रविवार, 16 मार्च 2014

मुंशी जी


भोला शंकर की उम्र कोई चौदह पन्द्रह साल रही होगी जब उसके मजदूर पिता का साया उठ गया । घर में बीमार माँ और चार बहने यही उसकी कुल जमा सम्पत्ति थी । किसी तरह एक होटल में काम कर अपने परिवार का पेट भरने का उपक्रम करने में पूरी युवावस्था गुजर गई । लेकिन पढ़ने के शौक ने उसे रात को सड़क किनारे लगे स्ट्रीट लाईट के खम्बे के नीचे किताबों से दोस्ती नहीं टूटने दी और कामर्स में ग्रेजुएट हो गया । 

किसी तरह उम्र के तीसवें बसंत ने जाते जाते धक्के मारकर सरकारी नौकरी दिलवा गई । अब उसके जीवन में कुछ विश्राम के क्षण आने की उम्मीद थी । लेकिन उसकी अभागी किस्मत को शायद ये मंजूर ना था । उस्सकी चार बहने हाथ पीले करने की अवश्था में आ गयीं थी । किसी तरह उन चारों की डोली बिदा की और फिर उनकी शादी के लिए गये कर्ज को ताउम्र किश्तों में उतारता रहा । सरकारी नौकर था और उपर से लेखापाल भी लेकिन उसे इमानदारी की बीमारी थी इसलिए उसके पास पूरे जीवन की जमा पूँजी के नाम पर अब बस प्राविडेण्ड फण्ड में जमा पैसा ही था ।  चूँकि नौकरी देर से लगी फिर बहनों की शादी के बाद खुद का परिवार बसाने में इतनी देर हो चुकी थी कि उसकी इकलौती बेटी उसके रिटायरमेंट पर अपनी पढ़ाई भी पूरी ना कर सकी ।

वो अब पेंशन के सहारे अपनी जिन्दगी शुकुन से गुजारना चाहता है, लेकिन जब तक इकलौती बेटी के हाथ पीले ना हो जायें किस बाप को कहाँ चैन मिल सकता है और यदि बाप ऐसी स्थिति में हो तो नींद भी आनी मुश्किल होती है । बेटी चार माह बाद ग्रेज्युएट हो जायेगी इसलिए आने वाली गर्मियों में उसका ब्याह कर वो सही मायनों में सेवानिवृत होना चाहता है । इसलिए उसने एक अच्छा सुयोग्य वर भी देख रखा है ।

चूँकि पूरा जीवन अपने परिवार को समर्पित कर कभी अपने लिए एक पल भी नहीं जीया इसलिए शायद उपरवाले ने उसकी थोड़ी मदद कर दी होगी । बेटी के लिए जो वर ढूँढा है वो वास्तव में बेटा ही निकला । अनाथ है पर कहता है कि दो जोड़े में अपनी अर्द्धांगिनी को घर ले जाऊँगा ।

पर बाप कितना भी गरीब हो, अपनी बेटी को यूँ ही बिदा नहीं करना चाहता और फिर उसने अपने प्राविडेण्ड फण्ड में किसके लिए पैसा जमा कर रखा था? इसी पैसे को हासिल करने वो अब पिछले चार महीनों से उसी ऑफिस के चक्कर लगा रहा जिसमें उसने पूरी निष्ठा और इमानदारी से अपने जीवन के 30 साल गुजारे थे और लोग उन्हे सम्मान से मुंशी जी कहा करते थे ।

ऑफिस में उसके स्थान पर बैठा नया लेखापाल जो चार महीने पहले तक उसे रोज सुबह मुंशी जी नमस्कार कहा करता था, उनकी पेंशन फाईल में चार महीने से इसलिए धूल जमाये रखा था क्योंकि उसे फाईल पर पडी धूल को साफ करने के लिए सफाई शुल्क नहीं मिली थी ।

ऑफिस के बड़े साहब एकदम युवा हैं । नये नये अखिल भारतीय सेवाओं हेतु चयनित होकर आये हैं । उन्होने अपने कैरियर के लिए पैसों से ज्यादा अभी एवार्ड हासिल करने का लक्ष्य निर्धारित किया है इसलिए वे ऑफिस के इन छोटे मोटे कार्यों के लिए अपना समय जाया ना करते हुए एक महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट पर सारा सामर्थ्य लगाये हुए हैं ताकि उन्हे अंतराष्ट्रीय स्तर का कोई पुरूस्कार मिले और वो नामचीन हो जाये । जिससे भविष्य में उन्हे किसी मेगा प्रोजेक्ट का हेड बनाया जा सके । फिर एक ही झटके में पैसा और शोहरत दोनों एकमुश्त हासिल कर अपने आने वाली सात पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित कर लेंगे । इस कारण से मुंशी जी का प्रकरण उनके लिए समय की बर्बादी थी ।

चार महीने में एडियाँ रगड़ जाने के बाद असफल मुंशी जी को किसी ने बताया कि नई चुनी गई सरकार में विभाग के मंत्री संवेदनशील और सहृदय है । एक बार उनसे मिलो, शायद वे तुम्हारी समस्या का समाधान कर देंगे । एक बार बस उनके आँखों का इशारा हो जाय तो दूसरे ही क्षण प्राविडेण्ड फण्ड का पैसा तुम्हारे बैंक खाते में जमा मिलेगा ।  उसने भी अखबारों के विज्ञापनों में लिखा पढ़ रखा था। जिसमें कई लोगों ने उन्हे मंत्री बनाये जाने पर शुभकानायें देते हुए लिखा था कि योग्य, अनुभवी, विनम्र, सहृदय और मिलनसार आदरणीय भैय्या को मंत्री बनाये जाने पर हार्दिक बधाईयाँ ।

इसी छवि को अपने मानसपटल पर अंकित कर वह पिछले एक महीने से रोज मंत्री के बंगले पहुँच जाता । चूँकि बँगले में उसकी कोई पहचान नहीं थी,  ना ही किसी बड़े आदमी की सिफारिश । इसलिए वो अपने नाम की पर्ची देकर वेटिंग हॉल में अपने बुलाये जाने की प्रतीक्षा कर शाम को असफल वापस आ जाता ।

बेटी की शादी को चार दिन ही बचे थे । मुंशी जी ने सोचा कि सुबह सुबह किसी के आने से पहले ही पहुँच जाऊँ शायद मुलाकात हो जायेगी और काम बन जायेगा । इसलिए पौ फटते ही मंत्री जी के बँगले पर हाजिरी लगा दी । दरबान ने रोका और कहा कि ये मिलने का वक्त नहीं है, मुलाकाती समय में आओ ।

मुंशी जी ने गुहार लगाई कि एक महीने से रोज मुलाकाती समय पर ही आ रहा हूँ पर मुलाकात नहीं हो पा रही है। निवेदन है कि किसी तरह अभी मुलाकात करवा दो । बस दो मिनट में अपनी बात खत्म कर लौट आऊँगा । दरबान का दिल पसीजा और अपनी नौकरी को दाँव पर लगाते हुए उसने इंटरकाम से मंत्री जी के निजी सेवक तक खबर भिजवायी । निजी सेवक ने बताया कि मंत्री जी व्यस्त हैं, वे अपने विदेशी नस्ल के कुत्तों को सैर करवा रहें हैं ।

चूँकि दरबान देशी था इसलिए अपनी हैसियत पहचानते हुए और मुंशी जी की नजरों में मंत्री जी की लाज बचाने का नैतिक दायित्व निभाते हुए कहा - बाबा, मंत्री जी इस वक्त एक विदेशी प्रतिनिधि मण्डल से जरूरी बैठक कर रहें हैं, अभी आपकी मुलाकात सम्भव नहीं। कृपया निर्धारित जनदर्शन में ही आयें तो अच्छा होगा । 


मंत्री की कर्तव्यपरायणता से गदगद किंतु दुखी मन से मुंशी जी वापस लौटकर सीधे पास के मंदिर में बिटिया के वैवाहिक कार्यक्रम आयोजित करने के लिए पुजारी से मिलने चल पड़े । चार बहने और उनके पति और बच्चे , बूढ़ी माँ और पत्नी के इस सीमित स्वजनों की उपस्थिति में भारी मन से अपनी बिटिया का हाथ उसके जीवन साथी के हाथों में सौंपते हुए बस यही कहा – बेटा, तुम्हे देने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है, भगवान से यही दुआ है कि तुम दोनों को मेरी उम्र लग जाय ।

बिटिया के विवाह के बाद अब गली के मोड़ पर चाय का ठेला अब उनका स्थाई अड्डा था । वहीं पर दिन भर जमे रहना और मौका मिलने पर किसी की भी मदद के लिए तैयार हो जाना अब उनकी नियमित दिनचर्या थी । उनके इसी निस्वार्थ सेवाभाव की चर्चा सुनकर एक गैर सरकारी संस्था के स्वयंसेवी मिलने पहुँचे । खादी के वस्त्र पहने हुए चेहरा रक्तिम आभा से दमक रहा था । मुंशी जी ने पूछा – किस काम से आये हो ? स्वयंसेवी बोले – हम समाजसेवी हैं । गरीब और अशिक्षित भोले-भाले आदिवासियों के हक के लिए लड़ाई लड़ते हैं । आप हमारी संस्था में शामिल होकर इस नेक काम में हाथ बँटायें । मुंशी जी फौरन तैयार हो गये और कहा कि वे गाँव तो नहीं जा पायेंगे लेकिन शहर में रहकर अपने पूरे सामर्थ्य के साथ उनके इस नेक काम में तन मन से सहयोग देंगे ।

इस तरह स्वयंसेवी जब भी शहर आते मुंशी जी उनके सहयोगी के रूप में दिन भर साथ देते । एक दिन यूँ ही चर्चा के दौरान मुंशी जी ने स्वयंसेवी को अपने प्राविडेण्ड फण्ड का किस्सा बताया । स्वयंसेवी जी का उँचे ओहदेदारों में काफी नाम था और प्रभाव भी । उन्होने दो दिन में ही मुंशी जी के प्राविडेण्ड फण्ड का पैसा दिलवा दिया । निर्मोही मुंशी जी के लिए उनका पेंशन ही पर्याप्त था इसलिए अब इस रकम की कोई आवश्यकता नहीं थी। सोचा जिसके लिए ये रकम जमा की थी, उसे ही दे दूँ । इसलिए उन्होने अपनी बिटिया को घर बुलाया ताकि एक बार फिर से इस रकम से साथ बिटिया को हँसी खुशी घर से विदा कर सकें ।

बिटिया अपने पति और बेटे के साथ घर आने वाली थी । उसकी माँ ने उनके स्वागत के लिए तरह तरह के पकवान बनाये थे । वे दोनों अपने घर की दहलीज पर बैठकर उनके आने की बाट जोह रहे थे । लेकिन बिटिया आती उससे पहले पड़ोस में रहने वाला लालचन्द अपनी मोटरसायकल में बदहवास सा आया और बोला - चाचाजी जल्दी चलिये । चौक पर बम धमाका हुआ है और दीदी बुरी तरह घायल है ।

मुंशी जी आवाक थे । उन्होने मोटरसायकल पर बैठकर केवल इतना ही पूछा – दामाद बाबू और नाती कैसे हैं ? लालचन्द मौन था और उसके मौन ने मुंशी जी को स्तब्ध कर दिया । उन्हे अब कुछ समझ ही नहीं आ रहा था। अस्पताल पहुँचकर वे दौड़े दौड़े अपनी बिटिया के पास पहुँचे और उसके सिर को अपनी गोद में रख लिया । बुरी तरह जख्मी और खून से लथपथ बिटिया इतना ही कह पाई – पिताजी, अपना और माँ का खयाल रखना । 

मुंशी जी के जीवन का शायद ये अंतिम दुख होगा । अब उन्हे कोई भी घटना दुखी नहीं कर सकती । कुछ दिन गमगीन रहने के बाद वे लोगों की मदद करने को ही अपना इलाज बना चुके थे । सुबह से ही घर से निकल जाना फिर जरूरतमन्दों की सहायता करना यही उनका जीवन ध्येय था ।

प्राविडेण्ड फण्ड का जो पैसा मिला था , मुंशी जी ने उसे स्वयंसेवी की संस्था को दान देने का निश्चय किया । स्वयंसेवी से टेलीफोन से संपर्क किया तो पता चला वे किसी सेमीनार के सिलसिले में दिल्ली गये हुए हैं । उन्होने स्वयंसेवी को अपनी इच्छा बतायी तो स्वयंसेवी ने उन्हे ढेरों बधाई देते हुए कहा कि आप उसे मेरे संस्था के बैंक खाते में जमा करवा दें । मैं दिल्ली में आपके इस नेक कार्य से मीडिया के लोगों को अवगत करवाता हूँ । शीघ्र ही आपको किसी ना किसी राष्ट्रीय पुरूस्कार से नवाजा जाकर सम्मान समारोह आयोजित किया जायेगा ।

मुंशी जी को ना तो कभी इच्छा थी और ना ही कभी लालसा । सो उन्होने इसे गुप्तदान घोषित करते हुए सम्मानित होने के लिए विनम्रतापूर्वक इंकार कर दिया और फिर दूसरे दिन सीधे बैंक जाकर पूरा पैसा संस्था के खाते में जमा कर दिया । बैंक से लौटते हुए वे आदतन गली के मोड़ वाली चाय दुकान पर अपना आसन जमाया और चाय की चुस्कियों के साथ अखबार पढ़ने लगे ।

अखबार के पहले पृष्ठ पर बड़ी खबर थी । पुलिस ने बम धमाकों के मुख्य आरोपी आतंकी को पकड़ लिया है और उसने पूछताछ में पुलिस के सामने कबूल किया है कि जिस समाजसेवी को वे अपनी जीवनपूँजी दान में दे आये थे वो इस आतंकवादी को हथियार और गोला बारूद उपलब्ध करवाता था । मुंशी जी ने अपनी आधी चाय वहीं छोड़ी और वापस घर लौट आये । अब वे किसी से भी बातचीत नहीं करते थे । केवल गुमसुम और मौन रहते हुए कभी आसमान को तो कभी सूनी दीवारों को घण्टों तकते रहते । 

मुंशी जी इस सदमे से उबर पाये या नहीं ये तो कहना मुश्किल है पर अब किसी से कुछ बोलते नहीं । वजह ये नहीं कि उनकी आवाज चली गई थी बल्कि इसलिए कि कहीं उनके मुँह से सच निकल गया तो लोगों का ईमानदारी और परमार्थ से भरोसा उठ जायेगा । 

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

चाय चर्चा ऑन मिसरा ठेला


भोला शंकर आज सुबह सुबह गली में चाय के ठेले पर ही टकरा गया । बोला – महाराज, एनी स्पेशल न्यूज ऑर मेसेज फॉर वेलेंटाईन ग्रीन डे?
 
हमने कहा – साले क्या खाक भेलेंटाईन डे । पूरा साठ हजार का चूना लगा है । 
भोला बोला – उ कईसे महराज ? कौनो स्पेशल विदेशी माल है का ?  
हमने उसे गुर्रा के कहा – क्या मतलब है बे तेरा ? भोला बोला – माने के पूछ रहें हैं के कौन स्पेशल सुरा सुंदरी है जो ऐत्ता मँहगी है । 
हम कहा – नई बे कल टाईम्स नाऊ पर अर्नब को देख रहा था । 9-10 वाला स्लॉट छुट गया रहा, त  जाते जाते अर्नब ने कहा था कि 11 से रिपीट टेलीकास्ट भी होगा इसलिए 11 बजे से उसका रिपीट देखने बैठ गया ।

पर साला किस्मत को ये मंजूर नहीं था । दुर्भाग्य से हमारी पर्शनल शिन्दे भी अपना फेवरेट सास बहू टाईप का कोनो नौटंकी नहीं देख पाई थी और उसका भी रिपीट टेलीकास्ट 11 बजे ही है । सो जाहिर है घर में सुख शांति बनाये रखने के लिए कुर्बानी तो बकरे का ही होना था । सो हम कट गये अर्थात हमारे हाथों से रोमोट का बलात अधिग्रहण ठीक उसी प्रकार कर लिया गया जैसे चुनाव आयोग द्वारा लोगों की व्यक्तिगत गाड़ियाँ अधिग्रहित की जाती हैं ।

मैं पिंजरे में बन्द पंछी की तरह छटपटा सकता था लेकिन हमने भी बी आर चोपड़ा की महाभारत कथा देख रक्खी है । जब एकलव्य सामने खड़ा हो तो द्रोणाचार्य के कुत्ते को नहीं भौंकना चाहिए । सो इस कथा से प्रेरणा लेकर हम भी ठीक उसी प्रकार चुपचाप बैठ गये जैसे मोफलर चाचा गन्ना खुजारे के पीछे रासलीला मैदान में बैठ जाता था ।


टीवी में एकता बुआ का मस्ट नौटंकी आ रहा था । हमने पूरी हिम्मत बटोर कर पर्शनल शिन्दे से पूछा – मैडम ई नौटंकी का क्या नाम है । उसने कॉफी के मग को होंठों से लगाकर सरकारी इंक्वारी के लहजे में बताया - @#$% अकबर । पहला शब्द इसलिए नहीं लिख रहें हैं क्योंकि ऊ हमको थोड़ा अश्लील टाईप का लगा ।  लेकिन हम सोचे साला लेट नाईट शो है और कल वेलेंटाईन बाबा के बर्थडे भी है तो कुछ टिप्स देने के लिए झमाझम टाईप का दिखा रहा होगा । इसी उम्मीद में अपनी खुशी को अन्दर ही अन्दर दबाकर, मुँह लटकाये हुए टीवी की ओर टकटकी लगाये बैठे रहे ।


भारत निर्माण के लिए गये ब्रेक में मीलों आगे जाने के बाद जब नौटंकी फेर चालू हुआ तब हमने देखा कि नौटंकी का नाम तो जोधा अकबर है । खैर टीवी पर किसी पीर बाबा के मजार में उसका चेला आकर बताता है कि बाबा कोई "आम आदमी" का जोड़ा आया हुआ है । आपसे मिलना चाहता है । बाबा ने कहा – आने दो ।



हमने सोचा - ओ तेरी , मोफलर चाचा यहाँ भी पहुँच गया क्या ? लेकिन ये एकता बुआ का नौटंकी है इसलिए इसमें मोफलर चाचा नहीं एक सुन्दर का बाँका जवान अपनी टंच बीबी के साथ बाबा के सामने आया । हम मन ही मन बहुते मुस्कियाये के एकता बुआ ने जवान अकबर को जब बेवजह जंगल में लाया है त कुछ ना कुछ स्पेशल करवायेगी, माने के टार्जन स्टाईल में ।

त पीर बाबा बोले – कहो शहँशाह जलालुद्दीन अकबर , कैसे आये हो ?

बाबा का चेला भी भोलाशंकर टाईप का मुँह लगा था । अकबर के बोलने से पहले ही टोक पड़ा – बाबा, आप इन्हे शहँशाह अकबर कह रहें है, लेकिन ये तो “आम आदमी” है ।

बाबा एकदम श्याणा था । अब बाबा क्या घण्टा श्याणा होगा, वो तो एकता कपूर का स्क्रीप्ट रायटर श्याणा है जिसने फौरन इसमें एक मेसेज घुसेड़ दिया और बाबा के लिए डॉयलाग चिपकाया ।

पीर बाबा बोले – बच्चा, कोई भी आम आदमी अपने कर्मों से शहँशाह बन सकता है लेकिन बिरला ही शहँशाह से आम आदमी बनाता है ।

हमने सोचा,  ओ तेरी, इ त गजब का डॉयलाग है । साला ऐसा सीरीयल देखूँगा तो भयंकर टाईप का मसाला मिलेगा और अपनी शिन्दे की भी किरपा बनी रहेगी, कहाँ अपन अर्नब के नेशन वांट्स टू नो के झाँसे में आ गये ? इसी खयाल में डूबकर हम मुस्किया रहे थे तो हमारी शिन्दे ने मौका देखकर जिद पकड़ लिया – सुनो हो हमरे झीन्गालाला, गाड़ी पुराना हो गया है , हमको आजे च एक ठो होण्डा का एक्टिवा वेलेंटाईन गिफ्ट में चाहिए, वरना आज बेलन ट्राई डे भी हो सकता है , समझे ।

हमारे पिटने की उम्मीद जागती देख भोला तपाक से पूछा – फेर महाराज, इस नाजायज डिमाण्ड को पूरा करोगे ? माने पूछ रहें है ?

हमने कहा – अबे, इ कोई नाजयज रिक्वेस्ट नई है , ऑर्डर है आर्डर । आर्डर माने बूझता है ना ? अगर लाकर नहीं देंगे तो बेलन ट्राई डे पक्का है ।

खैर छोड़, उ त अभी दुकान खुलते ही ला देंगे, मगर इ पीर बाबा के डॉयलाग से अब मोफलर चाचा और पप्पू चाँदी के भक्तगण भारी खुश हो सकते हैं । माने के पप्पू चाँदी भी रोजे अपने बलिदानी खानदान के शान-ओ-शौकत को छोड़कर गरीब दलित के यहाँ खाना खाकर आम आदमी बन रहा है और सुना है उधर मोफलर चाचा भी इस्तीफा देकर खास आदमी से फेर आम आदमी बनने का नौटंकी करने वाला है ।

इ पूरा वाक्या को चाय ठेला वाला मिसरा बड़े ध्यान से सुन रहा था । बोला - सुनिये ऐय महाराज, हम ज्यादे पढ़ा लिखा त नहीं हूँ, मगर हमरा एक बात आप गाँठ बाँध लो । गरीब का झोपड़ा में मिनिरल वाटर के साथ खाना खा कर फोटू खींचाने से कोई महान नहीं बन जाता । पाँच साल पहिले जिस गरीब के घर में बिजली लाने के लिए अमरिका से परमाणु समझौता करने का महान उपदेश दिये रहे, उ कलावती के घर में बिजली त छोड़ो, उसका चूल्हे का कोयला तक बेच खाये । और इ जो मोफलर चाचा आम आदमी से खाँस आदमी बना है ना, इ खाली खाँसेगा, करेगा कुछ नहीं । बिल्कुल मोहल्ले का खोरली कुकुर जैसे, माने के खाली भौंकेगा, काटेगा नई । इ दूनों को बिना मेहनत के फोकट में राजपाठ मिला है, इसलिए इनको पता नई है के चाय ठेला चलाने से राजकाज चलाने तक का पोजीशन हासिल करने में तशरीफ का कितना तेल निकल जाता है ।

हमने भोला के तरफ देखा और बोला – यार भोला, ई त टू-मच हो गया यार । कसम से, अगर हम दूजे किसम के आदमी माने के राघवबाबा जैसे होते त ई मिसरा को अपना बैलेंटाईन बना लेते यार ।

माने के साला जब टीवी में चाय ठेला पर चर्चा लाईभ दिखा रहा था, तब ई मिसरा कहाँ था ?    

बुधवार, 22 जनवरी 2014

मोफलर बाबू


कल शाम को हमारी पर्शनल शिन्दे का मानस भ्राता माने के हमारा आईएसी साला मोफलर बाबू एक्सीडेंटली हमसे खिड़की बार के सामने टकरा गया । हमें देखते ही हिलडुल रहे सामने वाले बिजली खम्बे को स्थिर करने का प्रयास करते हुए बोला – अरे राबर्ट जीजू, अच्छा हुआ आप यहाँ दिख गये । जरा दस ठो लाल गाँधी तो दीजिए ।

हम कहा – काहे बे साले ?

मोफलर दबंगाई से बोला – अरे ठठेरा बाबू, तुम भी ना बहुते बड़े वाले हो । अरे, अपने चार दोस्तों के साथ चिंतन बैठकी जमाये रहे, उसी का एक्सपेंडीचर है, पेमेंट करना है । लाओ अब ज्यादे चें पों मत करो देई दो।

हमने कहा – क्यूँ बे खुजालचन्द, ई कैसा बैठक जमाये रहे बे, जिसमें पाँच आदमी के चिंतन के लिए दस ठो लाल गाँधी का पेमेंट करना है ?

मोफलर ने दार्शनिक अंदाज में कहा – बैठक नई ठठेरा बाबू, बैठकी जमाये रहे, यहीं खिड़की बार में । हम पर विश्वास नहीं है तो जाओ अन्दर में जमानत के लिए काऊंटर पर कुमार को बाँध के रखा हुआ है, खुदे पेमेंट कर छुड़ा लाओ।

हमने कहा – देख बे मोफलर, हम मंगलवार को शुद्ध रक्त वाले आर्य कंघी होते हैं, उस दिन दारू से ना तो खुद खुजाते हैं और ना ही किसी के खुजली का पेमेंट करते हैं । लाल गाँधी तो छोड़ो चवन्नी नहीं दूँगा । जाओ, बीड़-लान में घास उगा पड़ा है, जितना उखाड़ना है उखाड़ लो ।   

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अभी सुबह सुबह जब बच्चों को स्कूल छोड़कर घर वापस पहुँचा तो देखा सामने भी
ड़ जमी हुई है । फौरन बदहवास सा घर के अन्दर घुसा तो देखा हमारी पर्शनल शिन्दे जिसे हम प्यार से पीन्दे भी कहते हैं अपने चेहरे पर 8.20 बजाये बैठी है । हमने पूछा क्या हुआ भागवान ?

उसने कहा– एक नई मुसीबत आई है। मोफलर भैय्या सामने पार्क में धरने पर बैठ गये हैं।

हमने कहा – काहे भाई, अब उसे का हुआ ? 

वो बोली – कल शाम की घटना से मोफलर भैय्या बेहद नाराज हैं, चलिए जाकर बात करते हैं ।

हम मोफलर बाबू के पास पहुँचे और बोले– का है बे साले,ई नौटंकी काहे किया हुआ है? चाहते क्या हो ?

मोफलर बोला – ई नौटंकी नहीं, आम जनता के हक की लड़ाई है । हमरा माँग है के आपको ई घर से सस्पेण्ड किया जाया । 

हमारी पर्शनल शिन्दे नाराज हो गई बोली चुप बुड़बक, ई नहीं हो सकता । घर का नेम पलेट में इनका नाम लिखा है, सस्पैण्ड नहीं कर सकते , मोराल डाऊन होगा । ( लेकिन मन ही बड़बड़ा रही थी, इनको सस्पैण्ड कर दिया तो घर का झाड़ू पोछा कौन करेगा ? )

मोफलर बोला तो फेर कम से कम इनका खाना पीना देना बन्द कर दो । खुदे अपना चौका बर्तन खुदे करें ।

वो अब नाराज होने की सीमा तक पहुँच गई और बोली सुन रे मोफलर, बताये देते हैं । हमारे रहते ई अकेले के लिए खाना बनाये, ई हम बर्दाश्त नहीं कर सकते । चाहे कुछ भीं है पर पति है हमारे, वो भी इकलौते ।

इतना सुनते ही वहाँ खड़े मुहल्ले के लोगों की आँखों में हमारे लिए सम्मान की एक लहर दौड़ गई लेकिन वो तो केवल हम ही जानते थे के यदि हम केवल अपने लिए ही चौका बर्तन करें तो घर में बाकी लोगों के लिए कौन  करेगा ?

खैर जो भी दो घण्टे की माथापच्ची के बाद मामला अब शेटल हो गया है । मुझे तीन दिन के मद्यावकाश पर जाने को कह दिया गया है और अन्दर की खबर तो ये है कि हमारी पर्शनल शिन्दे ने इस पूरे घटना के आयोजन व्यय की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए क्षतिपूर्ति हेतु चालीस ठो लाल गाँधी मोफलर बाबू के पिछवाड़े वाले पाकिट में ठूँस दिया है।

बुधवार, 1 जनवरी 2014

स्त्री विमर्श गोष्ठी

आमतौर पर किसी भी वैचारिक गोष्ठी में आप जायें तो मंच पर विचित्र सी मुद्रा बनाये कुछ बौद्धिक लबादे कुर्सी पर जमें हुए मिलेंगे । ऐसा नहीं है कि उनमें सब के सब लबादे ही हों , कुछ बहुमुल्य गठरी भी होते हैं ।

गोष्ठी का अर्थ होता है, आपसी संवाद द्वारा विचारों का आदान प्रदान । लेकिन इस प्रकार के कार्यक्रम में गोष्ठी के नाम पर विचार का एक पक्षीय प्रवाह दिखाई देगा और मंच तथा नीचे बैठे लोगों के बीच वक्ता और श्रोता का सम्बन्ध स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है ।

ऐसे कार्यक्रमों को गोष्ठी कहना ठीक वैसा ही है, जैसे हनी सिंह के स्टेज शो को संगीत समारोह ।

लेकिन जब भी समय होता है अथवा अवसर मिलता हैमैं ऐसे कार्यक्रमों में ( माने के गोष्ठियों में , ना कि हनी सिंह के मुजरे में ) जाना बेहद पसंद करता हूँ और गुमनाम सा पीछे की पंक्ति में बैठकर पूरी तल्लीनता से वक्ताओं को सुनने का गंभीर प्रयास करता हूँ ताकि उनके पास जितना ज्ञान हो उसे आत्मसात कर सकूँ और कितना कचरा भरा पड़ा है ये जान सकूँ ।  

ऐसे ही एक कार्यक्रम का मंच संचालन कर रहे भोला शंकर ने हमें पीछे की पंक्ति में बैठे हुए देखकर माईक पर चिल्लाया - आदरणीय महानुभावों , आज बड़े सुखद आश्चर्य का दिन है जो हमारे गुरूदेव अर्थात स्वयं प्राकट्य स्थितप्रज्ञ चीनी उँगली महाराज सशरीर इस अहाते में विराजमान है ।

भोला यहीं नहीं रूका और हमारे अंदाज में ही हमारी तारीफ करते हुए कहा – ये हमारा सौभाग्य है क्योंकि महाराज आबकारी अहाते को छोड़कर किसी और अहाते में बुलाये जाने पर भी नहीं जाते ।

ये वो अजीम शख्स हैं जिनका सानिध्य पाने के लिए इन्हे बुलाया नहीं जाता बल्कि उठाकर लाया जाता है । बुलाने पर ये वहीं जाते हैं जहाँ से इन्हे उठाकर घर पहुँचाने की पूरी व्यवस्था हो । 

खैर कार्यक्रम के पश्चात चेला भोला शंकर ने एक बौद्धिक दिखने के लिए भरी दुपहरी में कण्ठ लंगोट और पूरी बाँह के अस्तर वाला कोट पहने हुए स्त्री समानता के भय़ंकर पक्षधर श्रीमान श्याम कार्लोस विद्रोही से हमारी भेंट कराई । कहा महाराज ये श्याम कार्लोस विद्रोही जी है,  स्त्री अधिकारों के लिए आन्दोलन करते हैं ।

हमने कहा अच्छा, बहुत बढ़िया काम कर रहें हैं विद्रोही जी । 

विद्रोही जी हाथ जोड़कर बोले महाराज, कल इसी सभागार में स्त्री विमर्श पर गोष्ठी है, विषय है नारी अगर देवी है तो अबला क्यूँ ? 
आप जरूर आईयेगा । हम आपको ना तो उठाकर ला सकते हैं और ना ही उठाकर पहुँचाने की व्यवस्था कर पायेंगे लेकिन प्रेम से बुला रहें हैं , उम्मीद है आयेंगे जरूर । 

हमने उनका हाथ पकड़कर कहा विद्रोही जी,  प्रेम से हमें कोई भी बुलाए हम खींचे चले आते हैं । अच्छा , प्रेम से याद आया , भाभीजी नहीं दिख रहीं ? 

इतना सुनते ही भोला ने हमारा हाथ छुड़ाया और विद्रोही जी से दूर खींच कर कान में फुसफुसाया महाराज क्या बोल रहे हो । इनकी बीबी इनके स्त्री अधिकार आन्दोलन से इतना अधिक जागृत हो गईं कि अपने वाहन चालक के साथ नया संगठन बना कर इनकी आधी सम्पत्ति पर मालिकाना हक के लिए अदालत में अर्जी लगाईं है । 

खैर दूसरे दिन हम आदतन पिछली सीट पर बैठे थे और शायद क्या यकीनन भोला शंकर के कल के बोलने के स्टाईल से प्रभावित होकर विद्रोही जी मंच से कह रहे थे अब मैं जिस विदुषी महिला को अपने विचार व्यक्त करने बुला रहा हूँ , उनकी इतनी अधिक माँग है कि वे चाहकर भी हर जगह नहीं आ पातीं और उन्हे जबरिया उठाकर लाया जाता है ।  

कार्यक्रम कुछ तकनीकी समस्याओं के कारण नियत दिशा में इससे आगे बढ़ नहीं पाया और चेला भोला शंकर हमें मंच की ओर इशारा कर बता रहा था कि जो महिला अपने डिजायनर सैण्डल से विद्रोही जी को भोग लगा रही थी, वो वही है जिसने अदालत में आधी सम्पत्ति के लिए अर्जी लगाया हुआ है और जो शख्स बीचबचाव के बहाने विद्रोही जी के दोनों हाथों को पीछे से जकड़ा हुआ था, वो उनका पुराना वाहन चालक । 

खैर जो भी हो स्त्री विमर्श पर इतना अच्छा लाईव कार्यक्रम मैने पहली बार देखा और सुना । 

गुरुवार, 28 नवंबर 2013

रूपा की थण्डर बीयर


अपना कोई परमानेंट ठिकाना तो रहता नहीं । कल रात पुराना मित्र जिग्नेश भाई हमें फोन कर पूछा - जय श्री कृष्णा महापात्र भाई , केम छो ? 

हमने कहा - मज्जा मा ।  तमे केम छो जिग्नेश भाई ?   

गिग्नेश बोला - हुँ सवारे रायपुर आऊँ छुँ । तमे क्याँ रहो छो ? 

मैने सोचा , साला ई गुज्जु भाई इतना दिन बाद आ रहा है और मैं शहर से बाहर हूँ । सोचा चेला भोला शंकर को फोन लगा कर इसकी व्यवस्था बनवाता हूँ । मैनें जिग्नेश से कहा - जिग्नेश भाई मैं तो शहर के बाहर हूँ ,  पर मेरा बन्दा आपको रिसीव करेगा और रूकने खाने की व्यवस्था कर देगा मैं कल रात तक पहुँचता हूँ , फिर मिलते हैं । 

ओके जय जिनेन्द्र - जिग्नेश ने कहा 

मैने भोला को फोन लगाया । भोला ने फोन उठा कर कहा -  अरे क्या बात है महाराज,  आज कुँआ खुद प्यासे के पास । मुझे तो ठीक वैसा ही फील हो रहा है जैसे राहुल भैय्या किसी गरीब आदिवासी के घर में डिनर के लिए आये हों ।  

हमने कहा -  सुन बे केजरीवाल के आंतरिक लोकपाल,  ज्यादे फुदक मत । मेरा दोस्त सुबह आ रहा है । उसे एयरपोर्ट से पिकअप कर लेना और उसके खाने पीने की पूरी व्यवस्था अच्छी तरह से करना । शिकायत का कोई मौका नहीं मिलना चाहिए । मैं कल रात या फिर परसों सुबह आऊँगा । तब तक उसकी खातिरदारी में कोई कमी नहीं होनी चाहिए । समझा ? 

 भोला बोला - महाराज आप चिंता ना करें । हमारे गऊमित्र के पीने खाने में कोई कमी नहीं रहेगी , ये भोला शंकर का वचन है ।

हमने कहा - अबे उसे गौमूत्र पिलायेगा क्या ? 

भोला बोला - अरे नहीं महाराज , आप भी ना कभी कभी शुद्ध हिन्दी व्याकरण समझ नहीं पाते हो । गौमूत्र नहीं , गऊमित्र , माने गुरू का मित्र .......  ग + ऊ + रू + मि + त्र = गऊमित्र  । इसमें "रू" साईलेंट है क्योंकि गुरू के मित्र की व्यवस्था के लिए रूपये पैसे की चिंता नहीं होनी चाहिए , ये अधर्म है । 

हमने कहा – वाह रे वर्ण संकराचार्य । तुझ पर तो पतंजलि का पूरा व्याकरण महाभाष्य न्यौछावर करना चाहिए, पर देख हमारे मित्र को कोई तकलीफ ना हो । 

भोला बोला – डोण्ट वरी महाराज , योर फ्रेण्ड इस ऑन माय कस्टडी । गिविंग मी रिस्पांसिबिलिटी यू डन हाफ वर्क  बिकॉस वेल बिगन इस हॉफ डन  । 

हमने कहा – चल भाई भगवान करे ऐसा ही हो , मेरे पास और कोई ऑप्शन भी नहीं है । 

अभी सुबह सुबह मैने जिग्नेश भाई को फोन लगा कर खैरियत पूछी तो बोला - भाई , मजा मा छे पर तमारी  चेला भोलाशंकर भाई खूब ज खतरनाक छे । 

हमने कहा – क्या हुआ जिग्नेश भाई , उसने आपसे कोई बदतमीजी की क्या ? 

जिग्नेश बोला – ऐ क्या बोलते हो तमें महापात्र भाई ? आपका चेला तो बड़ा ही मस्त आदमी है पर .. ( फिर उसने अपनी परेशानी बताई ) 


मैने भोला को फोन लगाया लेकिन मैं उसे कुछ कहता उससे पहले ही भोला का वन वे ट्रैफिक चालू हो गया –
अरे हम अभी नहाकर आपको फोन लगाने ही वाले थे , आप जल्दी मरोगे नहीं महाराज ।
पर महाराज आपका दोस्त तो बहुते बड़ा वाला पियक्कड़ है भाई । साला सुबह से ही चालू हो जाता है । सुबह सुबह एयरपोर्ट से आते समय ही बोला – ऐ भोलाभाई , तमेको एक बात बोलूँ त बुरा तो नई मानोगे न ?  
तो मैने कहा – अरे आप गऊमूत्र हो आपकी बात का क्या बुरा मानना ? 
तो उसने कहा – में हे ना अपना ठण्डर बीयर लाना भूल गया हूँ । तमे दो पीस ला दोगे क्या ? 
तो मैने कहा – अभी तो दूकान खुला नहीं होगा ? एकदम जरूरी है क्या ? 
तो उसने कहा – हाँ भाई जरूरी ही है । क्या है ना के मेरे को नहाने के बाद बड़ी दिक्कत हो जायेगी । 
मैने उन्हे होटल में पहुँचाया और बस आपका इज्जत रखने के लिए बड़ी मुश्किल से ठेका के पिछले दरवाजे से जुगाड़ बनाकर चार बोतल थण्डर बीयर लिया । उसे होटलब्वाय को उनके कमरे में पहुँचाने के लिए देकर बस अभी घर पहुँचा हूँ नहाने के लिए । अच्छा महाराज , आप तो कुछ बोल ही नहीं रहे ? दोपहर में उनके पीने के लिए क्या ले जाना है ? बता दीजीए नहाने के बाद पहुँचा आऊँगा , तब तक अपनी पर्ची वाली दुकान भी खुल जायेगी ।  

हमने कहा – अबे लालबुझक्कड़ की भटकती आत्मा ...  वो गुज्जू आदमी है , शुद्ध वैष्णव समझा । उसने तुझे अण्डरवीयर के लिए बोला और तू उसे थण्डर बीयर दे आया । उसका अभी फोन आया था, नहाने के बाद गीला टावेल पहन कर ठिठुर रहा है , जल्दी जा और दो रूपा की चड्डी पहुँचा कर आ ।  और सुन बे रूपा की मतलब रूपा कम्पनी की देना वरना तेरा कोई भरोसा नहीं पड़ोसन की छत से उतार कर दे आये । 


शुक्रवार, 22 नवंबर 2013

सरकार तो बननी तय है


चेला भोला शंकर भी आजकल राजनैतिक पण्डिताई की दुकान जमाने में लगा है । कल सुबह सुबह ही उसने मुझसे निवेदन किया - महाराज , आपके मातापिता को नमन है जिन्हे आपके जन्म पर ही पता चल गया कि आप दूरदृष्टा होंगे इसलिए आपका नाम संजय रख दिया । आप जैसा अंतर्यामी इस ब्रह्माण्ड में कोई नहीं । एक बार अगर शोभन सरकार के सपने के बारे में पुरातत्व वाले आपसे सलाह लिये होते तो आज साठ लाख रूपये की ऐसी मिट्टी ना खोदे होते जो ईंटा भट्टा के काम भी नहीं आ पा रहा है । 

हमने कहा - रे, ब्रह्मभट्ट कुल के नन्दन । हमारे खुरदरे चरित्र पर चिकनाई लगाना छोड़  ।  मेरे मातापिता भी हर  बालक के मातापिता जैसे ही सामान्य थे , जो समयकाल के लोकप्रिय व्यक्ति के नाम पर बच्चों का नाम रखते हैं । घरवाले बताते हैं कि पिताजी ने जब हमें पहली बार गोद में लिया था तब हमने उनके उपर तेज धारा में ऐसा मूत्र प्रक्षालन माने सू-सू कर दिया जैसे उनकी जटा से कोई नदी उद्गम हो रही हो इसी चरित्र के कारण उन्होने संजय गाँधी के नाम पर हमारा नामकरण कर दिया । हालांकि घर वालों की बात पर मैं अब भी विश्वास नहीं करता हूँ ।

 विश्वास से याद आया .... बता बे कुमार विश्वास के चारित्रिक सहोदर  इस चापलूसी के पीछे तेरा क्या स्वार्थ निहित है ? 


भोला सकपकाया और संकोच करता हुआ बोला - महाराज , हमारी दोनों पार्टी के लाईजिनिंग नेतानुमा व्यापारियों से सेटिंग हुई है । उन्होने कहा है कि एक बार उन्हे गोपनीय ढंग से बता दें कि कंफर्म किसकी सरकार बन रही है तो अपना दक्षिणा पेंशन सेट कर देंगे ।

हमने कहा - ठीक है , दोनों को एक एक कर भीतर खोपचे में लाओ । 

चेला भोला दौड़कर बाहर गया और एक खद्दर धारी व्यक्ति को लेकर आया । उस आदमी के लाल दमकते चेहरे को देखने से ही लगता था कि वो माँ के दूध के बाद केवल जूस का ही सेवन कर रहा है । उसने  हमें देखकर अपना पंजा हिलाया । 

भोला शंकर ने उसे तुरंत टोका - अबे, कुटिल मुनि ! महाराज ये हैं , तू इन्हे आशीर्वाद देने आया है या लेने । चरण स्पर्श कर और महाराज को अपना पंजा हिलाने दे ।   

कुटिल मुनि ने कहा - क्षमा करें महाराज , हमारा धर्म एक ही ईश्वर की पूजा करने की इजाजत देता है और राजमाता के सिवा किसी के आगे अपना सर नहीं झुकाते । 

हमने कहा - वाह रे मेरे कोहेतूर , जब राजमाता के चरणवन्दन में कोई तकलीफ नहीं तो फिर वन्देमातरम कहने में क्या दिक्कत है ? 

भोला शंकर अपनी दक्षिणा पेंशन का मामला बिगड़ता देख बीच में बोल पड़ा - जाने दें महाराज , नादान है । आप तो इन्हे बताये की सरकार बनेगी की नहीं ? 

हमने कहा- खैर चाहे कुछ भी हो जाये पर मैं दावे के साथ कहता हूँ कि सरकार बनना तय है ।  

इतना सुन कुटिल मुनि की बाँछे खिल गई और अपना चरित्र बदलकर साष्टाँग प्रणाम किया और जोर से बोला - वन्देचीनीउँगलीमहाराज । 

कुछ समय बाद भोला दूसरे क्लाईंट को लेकर आया । माथे पर कुमकुम चन्दन से बना त्रिशुल , काँधे में गेरूआ दुपट्टा । देखने से ही लगता था कि नया नया दीक्षा लिया है और किसी बड़े सप्लाई आर्डर की फिराक में है । 

सामने आते ही उसने अपनी तीन उँगली निकाली और बोला - महाराज नमो नमो । 

भोला शंकर भड़क गया ,  बोला - अबे नवीन दीक्षित, तू यहाँ कोई रैली में नहीं आया है । चुनाव खतम हो गये हैं, अपनी तीनों उँगली अन्दर रख ।  अगर महाराज ने अपनी चीनी उँगली कर दी तो फिर ना उठ पायेगा ना बैठ पायेगा । तमीज से प्रणाम कर  । 

दीक्षित सकपकाया और सर झुकाते हुए बोला - प्रणाम , भाई साहब । 

भोला ने भुनभुनाते हुए मेरे कान में कहा - महाराज , इनकी यही दिक्कत है , अपने दादा के उम्र के लोगों को भी भाईसाहब कहते हैं । 

हमने कहा - क्या मतलब है तेरा , हम क्या इतने उम्रदराज है ? 

भोला ने कहा - नहीं महाराज , हम तो यूँ ही बता रहें है - जस्ट फॉर यूवर काईण्ड इंफोर्मेशन । 

अच्छा , फेर ठीक है । और हमने उसके तंत्र मंत्र पर नैसर्गिक विश्वास के चरित्र को भाँप कर कुछ बुदबुदाया और अपनी चीनी उँगली को इधर उधर हिलाते हुए कुछ गणना करने जैसा अभिनय कर कहा -  अखबार , सर्वे चाहे कुछ भी कहें , सरकार तो बननी तय है  । 

दीक्षित का चेहरा कमल जैसा खिल उठा और हाथ जोड़कर बोला - महाराज के चरणों में कोटि कोटि प्रणाम । 

फिर जोर से एक नारा लगाया " कहो दिल से ... चीनी उँगली महाराज फिर से ।"   


भोला दोनो को किसी तरह विदा कर पुन: वापस आया और बोला - महाराज आप तो कभी झूठ बोलते नहीं फिर आज क्यूँ ? 

हमने कहा - अबे हमने न कभी झूठ बोला है और ना बोलेंगे । 

भोला चिढ़ते हुए बोला - तो ई बताओ इन दोनो पार्टी का सरकार कैसे बनेगा ?  क्या दूनो पार्टी मिलकर सरकार बनायेंगे ? 

हमने कहा - बेटा भोला शंकर ना तो राजमाता कभी ठीक से हिन्दी बोल पायेंगी और ना नमो टोपी पहनेगा इसलिए गठजोड़ का तो कोई चांस ही नहीं है ।

तो फिर दोनो की सरकार कैसे बन सकती है ? बेवकूफ बनाने की भी हद होती है ? - भोला अब लगभग करूणा बुआ के तेवर में आने लगा था । 


हमने उसके तेवर को भाँप अटल स्वर में कहा - देख बे , हमने दोनो को कहा है कि सरकार का बनना तय है लेकिन ये अभी तक नहीं कहा "किसकी बनेगी"  

चल जा और नहाकर आ , मुझे कुछ जलने की बदबू आ रही है । 

रविवार, 3 नवंबर 2013

नरकरूप चौदस कथा

चेला भोला शंकर आज शाम को पिटकर आया ।
हमने पूछा अबे क्या हुआ बे ? ये तेरा चेहरा आज इतना साम्यवादी क्यूँ लग रहा है ?

भोला बोला क्या बताऊँ महाराज , कल आपने कहा था ना के नरक चौदस में जाकर पटाखा ले आना ।

हा त साले तुम क्या सीधे नरक चले गये थे या पटाखे की दुकान पर आग लग गई ?

नहीं महाराज, हम बाजार गये , देखा त डबल चेचीस टाईप की महरारू भी पटाखा लग रहीं थी । साले ये कमबख्त मेरे दो अनमोल आँख मुझसे बगावत कर दिये और बिल्कुल आशाराम के चरित्तर के जैसे किसी ना किसी महरारू की ओर अपनी दिशा कर रहे थे । हमारी गलती इतनी हुई के जब हम दुकानदार से ये पूछ रहे थे के ये अनार कितने की है ? ये फुलझड़ी कितने की है ? उस वक्त भी ये बगावत जारी रहा । साले कुछ मुस्टण्डे टाईप के समाजसेवियों ने मेरे आँखों के जेहनी बगावत का सारा पुण्यप्रताप मेरे पूरे चेहरे में उड़ेल दिया । मैंने पूछा हरी ॐ बोलना पड़ेगा तो सालों ने मेरे तशरीफ को भी इज्जत बख्श दी ।

अच्छा त साले ये बात है ?

लेकिन महाराज इ बताओ के दीपावली तो कल है । इ महरारू लोग आज काहे इतना डेंटिंग पेंटिंग करवाया है?

अबे आज रूप चौदस है ।

लेकिन आज त नरक चौदस है ।

अबे नरक चौदस त हमारे लिए है । मेहरारू लोगन के लिए आज रूप चौदस है ।

महाराज बात कुछ समझ नहीं आई । दीपावली का बख्शीस के रूप में आज यही ज्ञान समझा दो

त सुन बे ....  नरकरूप चौदस कथा

   एक समय की बात है, शांति लाल नामक एक पत्नीपीड़ित पति था। वह बहुत ही निरीह और दुखी पुरूष था। सदैव
 पत्नी के सेवा कार्यों में लगा रहता था। जब उनका अंतिम समय आया तो यमराज के दूत उसे लेने के लिए आये। वे दूत शांति लाल को नरक में ले जाने के लिए आगे बढ़े। 

यमदूतों को देख कर शांति लाल आश्चर्य चकित हो गया और उसने पूछा- "मैंने तो कभी कोई अधर्म या पाप नहीं किया है तो फिर आप लोग मुझे नर्क में क्यों भेज रहे हैं। कृपा कर मुझे मेरा अपराध बताइये, कि किस कारण मुझे नरक का भागी होना पड़ रहा है । 

शांति लाल की करूणा भरी वाणी सुनकर यमदूतों ने कहा- " अबे शांति लाल एक बार तुम्हारे द्वार से चीनी उँगली महाराज ( याने के हम ) बिना दारू पिये प्यासा ही लौट गया था, जिस कारण तुम्हें नरक जाना पड़ रहा है।

शांति लाल ने यमदूतों से उलाहना देते हुए कहा कि मैं पृथ्वी पर ही अपनी पत्नी से पीड़ित होकर नारकीय जीवन जी रहा हूँ मुझे नरक ले जाकर क्या फायदा? ले जाना है तो मेरी पत्नी को ले जाओ। वो अनअथराईज्ड रूप से स्वर्ग का आनन्द ले रही है। शांति लाल का कथन सुनकर यमदूत विचार करने लगे और हॉटलाईन पर यमराज से डेथ वारंट में नाम परिवर्तन हेतु अनुशंसा कर अनुमति माँगने लगे।

यमराज ने मामले की गंभीरता को देखते हुए चित्रगुप्त को आदेश दिया – चित्रगुप्त, तत्काल शांतिलाल के डेथवारंट वाली नोट शीट में उसकी पत्नी का प्रपोजल डालकर लाओ और बैकडेट में मुझसे एप्रुवल साईन करवाकर पृथ्वीलोक में फैक्स करो।

चित्रगुप्त भी मंत्रालय का वरिष्ठ एवं अनुभवी लेखाधिकारी था । उसने नोट शीट में लिखा – 

गत पृष्ठ के आगे.....
यमराज महोदय के मौखिक निर्देशानुसार शांतिलाल के स्थान पर उसकी पत्नी के आत्माहरण के प्रस्ताव प्रशासकीय स्वीकृति हेतु प्रस्तुत है, किन्तु महोदय के ध्यान में इस तथ्य को लाना आवश्यक है कि शांतिलाल की पत्नी ही नहीं, वरन उस जैसी सारी पत्नियाँ पृथ्वीलोक में अपने अपने पतियों के जीवन में नरकमय वातावरण बनाये रखने में पूरे मनोयोग से कार्यरत है। ऐसी सारी भद्र महिलायें यमलोक के नर्क विभाग के कर्मचारियों से भी अधिक कार्य-कुशलता से बिना वेतन कार्य कर रहीं हैं। वास्तव में इन्हे पृथ्वीलोक में नर्क विभाग से प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत कर्मचारी का दर्जा दिया जाना चाहिए। यदि ऐसी स्त्रियों का आत्माहरण कर यमलोक लाया जायेगा तो यमलोक की आर्थिक और प्रशासनिक व्यवस्था बिगड़ने के साथ साथ पृथ्वीलोक में यमलोक के यातनाओं के प्रचार-प्रसार पर अत्यंत प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, साथ ही शांतिलाल जैसों के पत्नी पीड़ा से मुक्त हो जाने पर उन्हे पृथ्वीलोक में नारकीय जीवन नहीं मिलने के कारण उन्हे भी नर्क में शिफ्ट करना पड़ेगा जिससे नर्क लोक में एकोमेंडेशन की समस्या विकराल रूप लेकर भगदड़ की स्थिति निर्मित करेगी।  

इसलिए पृथ्वीलोक पर ही कुछ ऐसी व्यवस्था बनाई जाय कि ऐसी सभी स्त्रियों को नर्क विभाग की प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत कर्मचारी घोषित कर उन्हे बिना वेतन कार्य करने के बदले मानदेय स्वरूप उनके पति के खर्चे से स्वर्गिक आनन्द प्रदान हो सके और वे बिना किसी रूकावट के अपने पतियों को नर्कविधान अनुसार कष्ट प्रदान करती रहें ।

इस व्यवस्था की वार्षिक समीक्षा के लिए एक निश्चित तिथि भी निर्धारित किये जाने हेतु प्रस्तावित है जिसमें शांतिलाल जैसे पुरूष यमराज के नाम से भयाक्रांत होकर आप श्रीमान की पूजा अर्चना करें और उनकी पत्नियाँ के प्रतिनियुक्ति पर एक वर्ष पूर्ण होने पर वार्षिक आनंदोत्सव का आयोजन किया जाय । 

यदि महोदय सहमत हों तो महोदय के अवलोकनार्थ एवं अनुमोदनार्थ प्रस्तुत ....  सी.गुप्त , वरिष्ठ सचिव , लेखा विभाग

यमराज ने इस अद्भुत टीप से प्रभावित होकर अपना इरादा बदला और लिखा ... 

अनुमोदित , यथा प्रस्तावित ।
शांतिलाल के आत्माहरण आदेश निरस्त किया जाय और वार्षिक समीक्षा के लिए कार्तिक कृष्णपक्ष चतुर्दशी की तिथि निर्धारित की जाती है ।

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इस तरह प्रतिवर्ष कार्तिक कृष्णपक्ष चतुर्दशी की तिथि को शांतिलाल के प्राण बचने के कारण पुरूषों द्वारा इस दिवस को “नरक चौदस” एवं अपने पति को प्रताड़ित किये जाने के कर्तव्य को वैधानिक दर्जा दिये जाने पर स्त्रियों द्वारा आनंदोत्सव के रूप में इसे “रूप चौदस” के रूप में मनाया जाने लगा।   


शुक्रवार, 25 अक्टूबर 2013

चीनी उँगली की जय

 नामांकन दाखिले के बाद चीनी उँगली महाराज याने के हमारे आश्रम में विजय श्री का आशीर्वाद लेने आ रहे उम्मीदवारों को महाराज बड़े विश्वास से एक ही वरदान दे रहे थे ...  

जा बच्चा , विरोधी की हार सुनिश्चित है , इसे ब्रह्मा भी नहीं बदल सकता । 

और जैसे ही उम्मीदवार लालबत्तीधारी विशिष्ठ व्यक्ति बन जाने पर महाराज को मोटा चढ़ावा के साथ पुन: चरण दर्शन का संकल्प लेकर चरण स्पर्श करता तो हमारे पीछे खड़ा  चेला भोला शंकर पूरे जोश और उत्साह से प्रश्न वाचक मुद्रा में चिल्लाता  - चुँगली महाराज की ?????   

प्रत्याशी नेता और साथ विचरण कर रहे उसके अनुचर समवेत स्वर में जवाब देते हैं - "जय" 


ये सिलसिला व्यस्तता के साथ दिन भर अनवरत चलता रहा । देर रात्रि पहली फुर्सत में हमने भोला शंकर से पूछा - क्यूँ बे , ये चीनी उँगली महाराज से हम कब चुँगली महाराज हो गये ? 

भोला गंभीर होकर बोला - महाराज ये टेक्नीकल और प्रोफ्रेशनल दूनो मामला है । 

हमने कहा - वो कैसे बे ? 

भोला बोला - देखिए जैसे पीत + अम्बर = पीताम्बर , गज + आनन = गजानन ,
लम्ब + उदर = लम्बोदर , ......  ठीक वैसे ही चीनी + उँगली = चुँगली । 


हमने कहा - अबे लेकिन चीनी + उँगली = चींनुगली होना चाहिए ये चुँगली कैसे ? 

भोला के आँख में एक दिव्य चमक आ गई । लगा जैसे वो मुझे ज्ञान देकर अपनी गुरू दक्षिणा का फाईनल पेमेंट करने वाला है । वो बोला - महाराज चीनुंगली "राईम" में नहीं आता और लोगों की जबान में फिट नहीं होगा , और फिट नहीं होगा तो जाहिर है ये नाम हिट नहीं होगा और हिट नहीं होगा मतलब मार्केटिंग स्ट्रेटजी फेल इसलिए चुँगली राईम में बैठता है देखना ये मार्केट में हिट हो जायेगा । 

इसे कहते हैं प्रोफेशनलीज्म , समझे महाराज ? 

हमने कहा - तू अब भोला नहीं रहा बे , अब तुझे मेरी जरूरत नहीं । 

ये सुनकर भोला चकराया और अपनी औकात को धड़ाम से जमीन में पटकर हाथ जोड़कर फरमाया - महाराज पब्लिकली कहना अश्लील होगा लेकिन सच्चाई तो यही है कि पेण्डुलम चाहे कितना भी बड़ा हो जाय पर लटकता तो नीचे ही है ना । 

खैर छोड़िये महाराज , मुझ अकिंचन को क्षमा कर जिज्ञासा को दूर करें । 

हमने कहा - अब तुझे कौन सी जिज्ञासा है बे ? 

भोला बोला - महाराज , मैने कभी आपको झूठ बोलते नहीं सुना , लेकिन आज आप सभी उम्मीदवारों को एक ही वरदान दे रहे थे " विरोधी की हार सुनिश्चित है , इसे ब्रह्मा भी नहीं बदल सकता " । सबके विरोधी हारेंगे तो जीतेगा कौन ? और जीतेगा भी तो कोई एक ही ना ? सबके सब जीत कैसे पायेंगे ? 

हमने कहा - देख बोला , इनमें से कोई भी जीते , जीतने के बाद इन सबका एक ही विरोधी हो जाता है ....  वो है आम जनता ।

क्योंकि सत्ता - शक्ति का केन्द्र है , और आम जनता - दीन हीन दुर्बल । शक्ति और दुर्बलता , ये दोनो परस्पर विरोधी है इसलिए  

""  चुनाव में कोई भी जीते , आम जनता की हार सुनिचित है ।""  

भोला शंकर भक्तिभाव से दोनो हाथ जोड़कर बोला - महाराज की चरणों में कोटि कोटि प्रणाम । 

रविवार, 20 अक्टूबर 2013

पीले खजाने का स्वप्नदोष



चेला भोला शंकर ने सुबह सुबह सण्डे का सारा मजा किरकिरा कर दिया ।  हमें कुम्भकरण से रामदेव बाबा बनाने की नीयत से दरवाजे पर ही खड़े होकर जोर जोर से राग भैरव में चिल्लाया .... 

उठ जाग मुसाफिर भोर भई
अब रैन कहाँ जो तू सोवत है 
जो जागत है सो पावत है,
जो सोवत है वो खोवत है 
खोल नींद से अँखियाँ जरा
और अपने प्रभु से ध्यान लगा 
यह प्रीति करन की रीती नहीं
प्रभु जागत है तू सोवत है....

हमने भी नींद में ही उसे टरकाने के हिसाब से गुलाम अली का गजल चालू कर दिया ...
मकां के सब मकीं सोये पड़े हैं
हवा का शोर मुझसे कह रहा है 

जिसे मिलने तुम आए हो यहाँ पर
वो कब का इस मकां से जा चूका है 

लेकिन साला भोला ठहरा तो हमारा ही चेला , वो कहाँ टरकने वाला था ... रिप्लाई में एकदम साहित्यिक कविता ढकेला ...

जानता जब तू कि कुछ भी हो तुझे ब़ढ़ना पड़ेगा
,
आँधियों से ही न खुद से भी तुझे लड़ना पड़ेगा,
सामने जब तक पड़ा कर्र्तव्य-पथ तब तक मनुज ओ
मौत भी आए अगर तो मौत से भिड़ना पड़ेगा,
है अधिक अच्छा यही फिर ग्रंथ पर चल मुस्कुराता,
मुस्कुराती जाए जिससे ज़िन्दगी असफल मुसाफिर!
पंथ पर चलना तुझे तो मुस्कुराकर चल मुसाफिर।
याद रख जो आँधियों के सामने भी मुस्कुराते 
वे समय के पंथ पर पदचिह्न अपने छोड़ जाते  ....... 

हमने ना चाहते हुए भी निद्रादेवी की साधना को बीच में बलात भंग किया और उसकी कवितामयी ज्ञान को बीच में ही रोककर चिल्लाया – अबे बस कर बे गोपालदास की भटकती आत्मा ... नींद के आगोश से उठ गया हूँ , अब क्या दुनिया से भी उठवायेगा ?

भोला दौड़कर हमारे करीब आया और गुरू शिष्य परम्परा का जबरिया निर्वहन करते हुए अपने दोनों हाथों को मेरे घुटने से टकराया ।

हमने कहा - क्यूँ बे ? लम्बाई छोटी हो गई है या कमर में मोच आ गई जो तेरे कृतघ्न पंजे हमारे चरणकमल तक नहीं पहुँच पा रहें हैं ।

उसने बड़े दार्शनिक अंदाज में फरमाया – महाराज , फीट टचिन्ग ओल्ड फैशन हो गया है, अब लेवल जरा अप होकर नी टचिन्ग तक आ गया है । यही आजकल लेटेस्ट ट्रेण्ड है ।

हमने कहा – अच्छा बे, कल वो चड्डीनुमा जींस पहनी षोडषी कन्या ने जब लेटेस्ट ट्रेण्ड के हिसाब से तुझसे हल्लो बोलने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया था, तब तो तू उसे बड़ा दिव्यज्ञान दे रहा था कि वस्त्र भले ही कितने छोटे हो जाय पर हमने अपनी संस्कृति को छोटी नहीं करनी चाहिए । हम भारतीय हैं और परम्परानुसार हमें एक दूसरे को हाथ मिलाकर नहीं,  गले मिलकर अभिवादन करना चाहिए ।

भोला ने सहज आत्मस्वीकारोक्ति करते हुए कहा – वो तो महाराज, मैं उस समय जरा आशाराम बापू टाईप का संत-ई-मेंटल हो गया था ।

हमने कहा – चल कोई बात नहीं, ये नी टचिन्ग भी सम्मानजनक ही है, वरना आशाराम ने तो टचिन्ग के स्टैण्डर्ड को कुछ ज्यादे ही अप कर कमर के लेवल तक ले आया है ।  

खैर जाने दे, ये बता आज क्या जिज्ञासा लेकर आया है ?

भोला ने कहा – महाराज आज जिज्ञासा नहीं, शिकायत है ।

हमने कहा – साले आजकल तू प्रोबेशनर से ज्यादे प्रोफेशनल टाईप का बिहेब कर रहा है । बहुते शिकायत रहती है बे, तुझे । चल बता क्या कम्प्लेंट है ?

भोला ने कहा – महाराज, आजकल आपका हिन्दी बहुते ज्यादे खराब हो गया है, आप बात बात पे इंग्लिश वर्ड बहुते यूज करने लगे हैं ।

हमने कहा – अबे, हम रामदेव टाईप का मल्टीनेशनल महाराज बनने का सोच रहा हूँ, इही लिए बीच-बीच में इंग्लिश घुसाड़ना जरूरी हो गया है । साले तुम्हारे जैसे चपाटों से अब गुजारा तो सम्भव है पर फेमस नहीं हो पायेंगे, समझा ?

बस यही कम्प्लेंट था ? ... हो गया सेटीस्फाईड ?

भोला ने कहा – नहीं महाराज ई कम्प्लेन नेई है , ई त क्यू-रे-सीटी था । क्यू-रे-सीटी बूझते हैं ना महाराज ... क्यू-रे-सीटी मतलब जिज्ञासा ।

हमने कहा – अच्छा बेटा, अब हमें कोचिंग भी देने लगे हो ।

भोला ने कहा – नई महाराज, हम आपको कोचिंग दें, इत्ता औकात नई है आपका ।
हमने कहा – अच्छा ठीक है, सूरज को दिया मत दिखा । मेन कम्प्लेन का है ई बता ?

भोला ने कहा – महाराज, आपने परसों मुझे एक वरदान दिया था के रात को सपना में जो भी जगह देखेगा वहाँ पीला खजाना निकलेगा ।

हमने कहा – हाँ दिया था ?

भोला ने कहा – उ सच नहीं निकला ।

हमने कहा – अबे हम चीनी उँगली महाराज है और तू इत्ता भी नहीं जानता के चीनी माल का कोई गारंटी थोड़े ना होता है । बाबाओं के इस हार्ड काम्पीटिशन के दौर में गारंटी का उम्मीद भी नहीं करना चाहिए । चल गया तो टनाटन वरना बिका हुआ माल वापस नहीं होगा ।

लेकिन ई बता, साले तूने सपना क्या देखा था ?

भोला ने कहा – महाराज, मैनें परसों सपने में पुराने खण्डहर के तहखाने को देखा और कल जब अपने असिस्टेंट से उसका खुदाई कराया तो उसमें केवल बदबूदार कीचड़ निकला ।

हमने कहा – अबे शेखचिल्ली के आखिरी वंशज । साले जब सपना देखा तो पहले किसी महंत को बताना था।  डाईरेक्ट खुदाई करने क्यूँ चला गया ?

और सुन चीनी उँगली का वरदान कभी गलत नहीं होता । जिस जगह को तुमने सपने में देखा वो कालेज के पुराने गर्ल्स हॉस्टल का सेफ्टिक टैंक है ।  हमने तुमको वरदान दिया था ना, के पीला खजाना निकलेगा |  वो पीला खजाना ही है, सूख गया है इसलिए कलर चेंज हो गया है । 

और आईन्दा के लिए एक बात गाँठ बाँधकर रख ले , अगर सपने में जब कोई गर्ल्स हॉस्टल आये तो वह दिव्य बोध नहीं , एक बीमारी है, यह एक मानसिक दोष है, जिसे मेडिकल भाषा में स्वप्न दोष कहते हैं ।

अब जा उस खजाने को किसी खेत में फैलाकर आलू की खेती कर । सुना है जबर-दस्त पैदावार होती है ।