गुरुवार, 19 जनवरी 2012

कश्मीरी हिंदुओं का दर्द

19 जनवरी 1990  ये वही काली तारीख है जब कश्मीर की घाटी में 24 घण्टे में कश्मीर छोड़ दो या मारे  जाओका संदेश गूँज उठा  था ! भयाक्रांत लाखों कश्मीरी हिंदुओं को अपनी मातृभूमि , अपना सारी सम्पत्ति हमेशा के लिए छोड़ कर अपने ही देश में शरणार्थी होना पड़ा ! 22 वर्ष बाद भी वे आज भी शरणार्थी ही हैं और उन्हें वहाँ से भागने के लिए मजबूर करने वाले जो केवल सुख सुविधा के उपभोग हेतु ही भारत के नागरिक थे और पाकिस्तान समर्पित थे , वे आज भी हैं | उन कश्मीरी इस्लामिक आतंकवादियों को वोट डालने का अधिकार भी है, पर इन हिंदू शरणार्थियों को वो भी नहीं | 


बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि सोशियल नेटवर्किंग साईटों में लिंक चिपकाने में , चौक चौराहों में मोमबत्ती जलाने वाले और मिडिया में स्यापा गाने में माहिर और मानवाधिकारों के स्वघोषित अधिकृत झण्डाबरदारों को इसके लिए आवाज उठाने में शर्म आती है क्योंकि इनके लिए आवाज उठाने से इन शेखुलरों को आत्मग्लानी होती होगी ! वे तो बाबा रामदेव के कालिख पोतने और बुखारी की वकालत करने में गर्व महसूस करते है ! और उठायें भी क्यूं , इसके लिए डॉलर जो नहीं मिलता !  

बाबरी मस्जिद और हिंदु शब्द के खोज में निकले इन गोधराजनित शेखुलरों को वो आवाज भी आजान जैसी पवित्र ही लगी जब "कश्मीर में रहना है तो अल्लाह-अकबर कहना है", और "असि गाची पाकिस्तान, बताओ रोअस ते बतानेव सन" (हमें पाकिस्तान चाहिए, हिंदू स्त्रियों के साथ, लेकिन पुरुष नहीं"), जैसे नारे कश्मीरों की मस्जिदों के लाऊड स्पीकरों से आ रही थी !  

भाँड मिडीया भी आज शाम को शेखुलरों और चमेली बाईयों को इकठ्ठा करेगा और आधे घंटे गहन चिंता प्रकट कर अपने दायित्वों का निर्वहन कर लेगा ! अभी तो उत्तर प्रदेश से लाईव कव्हरेज दिखाकर स्तुतिगान में तल्लीन अपने नमक का कर्ज अदा कर रहा है !  कुछ स्वयंभू अति उदारवादी समाजसेवी मोमबत्ती जला कर चौक में इकठ्ठे होकर फोटोशेशन करवायेंगे ! और कुछ गेरूआ वस्त्रधारी स्वयं को हिन्दुओं का अधिकृत धर्मरक्षक सिध्द्द करने के चक्कर में आज चीखेंगे चिल्ल्येंगे मातम भी मनायेंगे और शाम को किसी बार में जाकर गमगलत करेंगे !   

आज कश्मीर घाटी में हिंदू नहीं हैं | उनके शरणार्थी शिविर जम्मू और दिल्ली में आज भी हैं | उन्हें भगाने वाले गिलानी जैसे लोग आज भी जब चाहे दिल्ली आके कश्मीर पर भाषण देकर जाते हैं और उनके साथ अरूंधती रॉय जैसे भारत के तथाकथित शेखुलर बुद्धिजीवी शान से बैठते हैं | 

इन कश्मीरियों का गुनाह केवल इतना ही है कि वे हिंदु हैं , इसलिए उनका इस देश में कोई मानवाधिकार नहीं है ! इस देश में मानवाधिकार भी वोट बैंक और विदेशी चंदे के आगम देखकर ही तय किया जाता है ! अधिकार तो छोड़िये इन्हे तो अब मानव भी नहीं समझा जाता ! वाह रे मेरे महान प्रजातांत्रिक देश ,धन्य है तू , तेरी प्रजातांत्रिक धर्म निरपेक्ष सरकारें और उसपे आठ चाँद लगाते  तेरे शेखुलर मानवाधिकारी ! जय हो !

2 टिप्‍पणियां:

  1. कोई रूप नहीं बदलेगा सत्ता के सिंहासन का
    कोई अर्थ नहीं निकलेगा बार-बार निर्वाचन का
    एक बड़ा ख़ूनी परिवर्तन होना बहुत जरुरी है
    अब तो भूखे पेटों का बागी होना मजबूरी है

    जागो कलम पुरोधा जागो मौसम का मजमून लिखो
    चम्बल की बागी बंदूकों को ही अब कानून लिखो
    हर मजहब के लम्बे-लम्बे खून सने नाखून लिखो
    गलियाँ- गलियाँ बस्ती-बस्ती धुआं-गोलियां खून लिखो

    हम वो कलम नहीं हैं जो बिक जाती हों दरबारों में
    हम शब्दों की दीप- शिखा हैं अंधियारे चौबारों में
    हम वाणी के राजदूत हैं सच पर मरने वाले हैं
    डाकू को डाकू कहने की हिम्मत करने वाले हैं

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  2. विचारणीय विषय।
    सार्थक लेखन के लिए आभार.....

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