मंगलवार, 23 सितंबर 2014

श्राद्ध तर्पण

शहर के पॉशकालोनी की सबसे बड़ी कोठी में हीरों का व्यापार करने वाले युवाहृदयधारी वयोवृद्ध ने एक नवयौवना महिला से विवाह रचाया । इस बेमेल गठबंधन पर उच्च स्तरीय महिला परिचर्चा हेतु आसपड़ोस की फिजिकली अनफिट पड़ोसनो की ड्राईंग रूम पालिटिक्स दुर्भाग्य से आज हमारे घर आयोजित हो गई थी, सो मजबूरी में बाहर बरामदे में मच्छरो की संगीत सभा में खुद का रसास्वादन इसलिए करवाना पड़ रहा था क्योंकि आज कामुक मन में पड़ोसनो के ज्ञान चर्चा से लाभांवित होने की तीव्र लालसा उमड़ आई थी, अतएव पूरा ध्यान उसी ओर केन्द्रित था। उनको इसकी शंका न हो इसलिए खुद को कार्य में लीन दिखाने के उद्देश्य से बेमन से फेसबुक पर उँगली करने का अभिनय कर रहा था ।


उनकी निजी गुफ्तगू की एक से बढ़कर एक अत्यंत रूचिकर जानकारी मच्छरों के लिए अनधिकृत प्रवेश के उद्देश्य से बनाये गये जालीदार दरवाजे से छन छन कर हमारे कानों में बेईरादा टकरा रही थी | सारी पड़ोसन पहली बार किसी मुद्दे पर दिग्विजयी राय बनाती हुई कह रही थी कि करमजली ने इस बुढ्ढे में क्या देखकर उसका वरण कर लिया । अच्छी खासी सुन्दर है, उसे तो कोई भी बाँका नौजवान आसानी से मिल जाता । उनमें से एक असुर मर्दनी तत्व ज्ञानी विदुषी महिला ने इसका गूढ़ रहस्योघाटन करते हुए बताया कि वो करमजली नहीं , बहुत ही चालाक महिला है । मुआ पिलपिले बुढ्ढे के पास बेशुमार दौलत है, यही देखकर लार टपक गई होगी । उसके दौलत पर ऐश करेगी और बाकी जरूरत की चींजे इधर उधर मुँह मार के पूरी करेगी । 

खैर पड़ोसनों के गोलमेज सम्मेलन की बाकी बातें यहाँ उद्धृत कर बड़ी बिन्दियों वाली महिला मुक्ति सेना और स्त्री अधिकारों के लिए लड़ने वाले पत्नी प्रताड़ित वामहस्ती पुरूषों को मेरे खिलाफ मोर्चाबन्दी का कोई अवसर नहीं देना चाहता । लेकिन आंतरिक सत्य तो यही है कि पड़ोसन परिचर्चा से प्राप्त ज्ञान से उस नवयौवना महिला के सौंदर्यविहार हेतु चीनी उँगली का मन कुलाँचे मार रहा था ।



काफी दिनों बाद आज अचानक वही युवा बुजुर्ग मुझसे टकरा गये । बोले- महाराज, परसों आप फ्री हैं क्या ? 


हमने उनसे सम्बन्ध प्रगाढ़ करने के उद्देश्य से कहा- सेठजी, दफ्तर से कहाँ फुर्सत मिलती है लेकिन आपके लिए वक्त न निकाल पाये तो ऐसी भी व्यस्तता नहीं है । 

उनकी बुझती हुई मोतियाबिन्द नजरों में चमक आ गई , बोले – परसों, श्राद्धपक्ष मोक्ष अमावस्या है, मेरे पारिवारिक पुरोहित तीर्थ यात्रा हेतु कल रात को बैंकाक पटाया जा रहे हैं, यदि आप ब्राह्मण भोज के लिए मेरी कुटिया में आ सकें तो बड़ी मेहरबानी होगी । 

हमने कहा – सेठजी, माशाल्लाह अभी तो आप अच्छे खासे स्वस्थ है , तीन दिन में ऐसी क्या अनहोनी हो जायेगी जो आप श्राद्ध कर रहें हैं । 

उन्होने अपना क्रोधदमन करते कहा – महाराज, आपकी उँगली करने की आदत जायेगी नहीं । कम से कम मेरी उम्र का खयाल तो कीजिए । 

हमने मन ही मन सोचा – साले, शादी करते समय तुमने खुद किया था क्या? और मुस्कुराते हुए कहा – सेठजी, आप वक्त मुकर्रर कर दें । मैं तीन घंटे पहले ही चला आऊँगा ।  

उन्होने कहा – मेरा ड्राईवर आपको लेने आ जायेगा ।

खैर नीयत तिथि और समय पर हम उनके घर पहुँच गये । उनका निश्तेज मुख मण्डल अनेक स्थानों पर नीलवर्ण लिए कुछ उभरा हुआ सा दिखाई दे रहा था । मुझे देखते ही बोले- महाराज, मेरे पारिवारिक पुरोहित ने फोन पर बताया कि आज मूल नक्षत्र है इसलिए ब्राह्मण को पका हुआ भोजन न करवा कर अन्न और द्रव्य दान ही करें ।  

हमने सहर्ष उनसे दान ग्रहण किया तो वे चरण स्पर्श के उद्देश्य से श्रद्धानवत होकर हमारे पैरों की ओर झुके । हम पीछे हटते हुए बोले – ये क्या कर रहें हैं आप ? आप उम्र में मेरे पिता समान है , आपको मेरा चरण स्पर्श नहीं करना चाहिए । 

उन्होने कहा – महाराज, आप ब्राह्मण देवता हैं , शास्त्रों के अनुसार आपकी उम्र चाहे जो भी हो मुझे चरण स्पर्श करना ही चाहिए । 

हमने कहा- सेठजी, शास्त्रों के हिसाब से तो मुझे आपका चरण स्पर्श करना चाहिए।

उन्होने कहा – कैसे ? 

हमने कहा – देखिए आपने दान दिया और मैने लिया । उस हिसाब से आप दाता हुए और मैं ग्राही । नियमानुसार ग्राही को दाता के चरण स्पर्श करना चाहिए ।

वे गद्गद हो गये और बोले – महाराज, आपने तो ब्रह्मज्ञान कह दिया । आप उन विरलों में हैं, जो केवल जन्म से नहीं, ज्ञान से भी ब्राह्मण हैं । 

अपनी वास्तविक प्रशंसा सुन हम आत्मविभोर हो गये और बोले-  सेठजी, आप भी असली हीरों के जौहरी है । 

फिर अपनी पुरानी दबी हुई इच्छा को तृप्त करने हेतु मानसिक श्राद्ध के उद्देश्य से उनसे पूछा -  सेठानी जी दिखाई नहीं दे रही ? 

उन्हे हमारे प्रश्न पर शायद कुछ शंका हुई इसलिए बड़े रूखे स्वर में पूछा – क्यूँ ?

हमने तत्काल उनकी शंका को पहचाना और बात घुमाते हुए कहा – उनका भी चरण स्पर्श कर लेता तो अच्छा रहता । आखिर वो आपकी अर्धांगिनी है उस नाते मेरे दान में आधा हिस्सा उनका भी है । 

हमारे कौटिल्य तर्क से उनकी शंका जाती रही और अपनी पत्नि की अनुपस्थिति का रहस्य उजागर करते हुए बोले – महाराज वो आज सुबह की फ्लाईट से संत समागम हेतु थाईलैण्ड गई हुई हैं ।

हमने लगभग आह भरते हुए कहा  - चलिए आज हमारी किस्मत में आधा ही पुण्य पाने का योग रहा होगा । जब वो आयेंगी तो बचे हुए आधे पुण्य ग्रहण करने हेतु फिर आ जाऊँगा । 

लेकिन वो चोट खाया असली जौहरी था । हमें ताड़ते हुए बोला – महाराज , आपको दुबारा आने की जरूरत नहीं । आप मेरे चेहरे को स्पर्श कर लें , ये जो नीले उभार हैं , ये उन्ही के चरण कमल के हैं जो कल रात थाईलैण्ड जाने से मना करने पर प्रेमावश में उसने उभारे थे । 

हमने उनका माथा चूमा और बोला – सुर्खरू होता है इंसा ठोकरे खाने के बाद । 

वैधानिक सूचना – इस प्रसंग का अक्षय कुमार के बहन –जीजा से कोई सम्बन्ध नहीं है ।   

   

3 टिप्‍पणियां:

  1. सुखर्रू होता है इन्सान भी हसीना से लात खाने के बाद। वाह!

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  2. ये जो नीले उभार हैं उन्हीं के चरण कमलो का प्रतिफल हैं...

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