभा में बहुमत प्राप्त है, वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को नहीं अर्थात जायसवाल जी की माने तो क्या मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बने रहने का कोई नैतिक अधिकार है ? क्या वे देश के क्षद्म प्रधानमंत्री नहीं हुए ? या फिर लोकसभा के बहुमत सदस्य राहुल गाँधी को प्रधानमंत्री के तौर पर देखना चाहते हैं किंतु राहुल गाँधी ने लोकसभा के सांसदों के समर्थन को अपनी इच्छा से दिशा परिवर्तित कर स्वेच्छा से मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया हुआ है अर्थात मनमोहन सिंह लोकसभा के सदस्यों के समर्थन से नहीं किसी एक व्यक्ति विशेष की इच्छा पर प्रधानमंत्री बने हुए हैं !

क्या ये भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था और संविधान का सीधा अपमान नहीं है ? क्या इसे संसद के अवमानना के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए ? और तो और किसी का रात के बारह बजे प्रधानमंत्री राष्ट्र पर संवैधानिक संकट या वर्तमान प्रधानमंत्री के साथ अचानक किसी अनहोनी घटना होने पर ही होता है ! इसका अर्थ भी ये लगाया जा सकता है कि बकौल जायसवाल राहुल गाँधी कभी भी संवैधानिक संकट पैदा करने की ताकत रखते हैं !

इससे ये कयास बिल्कुल भी ना लगायें कि राहुल गाँधी ऐसा करेंगे क्योंकि ये सारी संभावनायें जायसवाल के बयान पर निर्मित हो रहीं है राहुल गाँधी से इसका कोई सम्बंध नहीं !

श्री जायसवाल का बयान इन अर्थों में भी गंभीर है कि ये बयान प्रधानमंत्री के केबिनेट का ही एक मंत्री दे रहा है अर्थात उसे अपने ही केबिनेट मुखिया पर यकीन नहीं कि उसे सही मायनों में बहुमत प्राप्त है ! क्या इसे संसद का अपमान नहीं  कहा  जा सकता ? क्या यह संविधान की मूल भावना और एक संवैधानिक पद प्राप्त प्रधानमंत्री की विश्वसनीयता पर हमला नहीं है ? क्या भारतीय नागरिकों के मूल अधिकारों से इतर सांसदो और मंत्रियों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हेतु संविधान में पृथक से विशेष अधिकार प्राप्त है ?  

इस पर और भी कई गंभीर सवाल किये जा सकते हैं लेकिन मैं सांसद या मंत्री नहीं अत: शायद मुझे अवमानना की अपराधी ठहराया जा सकता है अतएव आप श्री जायसवाल के बयान के संदर्भ में इन बातों पर स्वयं चिंतन कर निर्णय लें कि क्या ये संसद और लोकतंत्र का स्पष्ट अवमानना और अपमान नहीं है ?

निवेदन -  इस लेख हेतु मुझे कोई विशेषाधिकार हनन का नोटिस मिलता है तो अन्ना की टीम की तरह आर्थिक और कानूनी मदद देने को तैयार रहें ! इतना तो आपका नैतिक दायित्व बनता ही है  !!  JJJ !!  


नोट – कृपया चंदा देने के इच्छुक मैसेज बाक्स का प्रयोग करें! आयकर वालों की पैनी निगाह बनी रहती है !!JJJ!!
  




बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

मोमबत्ती की हाय हाय और चंदामामा की जय


कल दिनभर दुनिया की खबरों से जुदा रहा ! रात घर लौटा तो जिज्ञासा हुई कि जरा देखूँ दिन भर क्या घटा ! टीवी चालू करते ही वही चार भाँड जो कल तक टीम इंडिया को पानी पी पीकर कोस रहे थे आज वही लोग महिमा मंडन में लगे हुए थे! इन भाँडों पर मुझे व्यक्तिगत रूप से कोई दिलचस्पी नहीं अतएव मैं बाकी खबरों के लिए चैनल बदलने लगा ! आजकल समाचार चैनल भी किसी चुनाव में खड़े प्रत्याशियों की संख्या से ज्यादा हैं लेकिन दोनों में एक समानता तो है, विकल्प की पूरी फौज है पर योग्य कोई नहीं ! सो लोकतंत्र के प्रति अपने कर्तव्य का पालन करने की मजबूरी जैसे जो सबसे कम भँडवा चैनल है उसका चयन कर सही खबर की तलाश करता रहता हूँ !

 
खैर जाने दें मुख्य मुद्दे पर आतें है ! खबरों की तलाश करते हुए मुझे दो खबरें महत्वपूर्ण लगी ! पहली खबर अगस्त 2011 में हुए भोपाल की
RTI एक्टिविस्ट शहला मसूद की हत्या के सीबीआई जाँच की उपलब्धि और दूसरी अरविंद केजरीवाल का मतदान न कर पाना !


पहली खबर इस दृष्टि से महत्वपूर्ण थी कि सीबीआई ने आज दो लोगों को इस सिलसिले में गिरफ्तार किया जिसमें भोपाल की ही एक सफल इंटीरीयर डिजानर जाहिदा परवेज को मुख्य आरोपी बताया जा रहा है ! समाचार चैनलों के अनुसार सीबीआई ने ये पाया है कि जाहिदा परवेज ने शहला मसूद की हत्या के लिए सुपारी दी थी और जाँच का दबाव बढ़ने पर उसने कांट्रेक्ट किलर की भी कानपुर में हत्या करवा दी ! उसे शक था कि शहला मसूद की उसके पति के साथ नाजायज सम्बंध थे ! ये तो न्यायालय तय करेगा कि इसमें कितनी सच्चाई है और कौन दोषी ! लेकिन प्रारंभिक अनुसंधान से एक बात तो साफ हो गई कि इस हत्या में किसी भ्रष्ट नेता या सरकारी पदासीन लोगों का हाथ नहीं ! मुझे अच्छे से याद है उन दिनों रामलीला के खेत में अन्ना का गन्ना पुरे हरियाली के साथ लहलहा रहा था और इस फसल से अतिरिक्त रूप से उत्साहित पंजीकृत मोमबत्ती ब्रिग्रेडी मानवधिक्कारी चंदामामा के सेक्यूलर भांजे भांजियाँ शहला मसूद के मामले में चीख चीख कर ध्वनि प्रदुषण कर रहे थे कि भगवा पार्टी के नेताओं ने अपने भ्रष्टाचार से बेनकाब हो जाने के डर से उसकी हत्या की है ! लेकिन इनका असली मकसद किसी समाज की भलाई नहीं वरन सदैव किसी भी मामले को अपने फायदे हेतु मोमबत्ती जलाकर एक सुर में कोलावरी श्यापा गाने और अपनी दुकानदारी चमकाकर चंदे बटोरना है ! इनके इसी असली मकसद को आम लोगों को समझकर बेनकाब करने की जरूरत है !



दूसरी खबर स्वघोषित सत्यनिष्ठ हरिशचंद्रवंशी महामना अरविंद केजरीवाल का है ! उन्होने मिडिया में अपने मतदान ना कर पाने की गमगीन दासतां इस तरह सुनाई कि अन्नावादियों के आंसूओं से सूखी नदी में बाढ़ आ जाये !  मतदाता सूची में नाम ना होने के कारण आज मतदान से वंचित केजरीबाबू ने बड़ी चालाकी से मामले को नया रंग दिया और कहा कि मतदाता सूची में नाम ना होना प्रशासन की गलती है ! जब उनसे पूछा गया कि आपने नेट पर अपना नाम पहले चेक क्यों नहीं किया तो किसी स्कूली बच्चे जैसा बड़े भोलेपन से कहा मेरे पास वोटर आईडी कार्ड है और मेरा नाम हमेशा रहता ही है इसलिए मैंने सोचा कि आज भी मेरा नाम वोटर लिस्ट में होगा ! मतदाताओं को जागृत करने निकले इस स्वघोषित युगपुरूष को ये भी नहीं पता कि चार साल पहले वोट दिये जाने के बाद कई बार मतदाता पुनरीक्षण का कार्य किया गया होगा और सम्भवत: उनका नाम काट भी दिया गया होगा क्योंकि चंदा मामा की खोज में ये तो हमेशा घर से बाहर स्टेशन पर ही सोता है !



लेकिन ये मुद्दा बहस का विषय नहीं है ! इसी बीच किसी उँगलीबाज टाईप के पत्रकार ने सवाल दाग दिया कि आप तो गोवा जाने के लिए बिना मतदान किये ही एयरपोर्ट पहुँच गये थे फिर वापस कैसे आये ! लोगों को गुमराह करने वाला ये महान शख्स इस मामले में बड़ा ही अनुभवी और योग्य है ! इस सवाल पर उसने जो कहा उससे तो भारत रत्न की दावेदारी बनती है ! उसने बड़ी चालाकी से मिडिया से कहा एयरपोर्ट जाते समय मेरी अंतरात्मा ने कचौटा और मुझे काफी गिल्टी फील हो रही थी इसलिए एयरपोर्ट पहुँच कर मैने आयोजकों से कार्यक्रमों को रद्द करने को कहा और वोट डालने आ गया !





लेकिन असलियत कुछ और थी ! एयरपोर्ट जाने से पहले एक मिडिया चैनल ने उससे सवाल किया था कि आप वोट डाले बिना कैसे गोवा जा रहें है तो उसने बड़ी बेशर्मी से मुस्कुराते हुए जवाब दिया अरे यार जाने दो पोलिंग बूथ पर काफी लम्बी लाईन होगी और मैं वोट डालने गया तो गोवा जाने में लेट हो जाऊँगा ! मतलब साफ है उसके लिए वोट डालने से ज्यादा जरूरी है भाषण देना और लोगों को मतदान हेतु जागृत करना ! उसकी अंतरात्मा गिल्टी फील नहीं की बल्कि उसने अपने क्षद्म मीडिया इमेज के खराब होने के डर ने अपना रूख एयरपोर्ट से वापस पोलिंग बूथ की ओर मोड़ा और उसे भी अपने महान चरित्र के महिमा मण्डित करने का जुगाड़ वापस आते आते सोच लिया ! वाह रे केजरी अगर इतनी गिल्टी थी तो एयरपोर्ट गया ही क्यूँ ? घर से ही फोन क्यूँ नहीं कर लिया और अपने उस रिकार्डेड बयान का क्या जबाब देगा जिसमें तुमने बेशर्मी से कहा लाईन में खड़ा होकर वोट देने से तुम गोवा जाने में लेट हो जाओगे इसलिए वोट देने नही जा रहे !

मैं भी चाहता हूँ कि केजरी जैसा महान बनूँ और देश को जगाऊँ ! इस हेतु सोचता हूँ गोवा जाकर "मत" दाताओं को जाग-रूक करूँ ! क्या कोई दानदाता सीता के राम जैसा जिंदादिल है जो मेरे गोवा आने-जाने के फ्लाईट का किराया और किसी बीच के किनारे बने रिसोर्ट में मेरे पीने-खाने तथा सोने के इंतजाम बावत खर्चे के लिए चंदा दे ! मैं दिन भर समुद्री तट पर और रात भर घर घर घुसकर लोगों को जगाऊँगा ! मुझे तो एवार्ड भी नहीं चाहिए !

मैंने अपनी जिंदगी में खुद आराम से गहरी नींद में सोते हुए "जागते रहो" का बाँग लगाने वाला ऐसा गोरखा पहली बार देखा ! केजरी सा'ब जी आपकी टीम अन्ना के लिए नया नारा दे रहा हूँ  “जागते रहो और हमारे भरोसे मत रहो”

.....................  चंदा मामा की जय ................ सीताराम जिंदलबाद !

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2012

द अन्ना रिटर्न ....



25 लाख का सीतारम जिंदल एवार्ड प्राप्त करने के बाद किशन बाबू राव हजारे उर्फ अन्ना ने घोषणा की है कि वे पूरे देश में लोकसभा चुनाव 2014 को ध्यान में रखते हुए नई रणनीति बनाकर फिर से देश व्यापी जन आंदोलन करेंगे और इस बार मुद्दा होगा “राईट टू रिजेक्ट” ! लेकिन क्या उन्हे इस बात का खयाल है कि अपने पहले किये गये जनलोकपाल का आंदोलन सफल हो गया ?? क्या एक अच्छा लोकपाल कानून बन गया ??

लेकिन कार्पोरेट टीम अन्ना का इससे क्या मतलब है ! उन्हे तो अपनी दुकानदारी चलानी है ! अब शायद जन लोकपाल वाले धंधे में फायदा नहीं रह गया ! इसलिए ताजा एक वर्ष का एसाईनमेंट लेकर नया धंधा चालू करने की सोच रहे है और ये चलेगा मार्च – अप्रेल 2014 तक ठीक आम चुनावों के एक दो माह पूर्व तक ! अबकी बार शायद उन्हे ठण्डी नहीं लगेगी ! मार्च अप्रेल की गर्मी में अबकी उन्हे लू लग जायेगी और डाईरिया हो जायेगा फिर किसी पद्मविभूषण डॉक्टर की चिकित्सकीय सलाह पर तीन महिने आराम करने की सलाह !

जनता को ऐड़ा समझकर पेड़ा खाने वाले कार्पोरेट अनशनकारियों .. ध्यान रहे जन समर्थन का रिशेसन कहीं राईट टू रिजेक्ट बिल की जगह राईट टू रिजेक्ट अन्ना पारित ना कर दे और टीम अन्ना प्राईवेट लिमिटेड को मुँह छिपाने को बिल तलाश करना पड़े ! तब क्या देश से माल्या की तरह बेल आऊट पैकेज की माँग करोगे ?????

बात अन्ना विरोधी होने की नहीं  .. मैंने आज अन्ना का बयान सुना .. उन्होने कहा 2014 चुनावों को ध्यान में रखते हुए नये सिरे से रणनीति बना एक नया आंदोलन "राईट टू रिजेक्ट" की घोषणा की ??  प्रश्न ये उठता है क्या लोकपाल कानून आ गया और क्यूँ हर बार एक नये चुनाव को ध्यान रखते हुए कार्पोरेट टीम अन्ना एक नई रणनीति बनाती है .... जरा सोचें और अपनी अकल लगायें ... वरना मैं भी अन्ना तू भी अन्ना करने से देश में कोई परिवर्तन आने वाला नहीं ....  आप भारत माता की जय चिल्लाते रहें और आपके कंधे पर चढ़कर कार्पोरेट टीम अन्ना यूँ ही सीताराम जिंदलबाद करती रहेगी !
बंदा.... मात्र ..... रम ........ सीताराम जिंदलबाद ..

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

परम्परा की बासंतीफुहार फागुन मड़ई

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 388किमी दूर दक्षिणी छोर पर स्थित जिला मुख्यालय दंतेवाड़ा के शंकिनी डंकिनी नदियों के संगम स्थल पर विराजित माँ दंतेश्वरी देवी का प्रसिध्द ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक प्राचीन शक्तिपीठ ।
 

इसी अधिष्ठात्री माँ दंतेश्वरी की छत्रछाया में आयोजित होता है दंतेवाड़ा का प्रसिध्द फागुन मंड़ई । बसंत ऋतु में आगमन पर सम्पूर्ण जनजीवन फागुन मंड़ई के सम्मोहन में बंधकर इस संगम पर इकठ्ठा हो जाता है ।


ऐसी मान्यता है कि शक्ति स्वरूपा माँ सती के इस स्थान पर दाँत गिरने के कारण इस देवी का नाम दंतेश्वरी एवं स्थान का नाम दंतेवाड़ा पड़ा । बस्तर महाराजा अन्नम देव ने इस शक्तिपीठ का निर्माण तेरहवीं शताब्दी में करवाया । आदिवासी लोक संस्कृति , परम्पराओं एवं मान्यताओं को जीवित रखने हेतु राजा पुरूषोत्तम देव ने फागुन मंड़ई की शुरूआत कराई ।


फागुन मंड़ई के नाम से विख्यात इस वासंतिक पर्व की औपचारिक शुरूआत बसंत पंचमी के दिन मंदिर के प्रांगण में त्रिशूल स्तम्भ गाड़कर एवं माई जी के छत्र पर आम बौर चढ़ाकर की जाती है तथा फागुन मास के अंतिम दस दिनों में आयोजित होने वाला आदिवासी समाज की पारम्परिक देवभक्ति, आदिवासी संस्कृति, लोक नृत्यों का यह उत्सव अपने चरम पर होता है।


मंदिर के सामने स्थित मैदान मेंडका डोबरा में माँ दंतेश्वरी की कलश स्थापना के साथ ही इस उत्सव का शुभारंभ होता है जिसमें बस्तर संभाग एवं उड़ीसा के नवरंगपुर जिले के सभी देवी देवताओं को आमंत्रित किया जाकर सहभागी बनाया जाता है !


इस वर्ष यह आयोजन फाल्गुन शुक्ल षष्ठी संवत 2068 तदनुसार दिनांक 28/02/12 से 09/03/12 तक निर्धारित है ।


कलश स्थापना के दूसरे दिन ताड़फलंगी धुवानी विधान सम्पन्न किया जाता है जिसका अर्थ होता है ताड़ वृक्ष के पत्तों को धोना । ताड़ के इन पत्तों को माता तरई (माता का तालाब) में धोकर होलिका दहन के लिए सुरक्षित रखा जाता है । इस बीच माई जी की पालकी प्रतिदिन सायं मंदिर से नारायण मंदिर के लिए निकाली जाती है तत्पश्चात पुनः मंदिर वापस लाई जाती है तत्पश्चात विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं ।


तीसरे दिन खोर खुँदनी एवं चौथे दिन नाच मांडनी का कार्यक्रम होता है । नाच माण्डनी में पूजा स्थल पर मांदर, नगाड़े की थाप पर मंदिर के सेवादार एवं अन्य लोग माई दंतेश्वरी के सम्मुख नृत्य करते हैं । आदिम संस्कृति के मेलमिलाप,हॅंसी ठिठोली एवं उल्लास का वातावरण पूरे उत्सव के दौरान अपने चरम पर रहती है ।


अगले चार दिनों तक लमहा मार, कोडरीमार, चीतलमार एवं गँवरमार के रूप में शिकार नृत्यों का आयोजन सम्पन्न होता है । जिसमें गँवरमार मेले का मुख्य आकर्षण होता है जो रातभर चलता है ।



इन आयोजनो को देखने एवं सम्मिलित होने हजारों की संख्या में ग्रामीण एकत्रित होते हैं । आदिवासीयों में आखेट नृत्यों की परम्परा काफी प्राचीन है जो कि उनमें परस्पर सहयोग के पारम्परिक आखेट जीवन को रेखांकित करती है । जीवन के प्रत्येक क्षण को कला में परिवर्तित कर लोकसंस्कृति को जीवित रखने का यह प्रयास इन जन-जातियों की प्रमुख विशेषता है ।


आखेट नृत्यों के अलावा आँवरामार का भी आयोजन किया जाता है । उस दिन माई जी की पालकी पर आँवले का फल चढ़ाया जाता है । मंड़ई देखने आये जन समूह एवं पुजारी, सेवादार, बारहलंकवार इत्यादि दो समूहों में विभक्त होकर एक दूसरे पर इसी आँवले से प्रहार करते हैं । ऐसी मान्यता है कि आँवरामार विधान के दौरान प्रसाद स्वरूप चढ़े इस फल की मार यदि किसी के शरीर पर पड़ती है तो वर्ष भर वो निरोगी रहता है ।


त्रयोदशी को ताड़फलंगी विधान द्वारा सुरक्षित ताड़ के पत्तों से होलिका दहन कार्यक्रम सम्पन्न किया जाता है । मंडई के अंतिम चरण में चतुर्दशी के दिन रंग भंग ( गुलाल-अबीर ) उत्सव मना कर सभी आमंत्रित देवी देवताओं का पादुका पूजन किया जाता है तत्पश्चात् उन्हें भावभीनी बिदाई दी जाती है ।



गँवर मार के दूसरे दिन मंडई का उत्सव होता है जिसमें पुजारी द्वारा दोनो हाथों में माईजी के छत्रों को थामें हुए कुर्सी से बने पालकी में बिठाया जाता है तथा सारे नगर का भ्रमण कराया जाता है । मंड़ई बुधवार के दिन ही आयोजित किया जाता है एवं उसके एक दिन पहले मंगलवार को गँवरमार का आयोजन किये जाने की परम्परा है । अतः इन दोनो कार्यक्रमों को मंगलवार एवं बुधवार के दिनों में आयोजित किये जाने हेतु उत्सव के क्रम में फेरबदल भी किया जाता है ।



कैसे पँहुचें ….... छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर देश के अन्य भागों से हवाई, रेल तथा सड़क मार्गों से सुव्यवस्थित जुड़ा हुआ है । रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर से दंतेवाड़ा के लिए सड़क मार्ग द्वारा बहुतायत में लक्जरी स्लीपर बसों का संचालन होता है । प्राइवेट टैक्सी द्वारा भी 7 घण्टे की यात्रा द्वारा रायपुर से पहुँचा जा सकता है । रेल यात्री विशाखापट्नम से भी किरंदुल पैसेन्जर से यहाँ पहुँच सकते हैं ।



कहाँ रूकें .......... माँ दंतेश्वरी के दो धर्मशाला निर्मित है जिनमें नाममात्र शुल्क अदा कर ठहरा जा सकता है । इसके अतिरिक्त होटल मधुबन एवं विभिन्न विभागों के सरकारी विश्राम गृह भी हैं ।

 

अन्य समीपस्थ दर्शनीय स्थल - बारसूर (30किमी) , लौहनगरी बैलाडीला (30किमी) , चित्रकूट जलप्रपात ( 75किमी) तीरथगढ़ जलप्रपात एवं कुटुमसर गुफा ( 80किमी ) ।