सोमवार, 14 नवंबर 2011

मोमबत्तियों का मानवाधिकार

कुछ दिनों पूर्व न्यायमूर्ति जी एस सिंघवी और न्यायमूर्ति एस जे मुखोपाध्याय की सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने पंजाब के आतंकवादी देवेंदर पाल सिंह भुल्लर की अपील पर विचार करते हुए एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में कुछ लोगों का ही विशेषाधिकार नहीं हो सकता क्योंकि यह समाज के बाकी वंचित तबकों और हिंसा पीड़ितों को भी प्रभावित करता है।  

उन्होने कानून तोड़ने वालों के मानवाधिकार मामलों की हिमायत करने वालों की तरफ इशारा करते हुए कहा कि कोई भी भुखमरी, किसानों की आत्महत्या और आतंकवादी हिंसा में सुरक्षाकर्मियों के मारे जाने की बात क्यों नहीं कर रहा। 

इस टिप्पणी को हमारी सेक्यूलर भाँड मिडिया ने भी ज्यादा तवज्जो  नहीं दी क्योंकि उसे गरीब किसानो और निचले स्तर के गरीब सुरक्षा कर्मियों की हत्या भुल्लर और अफजल गुरू के मानवाधिकारों के मुकाबले गौण लगता है और इसके लिए वरिष्ठ पत्रकारों या सही मायने में कहें तो पक्षकारो को अब कोई गुलाम नबी फाई जैसा प्रायोजक भी तो नहीं मिलेगा जो इनके लिए सेमिनार का आयोजन करे और डालर की माला से सम्मानित करे  

जेएनयू खदान से निकले मोमबत्ती ब्रिग्रेडीयों की नजर में मानवाधिकार कुछ लोगों का ही विशेषाधिकार होता और समाज के बाकी वंचित तबकों और हिंसा पीड़ितों का कोई मानवाधिकार नहीं होता खासकर तब जब वो वोट बैंक ना हो या इससे किसी सरकार को दबाव में ना लाया जा सके !  

हमारे एक झोलाछाप गाँधीविवादी मोमबत्ती ब्रिग्रेडी तो साफ साफ कहते नजर आते हैं कि चूँकि शासन के द्वारा सुरक्षा कर्मियों को वेतन मिलता है इसलिए उनके मौत को हम अन्य लोगों के मानवाधिकार की श्रेणी में नहीं ले सकते ! उनकी नजर में शासन के विरूध्द सशस्त्र विद्रोह दबे कुचले लोगों के लिए शासन के खिलाफ समाज सेवा है !  

देश को भ्रष्टाचार से मुक्त करवाने का प्रण किये हुए इक्कसवीं सदी के स्वघोषित हरिश्चंद्र  प्रशांत भूषण तो कश्मीर के लोगों के मानवाधिकारों के लिए इतने चिंतित हैं कि उनका बस चलें तो जनमत संग्रह करवाकर कश्मीर को आजाद करवा दें लेकिन इन जनहित याचिका के मामा शकुनि को कश्मीरी हिंदुओं का मानवाधिकार नहीं दिखता जो वर्षों से अपने ही देश में तम्बुओं रह कर बंजारों सा निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहे हैं और बात भी वाजिब है उनके लिए जनहित याचिका दायर करने से इस निर्मोही करोड़पति समाजसेवी को कौन सा समझौता पैकेज या पुरूस्कार मिलेगा ! अगर इनके लिए लड़ेंगे तो इस बुकरी बाई अरूंधती और भाँड समाजी स्वामी नग्नवेश को कौन पुरूस्कार देगा ! इनकी गिनती करने के लिए कोई सरकार  इनके बगुला मुक्ति मोर्चा को अनुदान भी तो नहीं देती ! हाँ अमरनाथ के बर्फ को पिघलाने के लिए अग्नि व्यवस्था हेतु इस अग्निवेशी को कुछ विदेशी घी मिल सकती है !

मुझे इन तथाकथित पंजीकृत मोमबत्ती ब्रिग्रेडी मानवाधिकारी बहुरूपियों से बस इतना ही पुछना है अगर तुम्हे सरकार के दमन के विरूध्द ही मानवाधिकार के लिए ही लड़ना है तो भोपाल गैस कांड में पीड़ित उन लाखों असहाय लोगों के लिए क्यूँ नहीं लड़ते जो सरकारी संरक्षण प्राप्त एक अमेरिकी कम्पनी के गुनाह की सजा आज तक भोग रहें हैं ! बम विस्फोटों में मारे गये निर्दोष लोगों के परिवारों के वाजिक हक के लिए क्यों नहीं लड़ते ! उन सुरक्षाकर्मियों के परिवारों के लिए क्यों नहीं लड़ते जिनकी सूनी आँखे आज भी अपने चिराग की राह देख रहीं है , जिनके दुधमँहे बच्चे जानते ही नही मौत किसे कहते हैं वो आज भी कहते हैं पापा ड्यूटी गयें हैं ! कभी उनके घर जाकर पूछा उनका पीएफ , बीमा राशि क्या उन्हे पूरा मिला ? उनकी पेंशन चालू हुई की नहीं ?  

अरे नमक हरामों कभी तो उन शहीदों की विधवाओं के हक के लिए भी मोमबत्ती जलाओ जिनको मिलने वाले पेट्रोलपंप किसी सफेदपोश को मिल गये और जो तुम्हारे लम्बी गाड़ी में दान के नाम पर फ्री में पेट्रोल डलवाकर जागरूक नागरिक बना फिर रहा है ! मुझे मालूम है ये सब तुम्हारे बस की बात नहीं क्योंकि इन सब कार्यों से तुम्हारा अमेरिकी अन्नदाता या गुलाम नबी फाई  जैसा भाई तुम्हारे लिए “डॉलर सम्मान” की व्यवस्था नहीं करेगा और इससे तुम्हारे आत्मसम्मान को गहरी चोट लगेगी ! बस तुम लोग अमेरीकन मोमबत्ती जलाओ और चैन की बंशी बजाओ वो भी “राग कश्मीरी कल्याण ” विलम्बित डालर ताल !! जय हो !! 

6 टिप्‍पणियां:

  1. जाहिर है हर आंदोलन को चलाने के लिये पैसे लगते हैं डालर प्रेरित आंदोलन चलाना लाभकारी है और जवानो के लिये आंदोलन करने मे चंदा नही मिलता ऐसे मे बेचारे जींस कुर्ता धारी करें क्या

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  2. Ye fursat ke vichar kaise ho sakate hain.
    jahannum me jayenge yadi vichar khud ke hon aur amal na karen.

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  3. बहुत सही कटाछ है ......नरक मचा दिया है ....इन लोगों ने .....सब कुछ देखावा है .....ग्लोसरीन के आशु रोते है ये ........एक्टिंग करते है ...

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  4. बहुत सार्थक चिंतन....
    जाने क्यूँ ? पर हमेशा मानवाधिकारी मानवता को शर्मसार करने वालों के साथ ही खड़े नज़र आते हैं..... इन कूप मण्डूकों को कुएं से बाहर खींच लाने की आवश्यकता है और आपका आलेख ऐसा ही सार्थक प्रयास है....
    सार्थक चिंतन के लिये सादर बधाई

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  5. bahut roshpoorn aalekh saarthak vichar achcha vyangaatmak lekh bahut pasand aaya.

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