बुधवार, 18 जनवरी 2012

हमारी मंचीय संस्कृति


अजब है मेरे देश की वर्तमान संस्कृति ( वर्तमान मैं इसलिए कह रहा हूँ कि पुरानी तो देखी नहीं ..होश सम्भलने  के बाद जो देख रहा हूँ उसके बारे में ही कह रहा हूँ )
                

मेरे देश में किसी भी सम्मेलन में जनसमुदाय दो हिस्सों में बँटा होता है ! एक हिस्से में दूसरे हिस्से की अपेक्षाकृत काफी मात्रा में अधिक सदस्य होते हैं ! दोनो हिस्से एक दूसरे के मुखातिब बैठे होते हैं लेकिन उन्हे दो पक्ष कहना उचित नहीं होगा क्योंकि आमतौर पर उनमें  मतैक्य होता हैं ! न्यून सदस्यों वाला हिस्सा अमुमन उँचे स्थल पर बैठता है और बहुसदस्य वाला हिस्सा अपेक्षाकृत  नीचे होता है ! बोलचाल की भाषा में उँचे स्थल को मंच और नीचे स्थल को पण्डाल कहा जाता है !  चूँकि मंच उँचा होता है इसलिए मंचस्थ व्यक्तियों को श्रेष्ठ माना जाता है या इसे यूँ भी कह सकते हैं कि पंडाल के लोगों से मंचस्थ लोगों को श्रेष्ठ सिध्द करने के लिए मंच बनाया जाता है ! शायद यही कारण है कि किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रमों में व्यक्ति मंचासीन होने के जुगाड़ में अपनी सारी उर्जा लगा देता है !



शिक्षक दिवस पर शिक्षकों को प्रदान किये जा रहे एक सम्मान कार्यक्रम में मैंने देखा सम्मानित होने वाले शिक्षक पण्डाल में बैठे हैं और सम्मान देने वाले मंचस्थ हैं ! एक उँगलबाज ने हमसे पूछा महाराज ये समझ में नहीं आ रहा है कि सम्मानित होने वाले शिक्षक नीचे बैठे है और सम्मानित करने वाले मंच पर क्या ये उचित है ! हमने कहा अरे उँगलबाज तुम्हे इतना भी ज्ञान नहीं है हमारे देश में देने वाला हमेशा लेने वाले से महान होता है ! जाहिर है देने वाले उपर ही बैठेंगे  !



वो भी कोई आम आदमी नहीं था अपने नाम उँगलबाज को पूरी तरह चरितार्थ करता था ! कहाँ चुप रहने वाला तुरंत सवाल दागा, तो फिर चुनाव के समय तो ये माँगने वाले होते हैं और जनता दाता ! उस हिसाब से तो जनता को मंच पर बैठना चाहिए ! हमने कहा अरे घोंचू मामले को पूरी तरह समझा कर ! चुनाव में नेता वोट माँगने नहीं आते, मना करने आते हैं और कहते हैं आपका वोट कीमती है हमे “मत”दान करना लेकिन तुम हो कि उन्हे जबरदस्ती दान कर देते हो और साले सही बात तो ये है कि तुम कौन सा दान करते हो ? तुम तो एक बोतल दारू और दो पीस चिकन में उसे बेच देते हो ! इस प्रकार से तुम विक्रेता हुए और वो ग्राहक ! मारवाड़ी की दुकान में लिखा हुआ देखा है कि नहीं, ग्राहक देवता होता है ! अब क्या देवता को नीचे बिठाओगे ! उँगलबाज हमेशा की तरह हमसे खिन्न होकर अपनी उँगली छुपाता भुनभुनाता हुआ चला गया !



खैर बात मुद्दे से भटक गई ! बात हो रही थी मंची और पण्डालियों की ! आम भाषा में मंच में बैठे लोगों को “बकता” और नीचे बैठे लोगों को “सरोता” कहते हैं लेकिन सुनने में जरा ये असंसदीय भाषा जैसा लगता है इसलिए हम मंचस्थ लोगों को मंची और नीचे बैठे लोगों को पण्डाली कहेंगे ! इन शब्दों का बहुत कम उपयोग होता है इसलिए संसदीय टाईप का लगता है !



चूँकि प्रकृति का नियम है जलधारा का प्रवाह सदैव उपर से नीचे की ओर ही होता है इसलिए सम्मेलनों में भी इस प्राकृतिक नियमों का पालन करते हुए विचारों का आदान-प्रदान ना करते हुए केवल मंच से प्रदान ही होता है ! संसदीय भाषा में इसे सम्बोधन कहते हैं ! आमतौर पर मंचस्थ विद्वान निजी जीवन में इतने व्यस्त होते हैं कि उन्हे अच्छे सम्बोधन जैसे तुच्छ कार्य के लिए समय निकाल पाना सम्भव नहीं हो पाता ! अत: वे किसी पण्डाली टाईप के व्यक्ति को सहायक रखते हैं जो उनके लिए सम्बोधन को लिखित रूप प्रदान करता है जिसे पढ़कर वे पण्डालों को सम्बोधित करते हैं ! इसमें कोई शर्म की बात नहीं है, अमेरिका का राष्ट्रपति ओबामा भी लिखा हुआ ही सम्बोधन पढ़ता है !  



इन दोनो पक्षों के अलावा सम्मेलन में प्रकृति के नियमानुसार बाबी डार्लिंग टाईप का भी एक बीच वाला एक आदमी होता है ! जो औकात से होता तो पण्डाली है पर मंचस्थ होता है ! उसे सामान्य भाषा में विदूषक और संसदीय भाषा में उद्घोषक कहते हैं ! उसका मुख्य कार्य होता है, मंचीयों के मंच पर आगमन तक पण्डालियों को शांत बिठाकर बाँधे रखना जिससे वे झुण्ड से बाहर बिदक ना जाये ! इसके लिए वो इतिहास, भूगोल, काव्य, गजल आदि का सहारा लेकर और सम्मेलन की महत्ता को गद्य पद्य दोनो ही विधा में बताकर ऐसा माहौल बनाये रखता है कि यदि कोई पण्डाली वहाँ से चला गया तो अपने जीवन का स्वर्णिम समय खो देगा !

5 टिप्‍पणियां:

  1. x - आम भाषा में मंच में बैठे लोगों को “बकता” और नीचे बैठे लोगों को “सरोता” कहते हैं लेकिन सुनने में जरा ये असंसदीय भाषा जैसा लगता है इसलिए हम मंचस्थ लोगों को मंची और नीचे बैठे लोगों को पण्डाली कहेंगे
    x -चूँकि प्रकृति का नियम है जलधारा का प्रवाह सदैव उपर से नीचे की ओर ही होता है
    x - जो औकात से होता तो पण्डाली है पर मंचस्थ होता है ! उसे सामान्य भाषा में विदूषक और संसदीय भाषा में उद्घोषक कहते हैं

    मंचीय व्यवस्था का उत्कृष्ट वर्णन किया है आपने..यह सत्य है की पानी और ऊर्जा का प्रवाह ऊपर से नीचे की और होता है...और डाटा को ही उच्च आसन दिया जाता है...किन्तु ये कलयुग है....प्रवाह का नियम उल्टा हो गया है ... मंचासीन व्यक्ति उच्च ऊर्जा या बौद्धिक स्तर का हो कोई जरूरी नही.....मंच तो बस अब स्वयं को स्वयंभू साबित करने का जरिया मार्ट है...जबकि सच्चाई तो यह है की ऊँचाई पर वही पहुँचता है...जिसके पैर जमीन पर हों ...क्या पता मंच का कौन सा पुर्जा ढीला हो जाए...और मंच डह जाए

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  2. एक सिद्धांत पढ़ा था.....शायद मैक्प्रभु का था..... उनका ये कहना था की सभी व्यक्तियों को मत देने का अधिकार नहीं होना चाहिए..... मत देने के लिए एक पात्रता होनी चाहिए.....जैसे शिक्षा, पद और संपत्ति....... मुझे लगता है उन्होंने पूरी तरह से गलत बात नहीं की थी..... जिस व्यक्ति के सामने दो जून की रोटी जुटाने का प्रश्न जीवन मरण के सामान हो...... उससे ये अपेक्षा करना की वो उन चंद रुपयों का लालच छोड़ देगा, जो उसके परिवार के लिए चार रोज़ की रोटी का जुगाड़ कर सकती हो........... जिस व्यक्ति के लिए शराब उसकी सभी समस्यावों का निदान हो ......उससे ये अपेक्षा करना की अवसर प्राप्त होने पर भी वह उससे वंचित रहना स्वीकार करेगा.. ......और जिस व्यक्ति की खुद की साँसे दूसरों की दया पर आश्रित हों .........उससे देश के बारे में निर्णय लेने हेतु उचित व्यक्ति को चुनने की चुनौती......माफ़ कीजिये बहुत बड़ी चुनौती है......

    परन्तु यह वह समाज है ....... जहाँ वे जो बुद्धिजीवी होने का दावा करते हैं......स्वयं मतदान करने नहीं जाते और निर्णय उन पर छोड़ देते हैं......जो उचित अनुचित का विभेद करने की काबिलियत नहीं रखते.......अब बोया पेड़ बबूल का........तो गाली किसको देत....

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  3. यही तो दुर्भाग्‍य है देश का।

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