मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

भारतीय खुदरा बाजार क्षेत्र में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश - कुछ जिज्ञासायें


भारतीय खुदरा बाजार क्षेत्र में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश अर्थात FDI इन दिनों काफी चर्चा में है और जिसके कारण संसद भी ठप्प है या आप ये भी कह सकते है कि ठप्प करने के लिए इस बार ये बहाना बनाया गया है ! बड़े बड़े तकनीकी शब्दावलियों , उदाहरणों के द्वारा पक्ष और विपक्ष में लोगों के तर्क-वितर्क भी पढ़ने सुनने को मिला ! इस प्रकरण पर कई विद्वानों के मतों के अध्ययन के बावजूद मैं अपने आप को असमंजस की स्थिति में पा रहा हूँ ! लेकिन इस मुद्दे पर कुछ सामान्य से प्रश्नों के उत्तर धरातल पर नहीं मिल पा रहें हैं !

एक परिस्थिति की कल्पना करें !  माना आज सब्जी मार्केट में 1 किलो मटर 50 रू किलो मिल रहा है और उस मटर का मूल्य उसके उत्पादक किसान को 10 रू मिल रहा है ! अब उसे वालमार्ट किसानो से सीधे खरीद कर 40 रू में बेचेगा !

जिज्ञासा प्रकरण एक -  क्या गारंटी है कि किसान को वालमार्ट 20 रू भी देगा ! क्या इस पर सरकार समर्थन मूल्य निर्धारित कर पायेगी बल्कि इसकी सम्भावना ज्यादा है कि वालमार्ट जैसी कम्पनियाँ मण्डियों को समाप्त कर सीधे किसान से माल खरीदेगी और कुछ समय पश्चात एक मात्र थोक खरीदार बन कर पर इसकी मूल्य निर्धारक बन जायेगी और कमोबेश किसान को अभी जो 10 रू मिल रहा है उसे मजबूरी में 8 रू में बेचना पड़े ! क्योंकि उस सरकार से जो पेट्रोलियम को नियंत्रण मुक्त कर दी है वो दैनिक उपभोग के वस्तुओं पर मूल्य नियंत्रण करेगी ! रही बात किसानो के फायदे कि तो आज भी लेस कम्पनी सैफ खान के साथ साम्भा डांस के साथ जो 800 रू किलो आलू चिप्स बेच रही है वो आलू किस कीमत पर खरीद रही है !

जिज्ञासा प्रकरण दो - ठीक है ग्राहक को प्रत्यक्ष फायदा 10 रू का हुआ लेकिन वालमार्ट शहर के गली गली में अपने रिटेल स्टोर तो खोलेगा नहीं और ग्राहक को इन छोटी छोटी जरूरतों के लिए कम से कम 10-20 किमी की यात्रा करनी पड़ेगी ! तो उस पर खर्च होने वाला ईंधन व्यय और पार्किंग का अप्रत्यक्ष व्यय जिसे आम तौर पर लोग नजरंदाज करते हैं उसे खर्च में जोड़ा जाय तो वास्तविक मूल्य आभासी मूल्य से कहीं अधिक ही होगा !

जिज्ञासा प्रकरण तीन – अभी जो खुले बाजार में मटर 50 रू किलो बिक रहा है उसे प्रारंभ में वालमार्ट हो सकता है 30 रू में बेचे लेकिन इसकी पूरी सम्भावना है कि छोटे कोचियों के दुकान बंद होने के बाद यही उसे 80 रू में भी बेच सकता है ! इसके पीछे मेरा स्व अनुभव है !  छत्तीसगढ़ में पहले छोटी छोटी काफी सीमेंट उत्पादक कारखाने थे फिर एक बड़ी मल्टीनेशनल कम्पनी का पदार्पण हुआ जो अपने उत्पादन मूल्य से भी कम अथवा बराबर मूल्य में सीमेंट बेचना चालू की जो इन स्थानीय उत्पादकों के मूल्य से भी काफी कम थी ! इस कम्पनी का एक डीलर मेरा धनिष्ठ मित्र था उससे मैंने जिज्ञासावश इस बारे में पूछा कि इतने कम दाम में ये कम्पनी सीमेंट कैसे बेच रही है तो उसने मुझे कहा कम्पनी अपना पैर जमाने के लिए अभी प्रमोशनल के तौर पर घाटा  उठाकर लागत मूल्य पर बेच रही है ! लेकिन कम्पनी की रणनीति मुझे तब समझ आई जब स्थानीय उत्पादक उस मूल्य से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सके और साल भर के अंदर ही आर्थिक बदहाली का शिकार होकर कारखाने बंद हो गये ! जैसे ही सीमेंट की स्थानीय फैक्ट्रियाँ बंद हुई वैसे ही उस मल्टीनेशनल कम्पनी ने अपने दाम तीन महीनो के भीतर ही दुगुने कर दिया और सामाज्य पर एकाधिकार कर पुराने घाटों की भरपाई कर आज तक मलाई चाट रही है ! आज भी देखा जाय तो हमारी ही जमीन से कौड़ियों के भाव पर रायल्टी पटा कर लाईम स्टोन का उत्खनन कर हमें अपने सुविधानुसार बेलगाम कीमतों पर सीमेंट बेच रही है ! कोई विषेशज्ञ हो तो बतायें सीमेंट का उत्पादन मूल्य और विक्रय मूल्य का अंतर कितना है ?

जिज्ञासा प्रकरण चार - फिर वालमार्ट जो मुनाफा यहाँ से कमायेगा उसे डॉलर में बदलकर भारत से बाहर ले जायेगा जिससे मुद्रा का अवमूल्यन नहीं होगा क्या ? क्या इससे हमारी कमाई का एक बड़ा हिस्सा जो आज देश के अंदर ही सर्कुलेट हो रहा है उसके देश के बाहर जाने पर एक असंतुलन की स्थिति उत्पन्न नहीं होगी !  

5 टिप्‍पणियां:

  1. वाह वाह संजय भाई.......मुझसे पहले.......मेरे मन की बात आपने कह दी........ बहुत खूब.......

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  2. बात तो पते की है ,,,भाई ,,,,,बकरे बनेगे हम ,,,,,,और दूजे बनगे कसाई ,,,,,,

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  3. रिटेल व्यापार में ऍफ़डीआई देश में आर्थिक संकट और बेरोज़गारी को जन्म देने वाला कदम है. देश दोबारा विदेशी नियंत्रण में चला जायेगा

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