गुरुवार, 25 जुलाई 2013

थ्री ईडियट - अहमद, पिल्ले और हम

 सावन का महीना चल रहा है और कई दिनों बाद आसमान साफ था , सुबह सुबह सूरज के ड्यूटी पर आने की उम्मीद थी । बचपन में कक्षा आठ के हिन्दी द्वितीय के परीक्षा में अक्सर ये पूछा जाता कि बरसात के दिनों में मोहन दास गाँधी जी की माँ अक्सर भूखी क्यों रहती थीं और मास्टर जी के द्वारा इसे आईएमपी सवाल बता कर जवाब भी रटाया जाता था कि वे सूर्य देवता के दर्शन किये बिना अन्न ग्रहण नहीं करती थीं ।

उसी किताबी ज्ञान और स्मृति के आधार पर आज के मौसम के बारे में ये कहा जा सकता है कि गाँधीजी की माँ आज भरपेट  खाना खा सकेंगी, ऐसा माहौल बनने के पूरे आसार हैं । भरपेट इसलिए लिखा क्योंकि संसद के मानसून सत्र तक तो मन्नू मामा का फूड सिक्योरिटी बिल लागू रहेगा ही और छोटू मामा (मोंटेक सिंह ) ने गरीबी तय करने वाली नई गाईड लाईन भी जारी कर दी है । 

आज दैनिक परम्परा के विपरीत हम भी सुबह जल्दी उठ गये और राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत परिभ्रमण के लिए निकल पड़े । लेकिन बाजू वाली गीता के सर पर हाथ रखकर यदि हमसे कहलवाया जाय तो सच्चाई ये है कि हम रात भर सो ही नहीं सके इसलिए जागने का प्रश्न ही नहीं उठता । खैर हमने सुन रखा था कि सुन्दर दिखने के लिए सुबह सुबह शहरी सभ्रांत महिलायें स्पोर्टी लुक में विचरण करती हैं, जिसे वे अपनी भाषा में जॉगिंग कहती हैं । उनके स्पोर्टी लुक के प्रात:कालीन दर्शन के प्रलोभन में आकर हम चिड़ियों के चहचहाते ही सुबह की सैर को निकल पड़े वरना आजकल के महानगरीय संस्कृति में कौन ऐसा कोल्हू का बैल, उल्लू का पठ्ठा है जो सुबह 6 बजे अपने नर्म और वातानूकूलित बिस्तर को ओके, टा-टा, बाय-बाय कहता है । 

जब पत्नी के दबाव में जूते खोलकर मंदिर के गर्भ गृह के सामने आ ही गये हैं तो प्रसाद न खाने के अपराधभाव से क्यों ग्रसित हों । इसी सिध्दांत के आधार पर हमने अपने जवानी के दिनों वाला ट्रैक सूट निकाला और उसके भीतर किसी तरह खुद को स्थापित कर निकल पड़े ग्यारह नम्बर की बस पर । अमूमन सभ्य लोगों की बौद्धिक भाषा में इसे मॉर्निंग वॉक कहते हैं । 

 ( वैधानिक सूचना - यहाँ पर हम एक तथ्य बिल्कुल स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि “जवानी के दिनों वाला”  से ये तात्पर्य बिल्कुल ना लगायें जवानी दिन गुजर चुके है बल्कि यथार्थ तो ये है कि वो दिन आज भी पास्ट परफेक्ट टेन्स न होकर प्रजेंट परफेक्ट कंटिनिवस टेन्स में है । ) 

जब गाँव में ठिकाना था, तो हमें रोज झझकोर कर दादी कहती थी- “सुबह जल्दी उठकर ताजी हवा लेने से दिल और दिमाग दोनो तन्दरूस्त रहता है, और घास पर पड़ी ओस की बूंदो पर नंगे पाँव चलने से आँखो की रोशनी तेज होती है।” 

खैर उनकी नसीहत पर तो कभी अमल किया नहीं लेकिन आज स्पोर्टी लुक की कानो-सुनी थ्योरी को आँखो देखी में परिवर्तित करने के लिए चुपके से घर के बाहर निकला । चुपके से निकलने का कारण सिर्फ यही था कि श्रीमती जी यदि हमें इस रूप में देख लेती तो वैसे ही कोहराम मचा कर आरोप लगाती जैसे दिग्विजय सिंह जी किसी भी दुर्घटना के पीछे भगवा साजिश का दावा करते हैं और हम अपनी सारी उर्जा लगाकर भी खुद को बेदाग साबित नहीं कर पाते क्योंकि हमारी पत्नी, राघवजी की अर्धांगिनी की तरह उदार एवं खुले विचारों वाली है ही नहीं ।


पत्नी द्वारा तय की गई एलओसी को बगैर सूचना के अनधिकृत रूप से लाँघ कर जैसे ही कालोनी के अहाते से बाहर आये, वैसे ही हमें इस बात का पूरा विश्वास हो गया कि यहाँ ना तो ताजी हवा है और ना हरी हरी घास जिसमें ओस की बूँदे पड़ी हों । जो मौजूद है, वो केवल सीमेंट कांक्रीट की सड़के और ताजी हवा के नाम से नालियों से निकलती बदबूदार गंध । जिसमें रही सही कसर उन भैंसों का झुण्ड पूरा कर रहा था, जिसका मालिक इलाके का वही दबंग नेता था, जिसके तबेले को पिछले पाँच सालों से नगर निगम का पूरा अमला इस रिहाईशी इलाके से बाहर निकालने में ठीक उसी तरह असफल रहा जैसे हमारी सरकार अवैध बांग्लादेश के घुसपैठियों को निकालने में रही । 

हमने सोचा जब एक बार कालोनी की सीमा लाँघ ही गये हैं तो सामने नुक्कड़ वाले चाय ठेले तक चले चलते है । अगर रम्भा, मेनका, उर्वशियों के स्पोर्टी लुक का दर्शन लाभ नहीं भी मिले ( हकीकत में जिसके कारण ही हम सैर को निकले थे ) तो कम से कम ठेले वाले रामखिलावन के यहाँ एक कटिंग चाय ही पी लेंगे । वैसे भी कई महीने हो गये कैटल क्लास के स्पेशल ठेले की चाय पीकर खुद को आम आदमी फील किये हुए । 

कालोनी के अन्दर से लेकर नुक्कड़ वाले चाय ठेले तक मॉर्निग वॉक की बड़ी गहमागहमी थी । स्वास्थ्य के प्रति जागरूक इन प्राणियों की प्रजाति को पहनावे ओढ़ावे और चाल ढाल से लिंग, क्षेत्र, जाति के आधार पर पृथक करना अत्यन्त  दुष्कर कार्य था ! महिलायें मनचाहे शारीरिक आकृति को आत्मसात करने में सक्षम पैण्ट-शर्ट में थी, जिसे पढ़े लिखे लोग जॉगिंग ट्रैकसूट कहते हैं , तो कई पुरूष रविशंकर, रामदेव और ओशो टाईप से चोंगानुमा नाईट गाऊन पहने हुए थे, इसलिए हमने इन्हे कार्य के आधार पर विभाजित करने का निर्णय लिया । 

त्वरित शोध से ये निष्कर्ष निकला कि मॉर्निग वॉक में अमूमन दो प्रकार के लोगों की बहुतायत है – 

पहले वे जो किसी भी मकान के अहाते से बाहर झाँक रहे पेड़-पौधे पर मुस्कुरा रहे फूल को मकान मालिक के जागने से पहले ही तोड़कर चोरी कर लेते हैं, जिसे बाद में नहा धोकर निर्मल तन और कलुषित मन से भगवान को रिश्वत पेशकर अपनी माँगे स्वीकृत करने हेतु दबाव बनाते हैं ।


दूसरे वे जो विदेशी नस्ल के कुत्ते को घुमाते हैं, ये अलग बात है कि उन्हे देखकर अबोध बालक भी बता देगा कि वे कुत्ते को घुमा रहे हैं या कुत्ता उनको । एक बार तो एक नवयौवना का उसके पामेलियन कुत्ते के प्रति प्यार और स्नेह देखकर अपने पुरूष रूप में मानव होने का अफसोस हुआ और एक तीव्र इच्छा जागृत हो गई कि काश मैं भी अंग्रेजी जात का पट्टाधारी कुत्ता होता । 

जैसे भी हो इन दिव्यात्माओं के दर्शन लाभ करते हुए कब नुक्कड़ वाले चाय ठेले तक पहुँच गया पता ही नहीं चला । हमारा सोशियल सर्किल ठीक वैसे ही है, जैसे धोबी के कुत्ते का होता है । उसे या तो उसके घर के लोग जानते हैं या घाट पर कपड़े धोने वाले । क्योंकि इस शहर में जब से ठिकाना जमाया है , “मुल्ले की दौड़ मस्जिद तक” वाली कहावत हम पर सौ फीसदी लागू होती है । 

चाय ठेले वाले राम खिलावन को हमने कहा – भैय्या, एक ब्लैक लेमन टी देना । ठेले वाले ने हमें इस अंदाज से देखा जैसे कोई नेता चुनाव जीतने के बाद मतदाता को देखता है । चाय की गंजी में खौलते पानी में पहले से इस्तेमाल की गई चायपत्ती को डालते हुए हमसे बोला – सर, इस इलाके में नये आये हो क्या ? 

हमने कहा – नही प्राण साहब, इस इलाके में तो पिछले एक साल से हूँ , हाँ तुम्हारी दुकान पर पहली बार आया हूँ । लेकिन तुमने ऐसा क्यूँ पूछा ?


रामखिलावन बोला – प्राण साहब के बड़े फैन लगते हैं आप सरजी, हमारा नाम रामखिलावन है , इधर ब्लैक लेमन टी नहीं चलता, उसे“लाल चाय नींबू मार के”  कहते हैं । बैठिये, आपने हमको प्राण साहब कहा इसलिए आपको साफ गंजी में बना कर दे रहें हैं, इस्पेशल ।  

मैं उसके ठेले के सामने लगी पटिया पर बैठ गया । वहाँ कुछ बुद्धजीवी टाईप का हुलिया बनाये, कुछ गली मोहल्ला छाप नेता लोगों के बीच एक गंभीर चर्चा चल रही थी । 

“ कुत्ता शब्द साम्प्रदायिक है या सेकुलर ”  

बहस गंभीर चल रही थी । रामखिलावन ने हमें इस्पेशल चाय थमाते हुए पूछा – सरजी , आप क्या कहते हो ? कम्युनल या सेकुलर ? 

हमने एक चुस्की लगाई और उससे कहा – देखो रामखिलावन, कुत्ता अगर गाड़ी के नीचे आया तो सेकुलर , किसी को काट खाया तो कम्यूनल और गाड़ी में बैठकर आया तो इंटेक्चुअल । 

और ई कौन टाईप का कुत्ता है सरजी ? रामखिलावन ने टोस्ट के लिए जीभ लपलपाते हुए एक देशी आवारा कुत्ते की ओर इशारा करते हुए पूछा । 

हमने कहा- पॉलिटिकल । 

तभी अचानक भीड़ में एक चेहरा जाते हुए दिखा , वो मेरा पुराना लंगोटिया यार था, जिससे कालेज के बाद कई सालों से मिला नहीं था । वही है या कोई और ? इस कश्मकश में वो थोड़ी दूर निकल गया । पर जब यकीन हो गया कि वही है, तो उसे रोकने के उद्देश्य से पीछे से मैने जोर से चिल्लाया........

     
 -  अबे पिल्ले !
वो पीछे पलट कर देखा और तेजी से मेरी ओर लपका.....  

और सीधे मेरा कालर पड़ा ....
अचानक तेजी से घटनाक्रम बदला , 


* पिल्ले कहने से चाय ठेले के आसपास कुछ लोगों की भावनायें आहत हो गई  ,

* भीड़ में कुछ लोग उसके द्रारा की जाने वाली किसी भी हरकत के अग्रिम मदद को तैयार दिखे ,

* लेकिन इस वाकये से एक अर्धअंगधारी बुद्धजीवी के सोने की चिड़िया उड़ गई और उसने तत्काल अपने मोबाईल से मेरे इस दुर्व्यवहार पर अपना फेसबुक स्टेटस अपडेट कर तहलका मचाने का प्रयास किया ।

* उस अपडेट पर कुछ सेकुलर लोगों ने इसकी "कड़ी"  निन्दा की ...

* कुछ समर्थकों ने मेरी लानत मलामत भी की .....

* कुछ कौमी समर्थकों ने मेरे वॉल पर आकर अपनी नैसर्गिक टिप्पणी की .....

* एक उत्साही कौमी समर्थक ने दो कदम आगे आकर मुझे मोदी का बच्चा कहा ....  

( शायद उसकी भावना मेरे लिए नेक हो और वो मुझे मोदी का बच्चा कह  उत्तराधिकार के रूप में  मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद मुझे गुजरात का मुख्यमंत्री बनना चाहता हो )


* एक और कौमी समर्थक को मेरा पाजामा ढीला नजर आने लगा .... 

( शायद अमेरिका के किसी एयरपोर्ट में उसे गहन सुरक्षा जाँच से गुजरने का अनुभव हो ) 

* बजरंगियों ने मुझे राष्ट्र का भविष्य बताया और मुझे देश की जरूरत बता कर मेरी भूली हुई शक्ति और वरदान की याद उसी तरह दिलाने की कोशिश की जैसे जामवंत ने लंका जाने से पहले हनुमान जी को दिलाई थी । 

( फिर अचानक वे गायब हो गये , शायद ये सोचकर फूलों की माला लेने गये होंगे कि यदि भीड़ से बच गया तो शौर्यजूलूस निकालेंगे और यदि मर खप गया तो लाश को फूलों से ढककर शहर में घूमायेंगे । दोनो ही स्थिति में दुकानो को लूटने का और राह चलती महिलाओं को छेड़ने की सुविधा की पूरी गारंटी थी । )  

* कुछ लोगों ने मुझे अपना नैतिक समर्थन इसलिए दिया क्योंकि जुम्मन चाचा का लड़का उनकी बहन को घूर कर देखता है ।  


* कुछ कंफ्यूजियाये टाईप के लोग जिन्हे इस वाकये के बारे में कुछ पता नहीं था, उन्होने SMS पर हमें समझाइश टीप लिखा – महाराज आपसे ऐसे बर्ताव की उम्मीद नहीं थी । आपको किसी को इस तरह सार्वजनिक रूप से कुत्ते का पिल्ला नहीं कहना चाहिए । 

* मैग्सेसे पुरूस्कार पाने के लिए जी तोड़ मेहनत कर रहा एक केजरीवाल टाईप के आदमी ने अर्धअंगधारी को तत्काल आदेशात्मक सलाह दी कि ऐसे पड़ोसी से तत्काल सम्बन्ध तोड़कर दोनो घर के बीच अम्बूजा सीमेंट की दीवार खड़ी कर देनी चाहिए ।  

अर्ध अंगधारी बुद्धजीवी को सलाह जँची ।  उसने हमे तत्काल अनफ्रेण्ड किया लेकिन अभी तक दीवार खड़ी नहीं की है क्योंकि हमें उनका हमाम अब भी नजर आ रहा है । 

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ओ तेरी ....  इन सब तेजी से हुए घटनाक्रम के कारण मैं अपने ट्रेक से ही उतर गया । चलिए मुद्दे पर आते हैं और मार्निग वॉक की स्टोरी कंटिन्यू करते हैं... 

तो मैं कहाँ था .. हाँ ...  मैने चिल्लाकर कहा ---  अबे पिल्ले ! 

वो पीछे पलट कर देखा और तेजी से मेरी ओर लपका.....  


और सीधे मेरा कालर पड़ा ....

उसकी आँखों में अजीब सी चमक थी, पता करना मुश्किल था कि खुशी है या आश्चर्य ? 

उसने चहकते हुए कहा – अबे साल्ले बाभन, कहाँ है बे आजकल, और क्या कर रहा है यहाँ ?
मैने कहा – अबे पप्पू, मैं यहीं सेटल हो गया हूँ पिछले एक साल से । 
उसने कहा – चल घर चल । मेरी मिसेस बहुत खुश हो जायेगी तुझे देखकर, बार बार पूछती है कौन है ये तुम्हारा दोस्त बाभन , जिसकी हमेशा चर्चा करते रहते हो ?  
मैने कहा – नहीं यार आज मुझे जरूरी काम निपटाना है, शाम तक फ्री हो जाऊँगा फिर दो दिन तक फुरसत है । 
उसने कहा – अच्छा ! चल शाम को किसी बार में आराम से बैठकर महफिल जमाते हैं, वहीं इत्मीनान से बातें करेंगे । 
फिर उसने मेरा फोन छीनकर किसी को कॉल किया  -  अबे अहमद मियाँ

........  

अबे कौन नहीं , पप्पू पिल्ले बोल रिया हूँ बे कमीने । 
.......  
अबे हाँ बे, ये मेरा नम्बर नहीं है लेकिन जिसका नम्बर है, उसका नाम सुनेगा तो चौंक जायेगा बे ! 
...... 
अबे किसका नहीं, अपना लंगोटिया यार बाभन का फोन है बे । हमारे शहर में घूम रिया था मियाँ । हमसे टकरा गया बे .. पकड़ लिया हूँ साले को ! शाम को चाँदनी बार आ जईयो बे । और हाँ रजिया भौजी को बता के अईयो के बाभन आया है .. महफिल रात भर चलेगी । 

मेरा फोन वापस करते हुए पप्पू बोला – चल बे बाभन तेरा दो दिन का प्रोग्राम बुक हो गया है । आज होटल में फुल नाईट बकलोल पार्टी, कल दोपहर का खाना मेरे घर पर क्योंकि अहमद मियाँ कह रहा है – रजिया भौजी ने हुक्म जारी किया है कि जब भी पप्पू भैय्या और आप मिलते हो , हमेशा बाभन की ही बातें करते हो, अब आये हैं तो हमें भी मिलना है , रात की दावत तो हमारे घर पर ही होगी । 

हम और पप्पू पिल्ले चाँदनी बार पहुँचते इससे पहले ही अहमद मियाँ वहाँ पीठ किये हुए खड़े मिले । जैसे ही हम गाड़ी से उतरे उन्होने कमर से शरीर को समकोण बनाकर कहा – अबे कमीने बाभन, तुस्सी राघव जी हो बे,  तोहफा कबूल करो । 

हमने आदतन पप्पू को धकेलते हुए कहा – अबे पिल्ले ...  तुझे कह रिया है बे ।  

लेकिन इस बार किसी की भावना आहत नहीं हुई ..  ना तो पिल्ले की और ना अहमद मियाँ की ।

तीनो खुले आसमान के नीचे चाँदनी में नहाते हुए जाम टकराया और एक सुर में तरन्नुम में गाया ...  

“ खुदा का शुक्र है वरना गुजरती कैसे ये शाम 
  शराब जिसने बनाई , उसे हमारा सलाम ॥ ”   

बुधवार, 3 अप्रैल 2013

हैप्पी ILP 6 .. चीयर्स



यूँ तो इन दिनों परम्परागत क्रिकेट के नियमों में कई बदलाव आ  गयें है और 6 दिवसीय टेस्ट मैच अब 20-20 के चंद घण्टों का खेल बन गया है । अब फ्रीहिट, स्ट्रेजिटिक टाईम आऊट, रंगीन कपड़े कितने नियम बदल गये हैं । इन नियमों के बदलाव में काफी समय लगा लेकिन इस परम्परा की शुरूआत हमने आज से पच्चीस साल पहले ही कर दी थी । उस जमाने में सबसे पहले 15-15 की शुरूआत हमने किया है ।

आज 20-20 का खेल दो तरह का होता है पहला दो देश के खिलाड़ी इस मैच को खेलते हैं
, दूसरा आई पी एल टाईप क्लब टूर्नामेंटों में आपस में बंटकर खेलते हैं । वास्तव में ये आईपीएल का बेसिक आईडिया हमारा ही था सर्वप्रथम इसे हमने ही सप्ताह में सोमवार से शनिवार तक मुहल्ले के खिलाड़ी आपस में बंटकर दो टीम बनाते थे और डीपीएल याने डेली प्रिमीयर लीग खेलते थे । रविवार को मुहल्ले की टीम दूसरे मोहल्ले की टीम से मैच खेलती थी जैसे दो देश आपस में मैच खेलते हैं ।

आईये आपको हमारे इन दोनो प्रकार के खेल के नियमों से परिचित करायें । मुझे यकीन है कि इसमें से कई नियम पूरे भारत में मान्य कर लिये गये थे और आपने भी अपने बचपन में इसी नियमों से बँध कर क्रिकेट खेला होगा ।

डेली प्रीमियम लीग में टीम निर्धारण –

1 मैदान में सर्वप्रथम आने वाले दो खिलाड़ी उस दिन के मैच के विरोधी कप्तान घोषित किये जायेंगे ।

2 फिर टूटी हुई खपरैल में एक ओर थूककर हेड और टेल की स्थिति बनाई जायेगी और एक कप्तान खपरैल को उछालकर दूसरे कप्तान को गीला या सुखा चुनने का आमंत्रण देगा ।

3 टॉस जीतने वाला कप्तान उपलब्ध खिलाड़ियों में से अपने पक्ष के लिए सर्वप्रथम एक खिलाड़ी का चयन करेगा उसके बाद दोनों कप्तान बारी बारी से एक एक खिलाड़ी का चयन करेंगे । विषम संख्या में  खिलाड़ी के उपलब्ध होने पर मैच प्रारंभ होने के बाद आने वाला नया खिलाड़ी कम संख्या वाले टीम का स्वत: सदस्य घोषित होगा । 

4 कोई भी कप्तान अपने स्वयं के रिस्क पर अनुपस्थित किसी अच्छे खिलाड़ी का भी चयन कर सकता है लेकिन उसके ना आने पर भी उसकी गिनती प्लेईंग इलेवन में होती और वह कप्तान एक खिलाड़ी कम रख कर ही मैच खेलने का रिस्क लेगा ।

5 बैटिंग या फील्डिंग का निर्णय फिर से नई खपरैल में थूक लगाकर उछालकर किया जायेगा लेकिन इस बार उछालने की प्रक्रिया दूसरा कप्तान सम्पन्न करेगा ।

6 एक टीम में ग्यारह खिलाड़ी से कम होने पर बैटिंग करने वाली टीम के खिलाड़ी संख्या को पूरा करेंगे जिसे कामन फील्डर कहा जायेगा । कामन फील्डर का निर्धारण फील्डिंग कप्तान करेगा ।

7 बल्लेबाज के आऊट होने के बाद बैटिंग करने आने वाला खिलाड़ी अपनी बारी आने तक अम्पायरिंग करेगा । 

8 अंतिम बल्लेबाज भी अकेले बैटिंग करेगा अर्थात 15 ओव्हर या सभी बल्लेबाजों को आऊट करना अनिवार्य होगा।

9 स्ट्म्प का निर्माण झाड़ियों से डण्डे तोड़कर किया जायेगा जिसकी उँचाई दोनो कप्तान के आपसी सहमती से किसी एक के घुटने के बराबर होगी । स्टम्प के बीच की दूरी इतनी फैलाई जायेगी कि बाल उसके बीच से निकल ना पाये । पापिंग क्रीज की लम्बाई एक पूरे बल्ले और हत्थे की लम्बाई के योगफल के बराबर होगी ।

10 बल्लेबाज द्वारा लगाये गये जोरदार हिट से यदि बॉल किसी घर के छत की खपरैल को नुकसान पहुँचाती है तो इसका जिम्मा सभी खिलाड़ियों का होगा और मारपीट होने की स्थिति में सभी खिलाड़ी एकजुट होकर सामने वाले की बैण्ड बजायेंगे ।


टीप – अन्य नियम भारतीय संविधान की विभिन्न धाराओं के उल्लंघन करने वाले होने के कारण गोपनीय है और उन्हे सार्वजनिक रूप से प्रकाशित नहीं किया जा सकता ।

अब इस मैच का भूमण्डलीकरण हो चुका है और आज से उसका शुभारंभ भी है , इसलिए भूख प्यास , मँहगाई , कानून व्यवस्था , गरीबी इन तमाम छोटे – मोटे मुद्दों में अपना माथा न खपाकर इण्डियन पैसा लीग का आनन्द उठाये ।

हमारे भरोसे मत रहें ...  अपनी अपनी सुविधानुसार गर्ल्स / लीडर / दारू किसी के साथ भी अनिवार्य रूप से चीयर्स करें ... हैप्पी आईपीएल सीजन सिक्स 

शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

कुम्भकर्ण – एक धार्मिक चरित्र



हमारी सबसे बड़ी कमजोरी ये है कि हम पूर्वाग्रह से ग्रसित हो कर किसी भी चरित्र का आँकलन करते हैं। अगर निरपेक्ष भाव से चिंतन करें तो कभी कभी जिस चरित्र को हम बुरा कहते हैं, वो आदर्श प्रतिमान होकर अनुकरणीय भी हो सकता है ।

कभी कभी जब जीवनगाड़ी बिना उतार चढ़ाव के नीरस होकर सपाट चलने लगे तो मैं स्वयं को आनंदित करने के लिए कुछ देर अपने कष्टतम क्षणों को याद कर जबरिया उदास हो जाता हूँ और व्यर्थ का चिंतन करने लगता हूँ फिर जब सामान्य हो जाऊँ तो अपनी वर्तमान स्थिति पर एक संतुष्टि और आनन्द प्राप्त होता है । यद्यपि यह किसी उपलब्धि प्राप्ति का आनन्द ना होकर क्षद्म दुख से निजात पाने की संतुष्टि है लेकिन फिर भी है तो आनन्द ही जो सपाट चल रही जिन्दगी में नये उत्साह का संचरण तो करती है ।


इसी प्रक्रम में कल शाम एक निर्जन स्थान पर एकाकी बैठा ऐसे ही किसी व्यर्थ चिंतन में लीन होकर अपने बुरे दिनों को याद कर रहा था कि अनायास बिना किसी संदर्भ के कुम्भकरण के चरित्र का खयाल आया । वही कुम्भकर्ण जिसे हर दशहरे में रावण के बराबर खड़ा कर इसलिए जलाया जाता है क्योंकि उसका अपराध केवल इतना ही था कि वह रावण का भाई था ।


यदि निरपेक्ष भाव से चिंतन करें तो कितना आदर्श चरित्र था कुम्भकरण का । चौंकिये मत यह कोई व्यंग नहीं पूरी गंभीरता से कह रहा हूँ ।


कुम्भकरण को तब जगाया गया जब विभीषण, रावण को छोड़कर शत्रु सेना में शामिल हो चुका था । कुम्भकर्ण को पूरी घटनाओं से अवगत करया गया तो उसने भी विभीषण की तरह रावण को समझाने हेतु अपनी पूरी सामर्थ्य लगा दी । किंतु वो रावण था, अगर समझ कर अपनी गलती मान ही जाता तो फिर एक महाज्ञानी पण्डित आखिर रावण में परिवर्तित ही कैसे होता ? रावण ने कुम्भकर्ण से कहा कि मुझे उपदेश नहीं, समर्थन चाहिए और यदि तुम नहीं दे सकते तो विभीषण की तरह मुझे छोड़कर जा सकते हो ।


कुम्भकरण ने त्वरित उत्तर दिया – ये जानते हुए भी कि आप सर्वथा गलत है और मेरे समझाने का भी आपको कोई असर नहीं हो रहा है फिर भी मैं विभीषण की तरह इस विपत्तिकाल में आपका साथ नहीं छोड़ सकता और पाप-पुण्य की परवाह किये बिना अंतिम श्वांस तक आपका ही साथ देकर अपना धर्म निभाऊँगा । मेरा धर्म और कर्तव्य यही है कि मैं अपने स्वजनों को सही गलत का ज्ञान कराऊँ और यदि फिर भी वो ना माने तो विपत्तिकाल में बिना सोचे उसका अंतिम श्वांस तक पूरे मनोयोग से साथ निभाऊँ ।


कुम्भकर्ण द्वारा रावण का साथ देना भले ही सबकी नजर में पाप और अधर्म रहा होगा पर एक भाई और स्वजन होने के नाते कुम्भकर्ण से ज्यादा धार्मिक और चरित्रवान व्यक्ति कौन हो सकता है ? विभीषण भले ही रामचन्द्र का साथ पाकर धार्मिकता का चोला पहन लंकाधिपति हो गया किंतु आज भी उसका नाम, उसका चरित्र उतने ही निरादर से लिया जाता है, जितना की रावण का ।


जो व्यक्ति अपने स्वजनों का साथ उनके विपत्तिकाल में छोड़ दे, उससे बड़ा अधर्मी और नीच कोई नहीं, भले ही आप बौद्धिक तर्कों से उसे सही ठहरा दें पर वह कभी भी अपने उस चरित्र के लिए सम्मान नहीं अर्जित कर सकता । अगर आप मुझसे सहमत नहीं तो अपने परिवार में किसी नवआगंतुक शिशु का नाम विभीषण रख कर दिखाईये जिसे स्वयं प्रभु राम ने ससम्मान लंकाधिपति घोषित किया था ।

!! जय श्री राम !! 

शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

पोस्ट वेलेंटाईन डे




जैसे खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है वैसे ही कल मैं भी उत्साही युवाओं के हरकतों को देखकर जोश में आ गया । पूरे उम्र के हौसले को इकठ्ठा कर अपनी मालकिन से कहा ... हे अखिलेश्वरी .. यू आर माई कांस्टिट्यूशनल वेलेंटाईन ... हैप्पी वेलेंटाईन डे टू ओंली यू । 



ये सुनकर वो बिफर पड़ी और बोली .. हाऊ डेयर यू टू कम्पेयर मी विथ द ओल्ड सैंट वेलेंटाईन ? अब मैं आपको इतनी बूढ़ी लगने लगी हूँ

हमने गधे के सिर की तरह सिर हिलाकर कहा ... नहीं भागवान। 

थानेदार जैसे एक रिक्शे वाले से आदरपूर्वक पूछता है उसने लगभग उसी लहजे में मुझसे कहा ये कैसा जवाब है , सिर का हिलना तो हाँ कह रहा है और जबान से ना निकल रही है । 

मैने धोबी के गैर कामकाजी चौपाये  के चरित्र को ध्यान में रख तत्काल सफाई पेश किया –  सिर पर दिमाग का कब्जा है और जुबाँ पर दिल का । 

अचानक उसने अधिवक्ता का चरित्र धारण किया और मुझे कटघरे में खड़ा करते हुए यक्ष प्रश्न दागा अच्छा , दस साल पहले तो आपके दिमाग और दिल दोनों कहते थे कि मैं तुमको शीशे की लालपरी लगती हूँ । अब क्या हुआ ?? 

मैने अपराधभाव से कहा मालकिन दस साल में तीन सरकारे बदल जाती है मैने तो केवल नैतिक विचार बदला है । 

उसने दार्शनिक  अंदाज में कहा - लेकिन आप तो हमेशा कहते हो कि  शराब जितनी पुरानी हो उतना ज्यादा मजा देती है । 

मैने अपना सारा अनुभव समेट कर कहा- ले इसमें तो हमारा फोर्टे है ... मजा वजा कुछ नहीं वो केवल कहने की बातें है .. दरअसल कमब्ख्त जितनी पुरानी होती है उतनी ही मँहगी होती जाती है । 

आपने मेरी इस जानकारी को पता नहीं क्या समझा पर उसने इसका मतलब बखूबी समझा और घर के खर्चे कम करने के लिए काम वाली बाई को मना कर दिया । अब मैं क्या कर रहा हूँ ये पूछ कर मेरी बेईज्जती और खराब मत करो । वैसे भी ये बेलन टाईन डे शारीरिक, आर्थिक और मानसिक तीनो तरह की पीड़ासुख की अनुभूति करा गया । 

आज सुबह से बसंत पंचमी पर मैं उससे याचना कर रहा हूँ .. एनी वे माई व्हाईट ड्रेस्ड बसंती ग़ॉडेस ... आई अपोलाईज एंड करेक्ट माई वर्ड .. आई एम यूअर बैल एण्ड यू आर माई बैल इन टाई .. ओ के , नाऊ विथ हम्बल रिक्वेस्ट प्लीज रिअपाइंट माई लेडी कुलिग "द कामवाली बाई" । 

कामवाली बाई के पुनर्नियुक्ति की प्रक्रिया विचाराधीन है लेकिन जिन-जिन सज्जनों का वैलैंटाईन डे सफलता पूर्वक मन गया हो निश्चित रूप से वे आज क्रेडिट कार्ड डे मना रहे होंगे.. परमात्मा उन्हे कर्ज अदा करने की शक्ति दे और मुझे चौका बर्तन करने की  


बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

Kiss Day मतलब चाटन दिवस


किस डे मतलब चाटन दिवस .. अरे नहीं भाई किस डे को चुम्मा दिवस नहीं कह सकते हैं, तकनीकी रूप से चाटन दिवस ज्यादा सटीक है क्योंकि बैल इन टाईन वीक है । अब किसी ने बैल को चुम्मा लेते तो देखा है क्या ? नहीं ना, मैने भी उसे हमेशा चाटते ही देखा है ।

वैसे भी जितने उत्साही युवक -युवतियाँ है ( आम तौर पर इस तरह के त्यौहारी बुजुर्ग भी चिर युवा होते है)  वे इस दिन फ्राँस की महान सांस्कृतिक आचरण को ही अंगीकृत कर इमरान हाशमी बनना ही पसंद करते हैं और फ्रेन्च किस को चुम्मा की बजाय चाटना कहना ही ज्यादा उपयुक्त नहीं होगा ??? 


इसलिए किस डे मतलब चाटन दिवस .. ठीक है ?

हमारा देश त्यौहारों का देश है .. यहाँ तो बड़े उत्सवी प्रजाति के लोग बसते हैं । वे किसी भी उत्सव को अपने अपने तरीके से मना ही लेते हैं । कुछ तो इन त्यौहारों को अपने दैनिक जीवन चरित्र में ही शामिल कर लेते हैं ।

एक ही त्यौहार को अलग अलग तरीके से मनाना भी सांस्कृतिक एकात्मवाद का परिचायक है । चाटन दिवस भी हमारे यहाँ कई तरीकों से मनाया जाता है । चाटने के कुछ मुख्य भारतीय तरीके जो साल भर
24X7 मनाये जाते है उनके प्रकार निम्न हैं ...

1. दिमाग चाटना
2. उँगलिया चाटना
3. तलवा चाटना
4. थूक के चाटना
5. तशरीफ चाटना

वैसे इन सभी प्रकारों का विस्तृत विवरण भी लिख सकता हूँ लेकिन आप सभी समझदार और जानकार है, सभी प्रकारों के चाटुकारों से भली-भाँति अवगत होंगे ।

ज्यादा लिखूँगा तो फिर आप ही कहोगे .... अबे महाराज तुम तो साले 1 नम्बर के चाटुकार हो ।

अंग्रेजी की डिक्शनरी में kiss का अर्थ लाड़ दुलार करना भी है । आप सब मुझे सदैव ये वाला किस करते रहें है उम्मीद है हमेशा ऐसे ही किस करते रहेंगे । 


वंस अगेन हैप्पी
 “चाटन डे"...चाटिये मगर ध्यान से कहीं लार टपक ना जाय  

शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

कृष्ण ईवटीजर ही नहीं शातिर चोर भी




कभी कभी जब कुछ काम नहीं होता तो फालतू लोगों के बयान दिमाग में आने लगते है । शायद इसी लिए कहा गया है "खाली दिमाग शैतान का" । ऐसा ही वाक्या अभी अभी मेरे दिमाग के साथ हुआ चूँकि अब दिमाग शैतान का था इसलिए सीधे जयपुर पहुँचा और प्रसून जोशी से टकराया । 

विगत दो वर्षों से पुष्कर में लगने वाला गदर्भ मेला अब जयपुर में लगने लगा है । इसी मेले में नन्दी ने अपने बयान से खूब सुर्खियाँ बटोरी । सुर्खियाँ इसलिए क्योंकि आजकल विवादास्पद होकर ही सुर्खियाँ बटोरी जा सकतीं है वरना चौथे स्तम्भ को बड़ी जिम्मेदारी उठाने एवं सत्ता का जहर पीकर माँ के कंधो पर रोने वालों के अलावा कोई सुर्खियाँ कहाँ दिखती है । 

सुर्खियाँ बटोरने की दौड़ में प्रथम स्थान हेतु प्रयासरत प्रसून जोशी को काफी मायूसी हुई होगी क्योंकि उनके बयान से किसी की धार्मिक भावनायें आहत नहीं हुई और वे नन्दी से पिछड़ गये । प्रसून ने यहाँ पर बहुत बड़ी तकनीकि भूल कर दी । या तो उन्हे किसी ऐसे समुदाय के इष्ट पर टिप्पणी करनी थी जिनकी भावनायें आहत हो जाती हैं या फिर भरी दोपहरी सपने देखने वाले प्रवीण तोगड़िया से पहले ही मैच फिक्स कर लेना था । 

जबसे पता चला है कि कृष्ण गुजरात के द्वारिका में शिफ्ट हो गये थे, वो लालू और मुलायम जैसे सेकुलर यादवों के इष्ट भी कहाँ रह गये हैं जिससे उनकी भावनायें आहत हो ।

खैर प्रसून बाबू मैं आपके महाज्ञान को जरा दुरूस्त करना चाहता हूँ । कृष्ण केवल ईव टीजर ही नहीं थे वे शातिर चोर भी थे । गोकुल में ऐसा कोई घर नहीं होगा जिसमें उन्होने माखन चोरी नहीं की होगी । 

लेकिन यदि कृष्ण के बारे में कुछ गंभीर कहना है तो पहले उन्हे आत्मसात कीजीये । किसी गदर्भ सम्मेलन में चिंता कर कृष्ण को नहीं समझा जा सकता । उसके लिए मीरा और सूर जैसी लगन चाहिए । 

प्रसून बाबू आप गीतकार अच्छे हैं कभी कभी दूसरों के गीत भी पढ़ लिया कीजीए । कभी जानने का प्रयास किया है जब उद्धव गोपी प्रसंग ? देखिए कैसे गोपिकायें कृष्ण के विरह में तड़प रहीं हैं । क्या आपकी नजर में ऐसी कोई स्त्री है जो अपने मुहल्ले में किसी ईवटीजर को ना पाकर ऐसी विरह वेदना से भर जाती है । अपनी बहन और बेटी से ही पूछकर देखें कि जिस दिन उन्हे कोई ईवटीजिंग नहीं करता है तो क्या वे दुखी होकर खाना-पीना छोड़ देती हैं ? 

एक बार महसूस कर देखें कि कृष्ण की लीला और ईव टीजिंग में कितना बुनियादी फर्क है फिर आप अपनी माँ से यही कहेंगे “मैं तुझे बतलाता नहीं, कितना घटिया सोच सकता हूँ मैं माँ “ और आपके तारे दिन में ही जमीन पर आ जायेंगे । 

खैर बात निकली है तो ये भी कहना चाहूँगा कि कृष्ण पर कोई कितना भी कीचड़ उछाले कम से कम मेरी भावनायें आहत नहीं होती और ना ही गुस्सा आता है क्योंकि मेरा कृष्ण इतना कमजोर नहीं जो किसी के कीचड़ उछालने से मैला हो जायेगा । मुझे अगर कुछ आता है तो सिर्फ प्रसून जैसे लोगों की बुद्धि पर तरस । 

जो भी मित्र प्रसून जोशी के बयान से सहमत हो उनके चिंतन के लिए सूरदास के उद्धव-गोपी संवाद के कुछ अंश ....


ऊधौ हम आजु भईं बड़ भागी ।
जिन अँखियन तुम स्याम बिलोकेए ते अँखियाँ हम लागीं ॥
जैसे सुमन बास लै आवतए पवन मधुप अनुरागी ।
अति आनंद होत है तैसेंए अंग.अंग सुख रागी ॥
ज्यौं दरपन मैं दरस देखियतए दृष्टि परम रुचि लागी ।
तैसैं सूर मिले हरि हम कौंए बिरह बिथा तन त्यागी ॥




शनिवार, 26 जनवरी 2013

चिंतन शिविर की चिंता


हम- अभी आधे घण्टे से लाईट गुल थी ।
वो - गुल मतलब फूल ?
हम- अरे नहीं भाई
वो - नही , मतलब फूल नहीं तो क्या फ्लावर ???
हम - अरे नहीं बबलू भाई ..मेरा मतलब बिजली चली गई थी
वो -चली गई थी मतलब कहाँ ?  किसके साथ ?
हम -अब हमें क्या पता कहाँ गई थी? हमें बताकर कहाँ जाती है? 
वो तो फिर लौट कर आई ?
हम -- हाँ वही तो कह रहा हूँ पूरे पन्द्रह मिनट बाद आई ?
वो -तो फिर ज्यादा दूर नहीं, किसी पड़ोसी के घर गई होगी ?
हम -- अच्छा , आपको बहुत जानकारी है ।
वो -- हाँ , हमारी बिजली भी 15-20 मिनट में आ जाती है, पुछने पर बताती है पड़ोसी के यहाँ मोमबत्ती लेने गई थी ।
हम - अच्छा , काफी तेज है आपका पड़ोसी ? 
वो हाँ, काफी तेज, कहता है मुझे जिन्दगी में बहुत काम करने हैं, अभिसेक्स मोनू से भी ज्यादा तेज । 
हम
अच्छा फिर ठीक है, वो कुछ करे या ना करे कहीं का बक्ता जरूर बन जायेगा । 
वो
खैर छोड़ो, आप ये बताओ बिजली गई और आधे घण्टे लौट आई फिर क्या हुआ ? 
हम
इस बीच अंधेरे में हम पर आतंकी मच्छरों ने हमला बोल दिया ।
वो अच्छा , आपके यहाँ बिजली जाती है तो अंधेरा हो जाता है ? 
हम
हाँ भाई , क्यूँ आपके यहाँ नहीं होता क्या ? 
वो
नहीं, हमारी बिजली जिसके यहाँ जाती है उसके यहाँ अंधेरा हो जाता है । 
हम
फिर तो आपका पड़ोसी बहुत काम कर रहा है । आपके मोहल्ले में जल्दी ही कोई जज बनेगा ।  
वो चलिए छोड़िये उससे हमें क्या लेना देना ..वो जाने और उसका काम । आप बतायें फिर क्या हुआ ? 
हम
फिर क्या, हमने शबनम मौसी के स्टाईल में जितने को हो सका अपनी हथेलियों के बीच निपटाया ।
वो अच्छा तो इसमें नया क्या था ? 
हम
बिजली जब आई तब देखा हाथों में भगवा रंग के धब्बे थे । 
वो अरे लेकिन खून के धब्बे तो लाल होंगे ना ? 
हम
हमें मालूम है पिछली बार जब बिजली गई थी तब हमने लाल रंग देखकर यही कहा था साले माओवादी मच्छर .. रक्त पिपासू खूनी दरिन्दे । 
वो
फिर ?
हम फिर क्या...हमारी इकलौती जेएनयू रिटर्न कौमनष्टी सास ने इसे सुन लिया और हमें खूब लताड़ लगाकर हमसे कहा जिस प्राकृतिक पौष्टिक वनस्पतियों को खा खा कर तुमने अपने शरीर में 6 लीटर खून जमा कर लिये हो यदि ये कमजोर और झाड़ीवासी मच्छर अपने हक की दो बूँद खून तुम्हारे शरीर से चूस भी लिये इतना बखेड़ा । जानते हो जिन वनस्पतियों को तुमने खा-पी कर पचा लिया है और इतना  खून जमा कर रखा है उन वनस्पतियों पर पूरा अधिकार इन्ही मच्छरों का है क्योंकि उन झाड़ियों में आदिकाल से इनका आवास है और तुमने इसका घर उजाड़ कर अपना खून बढ़ाया है । 
वो अच्छा फिर तुमने क्या किया ? 
हम
हम और क्या करते , सजा के तौर पर सास को एक बनारसी साड़ी चन्दे में दी । 
वो - अच्छा तो फिर इस बार खून के धब्बे भगवा कैसे
? 
हम
इस बार जैसे ही बिजली गई, जेएनयू रिटर्न कौमनष्टी सास ने हमारी हथेलियों में हल्दी लगा दिया, बस फिर क्या था बिजली जब आई तो हथेलियों पर भगवा धब्बे थे । 

जेएनयू रिटर्न कौमनष्टी सास ने तत्काल हमारी निजी गृहमंत्री को सबूत दिखाकर बताया
– “देखो हाथों में भगवा धब्बे, अब ये साबित हो गया कि ये सारे हिन्दू मच्छर ही हैं ........"भगवा आतंकवादी 

मेरे 10 वर्षीय प्रथम निजीगुणसूत्र ने बताया है कि गृह मंत्री एक कागज पढ़ कर भाषण याद कर रही है और कालोनी के महिलाओं की रात्रिकालीन चिंतन शिविर में ऐलान करने वाली है -
 मेरे पास पक्के सबूत है कि कालोनी में भगवा हिन्दू मच्छरों का आतंक है और इन सबको कालोनी का अध्यक्ष सोहन भागमत ट्रेनिंग दे रहा है । पिछले महिने मौलवी साहब और जुम्मन चाचा की मलेरिया से हुई मौत दरअसल मौत नहीं, हत्या थी और जाँच में ये पुख्ता सबूत मिलें है कि ये भगवा मच्छरों का सुनियोजित षड़यंत्र था ।