बुधवार, 21 मार्च 2012

बुध्दजीवियों की संगोष्ठी और कार्यशाला


सोशियल नेटवर्किंग साईटस पर अक्सर देखता हूँ बड़े नामचीन लोग अपना फेस दिखाता हुआ तस्वीर डालते हैं और बताते हैं कि एक बहुत ही गंभीर मसले पर एक कार्यशाला थी ! कई देशों के सुविख्यात लोग इसमें शरीक हुए और बहुत ही व्यापक और शोध परक तथ्यों का पाठन हुआ ! कुल मिलाकर संगोष्ठी अत्यंत सफल रही !

मुझे आज तक इन संगोष्ठियों का अर्थ और सफलता का मापदण्ड समझ नहीं आया क्योंकि समस्यायें तो जस कि तस बनी हुई हैं ! क्या संगोष्ठी के सफल होने का अर्थ ये है कि खाने पीने और ठहरने की उच्च स्तरीय व्यवस्था थी और बड़े पुरूस्कारों ,सम्मानों ने नवाजा गया !
आखिर इन संगोष्ठियों का वास्तविक धरातल पर क्या अर्थ है ! ये बात मैं अपने निजी अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ ! बस्तर में नक्सलवाद पर कई उच्च स्तरीय संगोष्ठी पर लाखों रूपये खर्च कर आयोजन किया जाता रहा है और जाने माने विशेषज्ञ इन संगोष्ठीयों, कार्यशालाओं में अपने उच्चस्तरीय व्याख्यान देते रहें है लेकिन वास्तविक धरातल पर समस्या सुलझने के बजाय और विकराल रूप लेती जा रही है ! आखिर इन बुध्दजीवी कार्यशालाओं से समस्या उन्मूलन का क्या सम्बंध है और ये आयोजित ही क्यों होते हैं !

अभी कुछ दिनों पूर्व ही भारीभरकम स्थापना व्यय वाले योजना आयोग की रिपोर्ट आई थी जिसमें गरीब होने के मापदण्ड को कई विद्वानों और अर्थशास्त्रीयों ने अथक परिश्रम और करोड़ों रू खर्च कर पहले 32 रू निर्धारित किया था फिर कम पढ़े लिखे और जाहिलों के दबाव में पुन: वातानूकूलित कक्ष में बैठकर उन चिल्लाने वालों मे से कुछ को अमीर बनाने हेतु 28 रू किया ! धन्य है ऐसे बुध्दजीवी
, विचारक, और धन्य है इनकी संगोष्ठी और कार्यशाला !! इनकी ही सदैव जय हो !!  

3 टिप्‍पणियां:

  1. बुद्धिजीवी को बुद्धजीवी किसी खास प्रयोजन से लिखा गया है?

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    1. अब बुध्दिजीवी कम ही दिखाई पड़ते हैं !

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  2. असरकारी काम करना हो तो उसमे कुछ भी सरकारी नहीं होगा !

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