रविवार, 16 मार्च 2014

मुंशी जी


भोला शंकर की उम्र कोई चौदह पन्द्रह साल रही होगी जब उसके मजदूर पिता का साया उठ गया । घर में बीमार माँ और चार बहने यही उसकी कुल जमा सम्पत्ति थी । किसी तरह एक होटल में काम कर अपने परिवार का पेट भरने का उपक्रम करने में पूरी युवावस्था गुजर गई । लेकिन पढ़ने के शौक ने उसे रात को सड़क किनारे लगे स्ट्रीट लाईट के खम्बे के नीचे किताबों से दोस्ती नहीं टूटने दी और कामर्स में ग्रेजुएट हो गया । 

किसी तरह उम्र के तीसवें बसंत ने जाते जाते धक्के मारकर सरकारी नौकरी दिलवा गई । अब उसके जीवन में कुछ विश्राम के क्षण आने की उम्मीद थी । लेकिन उसकी अभागी किस्मत को शायद ये मंजूर ना था । उस्सकी चार बहने हाथ पीले करने की अवश्था में आ गयीं थी । किसी तरह उन चारों की डोली बिदा की और फिर उनकी शादी के लिए गये कर्ज को ताउम्र किश्तों में उतारता रहा । सरकारी नौकर था और उपर से लेखापाल भी लेकिन उसे इमानदारी की बीमारी थी इसलिए उसके पास पूरे जीवन की जमा पूँजी के नाम पर अब बस प्राविडेण्ड फण्ड में जमा पैसा ही था ।  चूँकि नौकरी देर से लगी फिर बहनों की शादी के बाद खुद का परिवार बसाने में इतनी देर हो चुकी थी कि उसकी इकलौती बेटी उसके रिटायरमेंट पर अपनी पढ़ाई भी पूरी ना कर सकी ।

वो अब पेंशन के सहारे अपनी जिन्दगी शुकुन से गुजारना चाहता है, लेकिन जब तक इकलौती बेटी के हाथ पीले ना हो जायें किस बाप को कहाँ चैन मिल सकता है और यदि बाप ऐसी स्थिति में हो तो नींद भी आनी मुश्किल होती है । बेटी चार माह बाद ग्रेज्युएट हो जायेगी इसलिए आने वाली गर्मियों में उसका ब्याह कर वो सही मायनों में सेवानिवृत होना चाहता है । इसलिए उसने एक अच्छा सुयोग्य वर भी देख रखा है ।

चूँकि पूरा जीवन अपने परिवार को समर्पित कर कभी अपने लिए एक पल भी नहीं जीया इसलिए शायद उपरवाले ने उसकी थोड़ी मदद कर दी होगी । बेटी के लिए जो वर ढूँढा है वो वास्तव में बेटा ही निकला । अनाथ है पर कहता है कि दो जोड़े में अपनी अर्द्धांगिनी को घर ले जाऊँगा ।

पर बाप कितना भी गरीब हो, अपनी बेटी को यूँ ही बिदा नहीं करना चाहता और फिर उसने अपने प्राविडेण्ड फण्ड में किसके लिए पैसा जमा कर रखा था? इसी पैसे को हासिल करने वो अब पिछले चार महीनों से उसी ऑफिस के चक्कर लगा रहा जिसमें उसने पूरी निष्ठा और इमानदारी से अपने जीवन के 30 साल गुजारे थे और लोग उन्हे सम्मान से मुंशी जी कहा करते थे ।

ऑफिस में उसके स्थान पर बैठा नया लेखापाल जो चार महीने पहले तक उसे रोज सुबह मुंशी जी नमस्कार कहा करता था, उनकी पेंशन फाईल में चार महीने से इसलिए धूल जमाये रखा था क्योंकि उसे फाईल पर पडी धूल को साफ करने के लिए सफाई शुल्क नहीं मिली थी ।

ऑफिस के बड़े साहब एकदम युवा हैं । नये नये अखिल भारतीय सेवाओं हेतु चयनित होकर आये हैं । उन्होने अपने कैरियर के लिए पैसों से ज्यादा अभी एवार्ड हासिल करने का लक्ष्य निर्धारित किया है इसलिए वे ऑफिस के इन छोटे मोटे कार्यों के लिए अपना समय जाया ना करते हुए एक महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट पर सारा सामर्थ्य लगाये हुए हैं ताकि उन्हे अंतराष्ट्रीय स्तर का कोई पुरूस्कार मिले और वो नामचीन हो जाये । जिससे भविष्य में उन्हे किसी मेगा प्रोजेक्ट का हेड बनाया जा सके । फिर एक ही झटके में पैसा और शोहरत दोनों एकमुश्त हासिल कर अपने आने वाली सात पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित कर लेंगे । इस कारण से मुंशी जी का प्रकरण उनके लिए समय की बर्बादी थी ।

चार महीने में एडियाँ रगड़ जाने के बाद असफल मुंशी जी को किसी ने बताया कि नई चुनी गई सरकार में विभाग के मंत्री संवेदनशील और सहृदय है । एक बार उनसे मिलो, शायद वे तुम्हारी समस्या का समाधान कर देंगे । एक बार बस उनके आँखों का इशारा हो जाय तो दूसरे ही क्षण प्राविडेण्ड फण्ड का पैसा तुम्हारे बैंक खाते में जमा मिलेगा ।  उसने भी अखबारों के विज्ञापनों में लिखा पढ़ रखा था। जिसमें कई लोगों ने उन्हे मंत्री बनाये जाने पर शुभकानायें देते हुए लिखा था कि योग्य, अनुभवी, विनम्र, सहृदय और मिलनसार आदरणीय भैय्या को मंत्री बनाये जाने पर हार्दिक बधाईयाँ ।

इसी छवि को अपने मानसपटल पर अंकित कर वह पिछले एक महीने से रोज मंत्री के बंगले पहुँच जाता । चूँकि बँगले में उसकी कोई पहचान नहीं थी,  ना ही किसी बड़े आदमी की सिफारिश । इसलिए वो अपने नाम की पर्ची देकर वेटिंग हॉल में अपने बुलाये जाने की प्रतीक्षा कर शाम को असफल वापस आ जाता ।

बेटी की शादी को चार दिन ही बचे थे । मुंशी जी ने सोचा कि सुबह सुबह किसी के आने से पहले ही पहुँच जाऊँ शायद मुलाकात हो जायेगी और काम बन जायेगा । इसलिए पौ फटते ही मंत्री जी के बँगले पर हाजिरी लगा दी । दरबान ने रोका और कहा कि ये मिलने का वक्त नहीं है, मुलाकाती समय में आओ ।

मुंशी जी ने गुहार लगाई कि एक महीने से रोज मुलाकाती समय पर ही आ रहा हूँ पर मुलाकात नहीं हो पा रही है। निवेदन है कि किसी तरह अभी मुलाकात करवा दो । बस दो मिनट में अपनी बात खत्म कर लौट आऊँगा । दरबान का दिल पसीजा और अपनी नौकरी को दाँव पर लगाते हुए उसने इंटरकाम से मंत्री जी के निजी सेवक तक खबर भिजवायी । निजी सेवक ने बताया कि मंत्री जी व्यस्त हैं, वे अपने विदेशी नस्ल के कुत्तों को सैर करवा रहें हैं ।

चूँकि दरबान देशी था इसलिए अपनी हैसियत पहचानते हुए और मुंशी जी की नजरों में मंत्री जी की लाज बचाने का नैतिक दायित्व निभाते हुए कहा - बाबा, मंत्री जी इस वक्त एक विदेशी प्रतिनिधि मण्डल से जरूरी बैठक कर रहें हैं, अभी आपकी मुलाकात सम्भव नहीं। कृपया निर्धारित जनदर्शन में ही आयें तो अच्छा होगा । 


मंत्री की कर्तव्यपरायणता से गदगद किंतु दुखी मन से मुंशी जी वापस लौटकर सीधे पास के मंदिर में बिटिया के वैवाहिक कार्यक्रम आयोजित करने के लिए पुजारी से मिलने चल पड़े । चार बहने और उनके पति और बच्चे , बूढ़ी माँ और पत्नी के इस सीमित स्वजनों की उपस्थिति में भारी मन से अपनी बिटिया का हाथ उसके जीवन साथी के हाथों में सौंपते हुए बस यही कहा – बेटा, तुम्हे देने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है, भगवान से यही दुआ है कि तुम दोनों को मेरी उम्र लग जाय ।

बिटिया के विवाह के बाद अब गली के मोड़ पर चाय का ठेला अब उनका स्थाई अड्डा था । वहीं पर दिन भर जमे रहना और मौका मिलने पर किसी की भी मदद के लिए तैयार हो जाना अब उनकी नियमित दिनचर्या थी । उनके इसी निस्वार्थ सेवाभाव की चर्चा सुनकर एक गैर सरकारी संस्था के स्वयंसेवी मिलने पहुँचे । खादी के वस्त्र पहने हुए चेहरा रक्तिम आभा से दमक रहा था । मुंशी जी ने पूछा – किस काम से आये हो ? स्वयंसेवी बोले – हम समाजसेवी हैं । गरीब और अशिक्षित भोले-भाले आदिवासियों के हक के लिए लड़ाई लड़ते हैं । आप हमारी संस्था में शामिल होकर इस नेक काम में हाथ बँटायें । मुंशी जी फौरन तैयार हो गये और कहा कि वे गाँव तो नहीं जा पायेंगे लेकिन शहर में रहकर अपने पूरे सामर्थ्य के साथ उनके इस नेक काम में तन मन से सहयोग देंगे ।

इस तरह स्वयंसेवी जब भी शहर आते मुंशी जी उनके सहयोगी के रूप में दिन भर साथ देते । एक दिन यूँ ही चर्चा के दौरान मुंशी जी ने स्वयंसेवी को अपने प्राविडेण्ड फण्ड का किस्सा बताया । स्वयंसेवी जी का उँचे ओहदेदारों में काफी नाम था और प्रभाव भी । उन्होने दो दिन में ही मुंशी जी के प्राविडेण्ड फण्ड का पैसा दिलवा दिया । निर्मोही मुंशी जी के लिए उनका पेंशन ही पर्याप्त था इसलिए अब इस रकम की कोई आवश्यकता नहीं थी। सोचा जिसके लिए ये रकम जमा की थी, उसे ही दे दूँ । इसलिए उन्होने अपनी बिटिया को घर बुलाया ताकि एक बार फिर से इस रकम से साथ बिटिया को हँसी खुशी घर से विदा कर सकें ।

बिटिया अपने पति और बेटे के साथ घर आने वाली थी । उसकी माँ ने उनके स्वागत के लिए तरह तरह के पकवान बनाये थे । वे दोनों अपने घर की दहलीज पर बैठकर उनके आने की बाट जोह रहे थे । लेकिन बिटिया आती उससे पहले पड़ोस में रहने वाला लालचन्द अपनी मोटरसायकल में बदहवास सा आया और बोला - चाचाजी जल्दी चलिये । चौक पर बम धमाका हुआ है और दीदी बुरी तरह घायल है ।

मुंशी जी आवाक थे । उन्होने मोटरसायकल पर बैठकर केवल इतना ही पूछा – दामाद बाबू और नाती कैसे हैं ? लालचन्द मौन था और उसके मौन ने मुंशी जी को स्तब्ध कर दिया । उन्हे अब कुछ समझ ही नहीं आ रहा था। अस्पताल पहुँचकर वे दौड़े दौड़े अपनी बिटिया के पास पहुँचे और उसके सिर को अपनी गोद में रख लिया । बुरी तरह जख्मी और खून से लथपथ बिटिया इतना ही कह पाई – पिताजी, अपना और माँ का खयाल रखना । 

मुंशी जी के जीवन का शायद ये अंतिम दुख होगा । अब उन्हे कोई भी घटना दुखी नहीं कर सकती । कुछ दिन गमगीन रहने के बाद वे लोगों की मदद करने को ही अपना इलाज बना चुके थे । सुबह से ही घर से निकल जाना फिर जरूरतमन्दों की सहायता करना यही उनका जीवन ध्येय था ।

प्राविडेण्ड फण्ड का जो पैसा मिला था , मुंशी जी ने उसे स्वयंसेवी की संस्था को दान देने का निश्चय किया । स्वयंसेवी से टेलीफोन से संपर्क किया तो पता चला वे किसी सेमीनार के सिलसिले में दिल्ली गये हुए हैं । उन्होने स्वयंसेवी को अपनी इच्छा बतायी तो स्वयंसेवी ने उन्हे ढेरों बधाई देते हुए कहा कि आप उसे मेरे संस्था के बैंक खाते में जमा करवा दें । मैं दिल्ली में आपके इस नेक कार्य से मीडिया के लोगों को अवगत करवाता हूँ । शीघ्र ही आपको किसी ना किसी राष्ट्रीय पुरूस्कार से नवाजा जाकर सम्मान समारोह आयोजित किया जायेगा ।

मुंशी जी को ना तो कभी इच्छा थी और ना ही कभी लालसा । सो उन्होने इसे गुप्तदान घोषित करते हुए सम्मानित होने के लिए विनम्रतापूर्वक इंकार कर दिया और फिर दूसरे दिन सीधे बैंक जाकर पूरा पैसा संस्था के खाते में जमा कर दिया । बैंक से लौटते हुए वे आदतन गली के मोड़ वाली चाय दुकान पर अपना आसन जमाया और चाय की चुस्कियों के साथ अखबार पढ़ने लगे ।

अखबार के पहले पृष्ठ पर बड़ी खबर थी । पुलिस ने बम धमाकों के मुख्य आरोपी आतंकी को पकड़ लिया है और उसने पूछताछ में पुलिस के सामने कबूल किया है कि जिस समाजसेवी को वे अपनी जीवनपूँजी दान में दे आये थे वो इस आतंकवादी को हथियार और गोला बारूद उपलब्ध करवाता था । मुंशी जी ने अपनी आधी चाय वहीं छोड़ी और वापस घर लौट आये । अब वे किसी से भी बातचीत नहीं करते थे । केवल गुमसुम और मौन रहते हुए कभी आसमान को तो कभी सूनी दीवारों को घण्टों तकते रहते । 

मुंशी जी इस सदमे से उबर पाये या नहीं ये तो कहना मुश्किल है पर अब किसी से कुछ बोलते नहीं । वजह ये नहीं कि उनकी आवाज चली गई थी बल्कि इसलिए कि कहीं उनके मुँह से सच निकल गया तो लोगों का ईमानदारी और परमार्थ से भरोसा उठ जायेगा । 

4 टिप्‍पणियां:

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  2. अखबार के पहले पृष्ठ पर बड़ी खबर थी

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  3. बेहतरीन .... बिना शब्द माया जाल व लाग लपेट के यथार्थ के पन्नों पर लिखी एक दास्तान। ..

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  4. बेहतरीन .... बिना शब्द माया जाल व लाग लपेट के यथार्थ के पन्नों पर लिखी एक दास्तान।

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