शनिवार, 21 जुलाई 2012

अमरनाथ यात्रा - भाग 1

बाबा बर्फानी कथा रहस्य




बाबा बर्फानी का प्रत्यक्ष आशीर्वाद एवं मेरा परम सौभाग्य कि इस वर्ष उनके दर्शन का अवसर मुझे प्राप्त हुआ । वास्तव में अमरनाथ यात्रा अपने नाम को चरितार्थ करती है “अमरत्व की यात्रा”  । 46 किमी की यह यात्रा व्यक्ति को स्वर्ग की अनूभूति कराती है । यदि आप उड़न खटोले (हैलीकाप्टर) से वहाँ पहुँचते हैं तो उसे मेरे अनुसार अमरनाथ यात्रा के स्थान पर अमरनाथ दर्शन कहना उचित होगा । स्वार्गिक अनुभूति के लिए बर्फीली पहाड़ियों में संकरे और खड़ी चढा‌ई वाले पगडंडियों पर पैदल यात्रा ही करना होगा । यद्यपि पथरीली , बर्फीली, संकरी, तीक्ष्ण चढ़ाई वाले इस रास्ते में एक ओर गहरी खाई है जिस पर कभी कभी मौत से केवल एक डगमगाते कदम का ही फासला होता है लेकिन फिर भी भक्तों का उत्साह और भोले के जयकारे से सारा भय ऐसे काफूर हो जाता है जैसे आदित्य के उदय से ओस की बूँदे ।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माता पार्वती ने एक बार बाबा श्री विश्वनाथ देवाधिदेव महादेव से शिकायती लहजे में प्रश्न किया कि आप तो अजर अमर है और मुझे ही हर जन्म के बाद नए स्वरुप में आकर पुन: वर्षो की कठोर तपस्या के बाद आपको प्राप्त करना होता है | जब मुझे आपको ही प्राप्त करना है तो बार बार मेरी इतनी कठोर परीक्षा क्यूँ ? आखिर आपके अजर अमर होने का रहस्य क्या है ? महाकाल ने पहले यह गूढ़ रहस्य बताना उचित नहीं समझा किंतु स्त्री हठ के आगे महादेव की भी न चली | अन्ततोगत्वा देवाधिदेव महादेव शिव ने माता पार्वती को अपनी साधना की अमर कथा कहने हेतु उपयुक्त एवं निर्जन स्थान की तलाश की एवं हिमालय की पहाड़ियों में एक गुफा में इसका महात्म्य एवं रहस्य बताया जिसे हम अमरत्व की कथा के रूप में जानते है । इसी परम पावन गुफा को हम अमरनाथ गुफा के रूप में प्रसिध्द हुआ |

पवित्र गुफा में बर्फ से प्राकृतिक शिवलिंग का निर्मित होना है। प्राकृतिक हिम से निर्मित होने के कारण इसे स्वयंभू हिमानी शिवलिंग भी कहते हैं। गुफा की परिधि लगभग डेढ़ सौ फुट है और इसमें ऊपर से बर्फ के पानी की बूँदें जगह-जगह टपकती रहती है। यहीं पर एक ऐसी जगह है, जिसमें टपकने वाली हिम बूंदों से लगभग बीस फुट लंबा शिवलिंग बनता है। चन्द्रमा के घटने-बढ़ने के साथ-साथ इसका आकार भी घटता-बढ़ता रहता है। श्रावण पूर्णिमा को यह अपने पूरे आकार में आ जाता है और अमावस्या तक धीरे-धीरे छोटा होता जाता है। आश्चर्य की बात यह है कि यह शिवलिंग ठोस बर्फ का बना होता है। जबकि गुफा में आमतौर पर कच्ची बर्फ ही होती है जो कि हाथ में लेते ही भुरभुरा जाए। मूल अमरनाथ शिवलिंग से कई फुट दूर गणेश, भैरव और पार्वती के वैसे ही अलग -अलग हिमखंड हैं। इस गुफा में बाबा बर्फानी के दिव्य दर्शन हेतु अमरनाथ यात्रा हिन्दी मास के आषाढ़ पूर्णिमा से श्रावण मास की पूर्णिमा तक होती है, जो अंग्रेजी माह जुलाई से अगस्त तक लगभग 45 दिन तक चलती है।



देवाधिदेव महादेव ने माता पार्वती से एकान्त व गुप्त स्थान पर अमर कथा सुनने को कहा ताकि इस अमर कथा को कोई भी जीव न सुन ले क्योंकि यदि कोई इसका श्रवण कर लेता वह अमर हो जाता। इस कारण भोलेनाथ ने माता पार्वती को लेकर गुप्त एवं निर्जन स्थान की ओर चल पड़े। सर्व प्रथम भगवान भोलेनाथ नें अपने शरीर पर लिपटे असंख्य नागों को एक स्थान पर छोड़ दिया जो अनंतनाग के नाम से जाना जाता है तत्पश्चात अपनी सवारी नन्दी को जिस स्थान पर छोड़ दिया उसे बैलगाम कहते थे जो कालांतर में पहलगाम के नाम से जाना जाने लगा, इसीलिए बाबा अमरनाथ की यात्रा अननंतनाग होते हुए पहलगाम से शुरू करने का तात्पर्य या बोध होता है। आगे चलने पर शिव जी ने अपनी जटाओं से चन्द्रमा को एक स्थान पर अलग कर दिया जो अब चन्द्रबाड़ी से अपभ्रंश होकर चंदनबाड़ी कहलाता है फिर कुछ दूर चलकर भोलेनाथ ने शरीर में लिपटे पिस्सुओं को एक पहाड़ी की चोटी पर तजा जनश्रुति के अनुसार वह स्थान ही पिस्सुटाप है । उपर्युक्त निर्जन स्थान की खोज में भोलेनाथ ने कुछ दूर जाकर कंठाभूषण शेषनाग को हिमाच्छादित पर्वतों से घिरे एक झील पर छोड़ दिया इस प्रकार इस पड़ाव का नाम शेषनाग पड़ा । यही झील लिद्दर नदी का उद्गम स्थल भी है । यात्रा के अगले पड़ाव में खड़ी चढ़ाई के पश्चात एक पहाड़ी के शीर्ष पर उन्होने अपने पुत्र गणेश को भी छोड़ दिया यह स्थान ही गणेश टॉप कहलाता है और उस पर्वत को महागुणास का पर्वत भी कहा जाता है। इस महागुणास दर्रे के पश्चात ढलान है जिसके बाद पंचतरणी का सुंदर स्थल आता है । जटा स्थित जीवनदायिनी पांचों तत्वों को समाहित की हुई गंगाजी को उन्होने इस स्थान पर छोड़ा इसकारण यह स्थल पंचतरणी कहलाया । पंचतरणी से खड़ी चढ़ाई के पश्चात संगम टॉप नामक स्थान आता है इसी स्थान पर बालटाल से आने वाला मार्ग भी मिलता है । इस बर्फीली चोटी से आपको यात्रा में पहली बार बाबा बर्फानी की पवित्र गुफा दृश्यमान होती है। इसके बाद भगवान भोलेनाथ माता पार्वती के साथ एक गुप्त गुफा में प्रवेश कर गये। यही वह गुफा है जहाँ भोलेनाथ पवित्र बाबा बर्फानी के रूप में अपने दिव्यदर्शन देते हैं । कोई व्यक्ति, पशु या पक्षी गुफा के अंदर प्रवेश कर अमर कथा को न सुन सके इसलिए शिव जी ने अपने चमत्कार से गुफा के चारों ओर आग प्रज्जवलित कर दी। फिर शिव जी ने जीवन की अमर कथा मां पार्वती को सुनाना शुरू किया। कथा सुनते-सुनते देवी पार्वती को नींद आ गई और वह सो गईं जिसका शिव जी को पता नहीं चला. भगवन शिव अमर होने की कथा सुनाते रहे | इस समय दो सफेद कबूतर श्री शिव जी से कथा सुन रहे थे और बीच-बीच में गूटर-गूं की आवाज निकाल रहे थे. शिव जी को लग रहा था कि माँ पार्वती कथा सुन रही हैं और बीच-बीच में हुंकार भर रहीं हैं. इस तरह दोनों कबूतरों ने अमर होने की पूरी कथा सुन ली |

कथा समाप्त होने पर भोलेनाथ का ध्यान माता पार्वती की ओर गया जो सो रही थीं | शिव जी ने सोचा कि पार्वती सो रही हैं तब इसे सुन कौन रहा था | तब महादेव की दृष्टि इन कबूतरों पर पड़ी ।  महादेव कबूतरों पर क्रोधित हुए और उन्हें मारने के लिए तत्पर हुए | इस पर कबूतरों ने कहा - हे प्रभु हमने आपसे अमर होने की कथा सुनी है यदि आप हमें मार देंगे तो अमर होने की यह कथा झूठी हो जाएगी | इस पर शिव जी ने कबूतरों को जीवित छोड़ दिया और उन्हें आशीर्वाद दिया कि तुम सदैव इस स्थान पर शिव पार्वती के प्रतीक चिन्ह के रूप निवास करोगे |



अत: यह कबूतर का जोड़ा अजर अमर हो गया। माना जाता है कि आज भी इन दोनों कबूतरों का दर्शन भक्तों को यहां प्राप्त होता है | और इस तरह से यह गुफा अमर कथा की साक्षी हो गई व इसका नाम अमरनाथ गुफा पड़ा। जहां गुफा के अंदर भगवान शंकर बर्फ के प्रकृति द्वारा निर्मित शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं। पवित्र गुफा में मां पार्वती के अलावा गणेश के भी अलग से बर्फ से निर्मित प्रतिरूपों के भी दर्शन करे जा सकते हैं।
इस पवित्र गुफा की खोज के बारे में पुराणों में भी एक कथा प्रचलित है कि एक बार एक गड़रिये को एक साधू मिला, जिसने उस गड़रिये को कोयले से भरी एक बोरी दी। जिसे गड़रिया अपने कन्धे पर लाद कर अपने घर को चल दिया। घर जाकर उसने बोरी खोली। वह आश्चर्यचकित हुआ, क्योंकि कोयले की बोरी अब सोने के सिक्कों की हो चुकी थी। इसके बाद वह गड़रिया साधू से मिलने व धन्यवाद देने के लिए उसी स्थान पर गया, जहां पर वह साधू से मिला था। परंतु वहां पर उसे साधू नहीं मिला, बल्कि उसे ठीक उसी जगह एक गुफा दिखाई दी। गड़रिया जैसे ही उस गुफा के अंदर गया तो उसने वहां पर देखा कि भगवान भोले शंकर बर्फ के बने शिवलिंग के आकार में स्थापित थे। उसने वापस आकर सबको यह कहानी बताई और इस तरह भोले बाबा की पवित्र अमरनाथ गुफा की खोज हुई । ये गुफा लगभग 5,000 साल पुरानी है और समुद्रतल से 13,600 फुट की ऊँचाई पर स्थित है। इस गुफा की लंबाई (भीतर की ओर गहराई)19 मीटर और चौड़ाई 16 मीटर है। गुफा 11 मीटर ऊँची है।

10 टिप्‍पणियां:

  1. Sundar Prawaas Warnan. Bhaavanaaon ko jagaanewaalee rasnirmiti.

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  2. **** उपयोगी तथ्य और रुचिकर प्रस्तुति ..धन्यवाद ****

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  3. बहुत अच्छी जानकारी ..धन्यवाद ...........

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  4. बहुत ही सुन्दर वर्णन किया है ,संजय भाई ऐसा लगरहा था जैसे मै स्वयम यात्रा कर रहा हू |
    हर हर महादेव ,,,,जय बाबा बर्फानी

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  5. अत्‍यंत ही रोचक तरीके से आपने यह कथा लिखी है, वैसे तो यह कथा मैंने पहले टुकड़ों मे सुनी थी परन्‍तु पूर्ण रूप से याद नही थी, आपने संकलित कर एक संग्रहणीय ब्‍लाग लिखा है, आप सौभाग्‍यशाली है जो आपको इस पवित्र गुफा तक जाने का सुअवसर मिला

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  6. sundar varnan kiya hai aapne...

    aap mein se koi aisi hi dharmik sthalon ki yatron ko padnacha chahta ho to iss website ko dekhin..

    http://www.aachman.com/

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