रविवार, 22 जुलाई 2012

अमरनाथ यात्रा - भाग 2


इतिहास के पन्नो से

श्री अमरनाथ यात्रा के उद्गम के बारे में इतिहासकारों के अलग-अलग विचार हैं। कुछ लोगों का विचार है कि यह ऐतिहासिक समय से संक्षिप्त व्यवधान के साथ चली आ रही है जबकि अन्य लोगों का कहना है कि यह 18वीं तथा 19वीं शताब्दी में मलिकों या मुस्लिम गडरियों द्वारा पवित्र गुफा का पता लगाने के बाद शुरू हुई। आज भी चौथाई चढ़ावा उस मुसलमान गडरिए के वंशजों को मिलता है। इतिहासकारों का विचार है कि अमरनाथ यात्रा हज़ारों वर्षों से विद्यमान है तथा बाबा अमरनाथ दर्शन का महत्त्व पुराणों में भी मिलता है। पुराण अनुसार काशी में लिंग दर्शन और पूजन से दस गुना, प्रयाग से सौ गुना और नैमिषारण्य से हज़ार गुना पुण्य देने वाले श्री अमरनाथ के दर्शन है। बृंगेश सहिंता, नीलमत पुराण, कल्हण की राजतरंगिनी आदि में इस का बराबर उल्लेख मिलता है। बृंगेश संहिता में कुछ महत्त्वपूर्ण स्थानों का उल्लेख है जहाँ तीर्थयात्रियों को श्री अमरनाथ गुफा की ओर जाते समय धार्मिक अनुष्ठान करने पड़ते थे। उनमें अनन्तनया (अनन्तनाग), माच भवन (मट्टन), गणेशबल (गणेशपुर), मामलेश्वर (मामल), चंदनवाड़ी (2,811 मीटर), सुशरामनगर (शेषनाग) 3454 मीटर, पंचतरंगिनी (पंचतरणी) 3845 मीटर और अमरावती शामिल हैं।


कल्हण की 'राजतरंगिनी तरंग द्वितीय' में कश्मीर के शासक सामदीमत (34 ईपू-17वीं ईस्वी) का एक आख्यान है। वह शिव का एक बड़ा भक्त था जो वनों में बर्फ़ के शिवलिंग की पूजा किया करता था। बर्फ़ का शिवलिंग कश्मीर को छोड़कर विश्व में कहीं भी नहीं मिलता। कश्मीर में भी यह आनन्दमय ग्रीष्म काल में प्रकट होता है। कल्हण ने यह भी उल्लेख किया है कि अरेश्वरा (अमरनाथ) आने वाले तीर्थयात्रियों को सुषराम नाग (शेषनाग) आज तक दिखाई देता है। नीलमत पुराण में अमरेश्वरा के बारे में दिए गए उल्लेख से पता चलता है कि इस तीर्थ के बारे में छठी - सातवीं शताब्दी में भी जानकारी थी ।



कश्मीर के महान शासकों में से एक था 'जैनुलबुद्दीन' (1420-70 ईस्वी), जिसे कश्मीरी लोग प्यार से बादशाह कहते थे, उसने अमरनाथ गुफा की यात्रा की थी। इस बारे में उसके इतिहासकार जोनरजा ने उल्लेख किया है।



अकबर के इतिहासकार अबुल फ़जल (16वीं शताब्दी) ने आइना-ए-अकबरी में उल्लेख किया है कि अमरनाथ एक पवित्र तीर्थस्थल है। गुफा में बर्फ़ का एक बुलबुला बनता है। जो थोड़ा-थोड़ा करके 15 दिन तक रोजाना बढता रहता है और दो गज से अधिक ऊंचा हो जाता है। चन्द्रमा के घटने के साथ-साथ वह भी घटना शुरू कर देता है और जब चांद लुप्त हो जाता है तो शिवलिंग भी विलुप्त हो जाता है।

ऑक्सफ़ोर्ड में भारतीय इतिहास के लेखक विसेंट ए स्मिथ ने बरनियर की पुस्तक के दूसरे संस्करण का सम्पादन करते समय टिप्पणी की थी कि अमरनाथ गुफा आश्चर्यजनक जमाव से परिपूर्ण है जहां छत से पानी बूंद-बूंद करके गिरता रहता है और जमकर बर्फ़ के खंड का रूप ले लेता है। इसी की हिन्दू शिव की प्रतिमा के रूप में पूजा करते हैं।



स्वामी विवेकानन्द ने 1898 में 8 अगस्त को अमरनाथ गुफा की यात्रा की थी और बाद में उन्होंने उल्लेख किया कि मैंने सोचा कि बर्फ़ का लिंग स्वयं शिव हैं। मैंने ऐसी सुन्दर, इतनी प्रेरणादायक कोई चीज़ नहीं देखी और न ही किसी धार्मिक स्थल का इतना आनन्द लिया है।



लारेंस अपनी पुस्तक 'वैली ऑफ़ कश्मीर' में कहते हैं कि मट्टन के ब्राह्मण अमरनाथ के तीर्थ यात्रियों में शामिल हो गए और बाद में बटकुट में मलिकों ने ज़िम्मेदारी संभाल ली क्योंकि मार्ग को बनाए रखना उनकी ज़िम्मेदारी है, वे ही गाइड के रूप में कार्य करते हैं और बीमारों, वृद्धों की सहायता करते हैं, साथ ही वे तीर्थ यात्रियों की जान व माल की सुरक्षा भी सुनिश्चित करते हैं। इसके लिए उन्हें धर्मस्थल के चढावे का एक तिहाई हिस्सा मिलता है। जम्मू कश्मीर में हिन्दुओं के विभिन्न मंदिरों का रखरखाव करने वाले धमार्थ न्यास की ज़िम्मेदारी संभालने वाले मट्टन के ब्राह्मण और अमृतसर के गिरि महंत जो कश्मीर में सिक्खों की सत्ता शुरू होने के समय से आज तक मुख्यतीर्थ यात्रा के अग्रणी के रूप में 'छड़ी मुबारक' ले जाते हैं, चढावे का शेष हिस्सा लेते हैं।

अमरनाथ तीर्थयात्रियों की ऐतिहासिकता का समर्थन करने वाले इतिहासकारों का कहना है कि कश्मीर घाटी पर विदेशी आक्रमणों और हिन्दुओं के वहां से चले जाने से उत्पन्न अशांति के कारण 14वीं शताब्दी के मध्य से लगभग तीन सौ वर्ष की अवधि के लिए यात्रा बाधित रही। कुछ इतिहासकारों का कहना है कि 1869 के ग्रीष्म काल में गुफा की फिर से खोज की गई और पवित्र गुफा की पहली औपचारिक तीर्थ यात्रा तीन साल बाद 1872 में आयोजित की गई थी। इस तीर्थयात्रा में मलिक भी साथ थे।





वर्तमान व्यवस्था -

मैंने सुन रखा है कि इस यात्रा की तैयारी एवं व्यवस्था अमरनाथ श्राईन बोर्ड करता है किंतु केवल मोबाईल कनेक्टिविटी सुविधा जो इस वर्ष ही प्रारंभ की गई है और केंद्रीय सरकार द्वारा प्रदत्त की गई है, को छोड़ दें तो श्राईनबोर्ड के द्वारा केवल दान के रूपयों को समेटने के अलावा कोई सुविधा नहीं दी जा रही है । श्रध्दालुओं के ठहरने की टैण्ट व्यवस्था स्थानीय व्यवसायी लोगों के द्वारा शुल्क लेकर की जा रही है । हजारों लोगों के लिए शौचालय की भी व्यवस्था ऐसी स्थिति है कि आपातकालीन स्थिति में अगर कोई आ जाये तो शर्मिंदा होने के अलावा कोई चारा नहीं है ।



लेकिन इन सब के इतर सबसे बड़ी खामी है सुरक्षा व्यवस्था । मेरे सहयात्री हेमंत नायडू और अजय डाँगे जिन्हे कई बार इस यात्रा का अनुभव है, ने बताया कि पहले पूरी सुरक्षा की कमान सेना और बीएसएफ के हाथों होती थी, जो सुरक्षा मानकों को पूरी गंभीरता से पालन करते हुए सेवाभाव की भी अनूठी मिसाल पेश करते थे किंतु इस बार राज्य सरकार ने जबरिया राजनीति कर इसे अपनी स्थानीय पुलिस के हवाले कर दिया है । जिससे कई संकरी जगहों पर घण्टों पदयात्रियों के जाम की स्थिति निर्मित हो जाती है । सेना केवल यात्रा के दौरान अपनी उपस्थिति का एहसास ही करा रही है और उनके उपस्थिति से ही यात्रा में मानसिक सम्बल प्राप्त होता है वरना अव्यवस्था की स्थिति भयावह होती । काफी हद तक श्रध्दालु स्व अनुशासित रहते हैं जिससे स्थिति तनावपूर्ण किंतु नियंत्रण में बनी रहती है लेकिन कभी कभी बर्फ के ग्लेशियर से बने पुल पर भी जाम की स्थिति बनती रहती है जिससे दबाव के कारण ग्लेशियर के टूटने पर सैकड़ों लोग पल भर में काल के ग्रास में समाहित हो सकते हैं । सेनापति ने बताया कि पिछले किसी यात्रा के दौरान उनके एक परिचित ने बीस फुट की दूरी से ही ऐसे एक ग्लेशियर पुल को टूटते देखा था जिसमें लगभग 200 लोग समाकर मारे गये ।



पहलगाम में चेक पोस्ट पर हमने अपना लगेज चैक करवाया लेकिन मेरे एक भारी सुटकेस को ड्रायवर ने ये कह कर गाड़ी में ही रखने को कहा कि मैं इसे पार करवाकर ले आऊँगा, बस आपसे कोई पूछे तो कह देना भारी है इसलिए गाड़ी में छोड दी और वह उसे बिना चेकिंग के पार करवाकर ले आया । मेरे नजरिये से तो यह सुविधा जनक था और उसमें कोई आपत्तिजनक सामग्री भी नहीं थी लेकिन सोचिए कोई इस तरह एक बड़ी अटैची में  कितना विस्फोटक पार कर सकता है ?

चंदनबाड़ी से पदयात्रा प्रारंभ करने की जाँच चौकी में श्राईन बोर्ड द्वारा जारी यात्रा पर्ची के एक हिस्से को फाड़कर रख लिया गया । उस पर्ची से ना तो मेरे चेहरे और जानकारी का मिलान किया गया न ही मेरे बैग की जाँच की गई । और उसके बाद पूरी यात्रा के दौरान कहीं पर भी किसी प्रकार की कोई जाँच नहीं की गई ।  इसका अर्थ यह है कि आप किसी की भी यात्रा पर्ची में प्रवेश कर यात्रा कर सकते हैं और कैसा भी सामग्री आसानी से यात्रा पर ले जा सकते हैं ।



पर्यावरण मित्र होने का दावा करने और नो प्लास्टिक जोन का बोर्ड लगाकर श्राईन बोर्ड स्वयं को महिमा मण्डित करने से नहीं चूक रहा किंतु रास्ते भर पालीथीन का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है और खुलेआम पान मसाले के गुटके के पाऊच, सिगरेट और पतली पालीथिन के डिस्पोजल रैनकोट भारी मात्रा में बिक रहे थे, जो यकीकन उपयोग उपरांत घाटी में प्रदुषण फैला रहे थे । गुफा के पहले संगम टॉप पर जहाँ श्रध्दालु स्नान आदि कर दर्शन को जाते हैं किसी प्रकार का कोई शौचालय नहीं है । लोग बर्फीले ग्लेशियर पर खुले में ही शौच करते हैं, मुझे नहीं पता महिलाओं को कितनी तकलीफ का सामना करना पड़ता होगा । गुफा से पहले भी दर्शनार्थ लगी लाईन का नियंत्रण स्वयं श्रध्दालु ही कर रहे थे और स्थानीय पुलिस दर्शक बनी हुई नजर आई । घोड़ों, टट्टुओं और पालकियों के दर इस पर निर्भर थे कि कौन किस दर्शनार्थी को कितना लूट सकता है।



यदि देश के विभिन्न हिस्सों विशेषकर पंजाब , हरियाणा गुजरात और राजस्थान के वणिक भक्तों के द्वारा जगह जगह पर खाने के भण्डारे नहीं लगाये जाते तो गरीब यात्री मौसम, आक्सीजन और अन्य वजहों से नहीं भूख से ही मर जाता । इन भण्डारों के भोजन की गुणवत्ता और उससे भी बढ़कर उनका आग्रह और सेवाभाव , मैने अपने पूरे जीवन काल में कहीं नहीं देखा । अद्भुत और अतुलनीय आग्रह .. “आईये ना भोले प्लीज” । तमाम असुविधाओं और तकलीफों के बावजूद यही आग्रह दिनों दिन यात्रा में श्रध्दालुओं की संख्या में उत्तरोत्तर वृध्दि कर रहा है और सच कहूँ तो मैं यदि दुबारा इस यात्रा में जाऊँगा तो इसका कारण बाबा बर्फानी के दर्शन से ज्यादा इन भण्डारो के सेवा और समर्पण भाव ही होगा । 

शनिवार, 21 जुलाई 2012

अमरनाथ यात्रा - भाग 1

बाबा बर्फानी कथा रहस्य




बाबा बर्फानी का प्रत्यक्ष आशीर्वाद एवं मेरा परम सौभाग्य कि इस वर्ष उनके दर्शन का अवसर मुझे प्राप्त हुआ । वास्तव में अमरनाथ यात्रा अपने नाम को चरितार्थ करती है “अमरत्व की यात्रा”  । 46 किमी की यह यात्रा व्यक्ति को स्वर्ग की अनूभूति कराती है । यदि आप उड़न खटोले (हैलीकाप्टर) से वहाँ पहुँचते हैं तो उसे मेरे अनुसार अमरनाथ यात्रा के स्थान पर अमरनाथ दर्शन कहना उचित होगा । स्वार्गिक अनुभूति के लिए बर्फीली पहाड़ियों में संकरे और खड़ी चढा‌ई वाले पगडंडियों पर पैदल यात्रा ही करना होगा । यद्यपि पथरीली , बर्फीली, संकरी, तीक्ष्ण चढ़ाई वाले इस रास्ते में एक ओर गहरी खाई है जिस पर कभी कभी मौत से केवल एक डगमगाते कदम का ही फासला होता है लेकिन फिर भी भक्तों का उत्साह और भोले के जयकारे से सारा भय ऐसे काफूर हो जाता है जैसे आदित्य के उदय से ओस की बूँदे ।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माता पार्वती ने एक बार बाबा श्री विश्वनाथ देवाधिदेव महादेव से शिकायती लहजे में प्रश्न किया कि आप तो अजर अमर है और मुझे ही हर जन्म के बाद नए स्वरुप में आकर पुन: वर्षो की कठोर तपस्या के बाद आपको प्राप्त करना होता है | जब मुझे आपको ही प्राप्त करना है तो बार बार मेरी इतनी कठोर परीक्षा क्यूँ ? आखिर आपके अजर अमर होने का रहस्य क्या है ? महाकाल ने पहले यह गूढ़ रहस्य बताना उचित नहीं समझा किंतु स्त्री हठ के आगे महादेव की भी न चली | अन्ततोगत्वा देवाधिदेव महादेव शिव ने माता पार्वती को अपनी साधना की अमर कथा कहने हेतु उपयुक्त एवं निर्जन स्थान की तलाश की एवं हिमालय की पहाड़ियों में एक गुफा में इसका महात्म्य एवं रहस्य बताया जिसे हम अमरत्व की कथा के रूप में जानते है । इसी परम पावन गुफा को हम अमरनाथ गुफा के रूप में प्रसिध्द हुआ |

पवित्र गुफा में बर्फ से प्राकृतिक शिवलिंग का निर्मित होना है। प्राकृतिक हिम से निर्मित होने के कारण इसे स्वयंभू हिमानी शिवलिंग भी कहते हैं। गुफा की परिधि लगभग डेढ़ सौ फुट है और इसमें ऊपर से बर्फ के पानी की बूँदें जगह-जगह टपकती रहती है। यहीं पर एक ऐसी जगह है, जिसमें टपकने वाली हिम बूंदों से लगभग बीस फुट लंबा शिवलिंग बनता है। चन्द्रमा के घटने-बढ़ने के साथ-साथ इसका आकार भी घटता-बढ़ता रहता है। श्रावण पूर्णिमा को यह अपने पूरे आकार में आ जाता है और अमावस्या तक धीरे-धीरे छोटा होता जाता है। आश्चर्य की बात यह है कि यह शिवलिंग ठोस बर्फ का बना होता है। जबकि गुफा में आमतौर पर कच्ची बर्फ ही होती है जो कि हाथ में लेते ही भुरभुरा जाए। मूल अमरनाथ शिवलिंग से कई फुट दूर गणेश, भैरव और पार्वती के वैसे ही अलग -अलग हिमखंड हैं। इस गुफा में बाबा बर्फानी के दिव्य दर्शन हेतु अमरनाथ यात्रा हिन्दी मास के आषाढ़ पूर्णिमा से श्रावण मास की पूर्णिमा तक होती है, जो अंग्रेजी माह जुलाई से अगस्त तक लगभग 45 दिन तक चलती है।



देवाधिदेव महादेव ने माता पार्वती से एकान्त व गुप्त स्थान पर अमर कथा सुनने को कहा ताकि इस अमर कथा को कोई भी जीव न सुन ले क्योंकि यदि कोई इसका श्रवण कर लेता वह अमर हो जाता। इस कारण भोलेनाथ ने माता पार्वती को लेकर गुप्त एवं निर्जन स्थान की ओर चल पड़े। सर्व प्रथम भगवान भोलेनाथ नें अपने शरीर पर लिपटे असंख्य नागों को एक स्थान पर छोड़ दिया जो अनंतनाग के नाम से जाना जाता है तत्पश्चात अपनी सवारी नन्दी को जिस स्थान पर छोड़ दिया उसे बैलगाम कहते थे जो कालांतर में पहलगाम के नाम से जाना जाने लगा, इसीलिए बाबा अमरनाथ की यात्रा अननंतनाग होते हुए पहलगाम से शुरू करने का तात्पर्य या बोध होता है। आगे चलने पर शिव जी ने अपनी जटाओं से चन्द्रमा को एक स्थान पर अलग कर दिया जो अब चन्द्रबाड़ी से अपभ्रंश होकर चंदनबाड़ी कहलाता है फिर कुछ दूर चलकर भोलेनाथ ने शरीर में लिपटे पिस्सुओं को एक पहाड़ी की चोटी पर तजा जनश्रुति के अनुसार वह स्थान ही पिस्सुटाप है । उपर्युक्त निर्जन स्थान की खोज में भोलेनाथ ने कुछ दूर जाकर कंठाभूषण शेषनाग को हिमाच्छादित पर्वतों से घिरे एक झील पर छोड़ दिया इस प्रकार इस पड़ाव का नाम शेषनाग पड़ा । यही झील लिद्दर नदी का उद्गम स्थल भी है । यात्रा के अगले पड़ाव में खड़ी चढ़ाई के पश्चात एक पहाड़ी के शीर्ष पर उन्होने अपने पुत्र गणेश को भी छोड़ दिया यह स्थान ही गणेश टॉप कहलाता है और उस पर्वत को महागुणास का पर्वत भी कहा जाता है। इस महागुणास दर्रे के पश्चात ढलान है जिसके बाद पंचतरणी का सुंदर स्थल आता है । जटा स्थित जीवनदायिनी पांचों तत्वों को समाहित की हुई गंगाजी को उन्होने इस स्थान पर छोड़ा इसकारण यह स्थल पंचतरणी कहलाया । पंचतरणी से खड़ी चढ़ाई के पश्चात संगम टॉप नामक स्थान आता है इसी स्थान पर बालटाल से आने वाला मार्ग भी मिलता है । इस बर्फीली चोटी से आपको यात्रा में पहली बार बाबा बर्फानी की पवित्र गुफा दृश्यमान होती है। इसके बाद भगवान भोलेनाथ माता पार्वती के साथ एक गुप्त गुफा में प्रवेश कर गये। यही वह गुफा है जहाँ भोलेनाथ पवित्र बाबा बर्फानी के रूप में अपने दिव्यदर्शन देते हैं । कोई व्यक्ति, पशु या पक्षी गुफा के अंदर प्रवेश कर अमर कथा को न सुन सके इसलिए शिव जी ने अपने चमत्कार से गुफा के चारों ओर आग प्रज्जवलित कर दी। फिर शिव जी ने जीवन की अमर कथा मां पार्वती को सुनाना शुरू किया। कथा सुनते-सुनते देवी पार्वती को नींद आ गई और वह सो गईं जिसका शिव जी को पता नहीं चला. भगवन शिव अमर होने की कथा सुनाते रहे | इस समय दो सफेद कबूतर श्री शिव जी से कथा सुन रहे थे और बीच-बीच में गूटर-गूं की आवाज निकाल रहे थे. शिव जी को लग रहा था कि माँ पार्वती कथा सुन रही हैं और बीच-बीच में हुंकार भर रहीं हैं. इस तरह दोनों कबूतरों ने अमर होने की पूरी कथा सुन ली |

कथा समाप्त होने पर भोलेनाथ का ध्यान माता पार्वती की ओर गया जो सो रही थीं | शिव जी ने सोचा कि पार्वती सो रही हैं तब इसे सुन कौन रहा था | तब महादेव की दृष्टि इन कबूतरों पर पड़ी ।  महादेव कबूतरों पर क्रोधित हुए और उन्हें मारने के लिए तत्पर हुए | इस पर कबूतरों ने कहा - हे प्रभु हमने आपसे अमर होने की कथा सुनी है यदि आप हमें मार देंगे तो अमर होने की यह कथा झूठी हो जाएगी | इस पर शिव जी ने कबूतरों को जीवित छोड़ दिया और उन्हें आशीर्वाद दिया कि तुम सदैव इस स्थान पर शिव पार्वती के प्रतीक चिन्ह के रूप निवास करोगे |



अत: यह कबूतर का जोड़ा अजर अमर हो गया। माना जाता है कि आज भी इन दोनों कबूतरों का दर्शन भक्तों को यहां प्राप्त होता है | और इस तरह से यह गुफा अमर कथा की साक्षी हो गई व इसका नाम अमरनाथ गुफा पड़ा। जहां गुफा के अंदर भगवान शंकर बर्फ के प्रकृति द्वारा निर्मित शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं। पवित्र गुफा में मां पार्वती के अलावा गणेश के भी अलग से बर्फ से निर्मित प्रतिरूपों के भी दर्शन करे जा सकते हैं।
इस पवित्र गुफा की खोज के बारे में पुराणों में भी एक कथा प्रचलित है कि एक बार एक गड़रिये को एक साधू मिला, जिसने उस गड़रिये को कोयले से भरी एक बोरी दी। जिसे गड़रिया अपने कन्धे पर लाद कर अपने घर को चल दिया। घर जाकर उसने बोरी खोली। वह आश्चर्यचकित हुआ, क्योंकि कोयले की बोरी अब सोने के सिक्कों की हो चुकी थी। इसके बाद वह गड़रिया साधू से मिलने व धन्यवाद देने के लिए उसी स्थान पर गया, जहां पर वह साधू से मिला था। परंतु वहां पर उसे साधू नहीं मिला, बल्कि उसे ठीक उसी जगह एक गुफा दिखाई दी। गड़रिया जैसे ही उस गुफा के अंदर गया तो उसने वहां पर देखा कि भगवान भोले शंकर बर्फ के बने शिवलिंग के आकार में स्थापित थे। उसने वापस आकर सबको यह कहानी बताई और इस तरह भोले बाबा की पवित्र अमरनाथ गुफा की खोज हुई । ये गुफा लगभग 5,000 साल पुरानी है और समुद्रतल से 13,600 फुट की ऊँचाई पर स्थित है। इस गुफा की लंबाई (भीतर की ओर गहराई)19 मीटर और चौड़ाई 16 मीटर है। गुफा 11 मीटर ऊँची है।

सोमवार, 16 जुलाई 2012

नजरिया ये भी ..


यूँ तो मैं व्यक्तिगत रूप से हिंदू धर्म को छोड़कर किसी अन्य धर्म विशेष पर कभी कोई टिप्पणी नहीं करता और हिंदू धर्म पर इसलिए करता हूँ क्योंकि मैं स्वयं को हिंदु मानता हूँ और अपने धर्म पर टिप्पणी करने का सभी को नैतिक हक है । किंतु कल डॉक्टर सुब्रह्मणियम स्वामी का इंटरव्ह्यू देख रहा था। उन्होने मस्जिदों और मंदिरों के संदर्भ में बड़ी गँभीर बात कही । जो वास्तव में विचारणीय है । जो बंधु उस वक्तव्य को ना सुन पाये हों या सुन कर भी ध्यान ना दिया हो उनके लिए पुन: इस विचारणीय तथ्य को संज्ञानार्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ ।   


अरब देश मुस्लिम धर्म को मानने वाले इस विश्व के सबसे सर्वोत्तम देशों में माने जाते हैं किंतु संयुक्त अरब अमीरात में एक सड़क बनाने में व्यवधान उत्पन्न कर रहे मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया । कहा जाता है कि इस मस्जिद में कभी हजरत मोहम्मद ने भी नमाज पढ़ा था । इतनी महत्वपूर्ण मस्जिद होने के बावजूद भी उसे केवल एक सड़क बनाने के नाम पर ध्वस्त कर दिया गया । जाहिर है लोगों की आस्था को भी चोट पहुँची होगी और लोगों ने विरोध भी किया होगा लेकिन वहाँ की अथॉरिटी ने ऐसा तर्क दिया जिसका किसी मुसलमान के पास कोई जवाब नहीं था और कोई भी मुसलमान इस तर्क से असहमत भी नहीं हो सकता ।

तर्क था – मस्जिद केवल नमाज अदा करने की जगह है
, एक व्यवस्था है जहाँ लोग इकठ्ठे होकर खुदा का सजदा कर सकें । उस स्थल या भवन का कोई धर्मिक महत्व नहीं हैं । यदि मस्जिदों के स्थानों और भवनों पर आस्था रखी जायेगी तो यह गैर इस्लामिक चरित्र होगा क्योंकि कुरान में बुतपरस्ती गुनाह है । इसलिए मस्जिदों को केवल नमाज पढ़ने के स्थान के रूप में ही देखना चाहिए ना कि धार्मिक आस्था के केंद्र के रूप में ।
 

इस तर्क को बाबरी मस्जिद के परिपेक्ष्य में भी देखा जाना चाहिए । बाबरी मस्जिद में कई वर्षों से कोई नमाज अदा नहीं की गई । इसका सीधा अर्थ यह है कि यह भवन अब मस्जिद नहीं है केवल एक खण्डहर भवन मात्र है । इसके गिराये जाने अथवा गिरने से धार्मिक कुठाराघात या मानवता पर शर्म जैसी कोई बात नहीं होनी चाहिए । देश में हजारों ऐसे खण्डहर और पुराने भवन रोज गिराये जाते हैं ।
 

जहाँ तक मंदिरों के भवनों के प्रति भी ऐसी ही भावना रखने के संदर्भ में जब स्वामी से पूछा गया तो उन्होने कहा कि मंदिरों की बात अलग है । उनमें भगवान के मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा की जाती है सो ऐसे मंदिरों को तोड़ा जाना धार्मिक भावनाओं पर कुठाराघात और नैतिक रूप से गलत है । लेकिन उन्होने साथ में ये भी कहा कि ऐसे मंदिर जो कुकुरमुत्ते की तरह सड़कों के किनारे या यहाँ वहाँ व्यक्तिगत लाभ हेतु या जमीन पर कब्जा बनाने के उद्देश्य से बनाये गये हों उन्हे अवश्य ही तोड़ा जाना चाहिए । ये भवन मंदिर नहीं अतिक्रमण हैं ।
 

ये बातें कई लोगों को उन्माद से भर सकती हैं । कई हिंदुवादी लोग इस पर ढोल-नगाड़ा पीट कर जश्न मना सकते हैं और कई कट्टर मुस्लिम चरमपंथी इस पर गाली गलौज के स्तर पर भी जा सकते हैं । इन दोनो श्रेणी के लोगों का मानवता से कोई लेना देना नहीं होता सो मुझे इसकी फिक्र नहीं लेकिन तीसरी श्रेणी के लोग जो धर्मनिरपेक्ष की श्रेणी में खुद को रखकर महान मानवतावादी होने का दावा करते हैं , उनकी प्रतिक्रियाओं का मुझे बेसब्री से इंतजार है ।
उनकी प्रतिक्रिया ही तय करेगी कि वे वास्तव में सेकुलर हैं या शेखुलर ।

मंगलवार, 26 जून 2012

फुरसतनामा: बापू मल त्याग केंद्र - एक मनुवादी सोच

फुरसतनामा: बापू मल त्याग केंद्र - एक मनुवादी सोच: बापू ने स्वच्छता के साथ स्वालम्बन का भी सपना देखा था इसलिए “ईटाईलेट”को देश की जनता पर थोपने के बजाय सभी लोगों को अपनी सुविधानुसार मल त्याग करने का अधिकार मिलना चाहिए और ये सुनिश्चित होना चाहिए कि किसी का भी मल देश पर बोझ ना बने और मल से बनने वाले खाद का लाभ सर्वजन हित में बराबर वितरित हो । इस देश में गरीबों का भी बराबर का हक है । देश के सभी संसाधनों पर उनका भी बराबर का अधिकार होना चाहिए इसलिए उन्हे अपने स्व निर्मित जैविक खाद के उपयोग करने का अधिकार मिलना ही चाहिए और इस हेतु वे किस प्रकार के मलत्याग केंद्र बनायें इसका भी उन्हे ही निर्णय करने का अधिकार होना चाहिए, तभी सही मायनो में बापू के सपने पूरे होंगे वरना शौचालय में लगे बापू के नाम की तख्ती से केवल सड़ांध ही आयेगी स्वराज नहीं ।

बापू मल त्याग केंद्र - एक मनुवादी सोच


ग्रामीण नरेश जयरामजीकी ने करोडो रूपये के अनुसंधान के बाद निर्मित पर्यावरण हितैषी मलत्याग केंद्र “ईटाईलेट” को लांच करते समय अपनी गाँधीवादी विचारधारा को उत्सर्जित करने का मोह त्याग नहीं पाये और कह डाला कि देश के लिए मल त्याग केंद्र अग्नि मिसाइल छोड़ने से ज्यादा जरूरी हैं। देश में साफ-सफाई की समस्या दूर नहीं की जाती तो अग्नि मिसाइल दागते रहने का कोई अर्थ नहीं है। इसलिए रक्षा बजट के बराबर इसका भी बजट रखा जाय और पर्यावरण मित्र मलत्याग केंद्र का नाम “बापू” रखा जाय । वो तो गनीमत है कि उन्होने ये नहीं कहा कि आईपीएल मे भी काफी रकम खर्च होती है इसलिए उसका भी नाम बीपीएल अर्थात बापू प्रीमियम लीग रखा जाय । चेला भोलाशंकर ने बताया कि सोच तो वो इसके लिए भी रहे थे लेकिन हमारे देश में बीपीएल का खेल पहले से ही चालू है और इसे खेलने का नैतिक अधिकार सिर्फ गाँधीवादियों के पास है इसलिए देश हित में विचार त्याग दिया । 



खैर मेरे मित्र उँगलबाज को जैसे ही पता चला कि मैं उसके शहर में ही हूँ, आदतन उँगली करने चला आया । बोला- जयरामजी की महाराज , ई बापू मलत्याग केंद्र वाला क्या मामला है ? कल राम नरेश ने कहा कि गाँधी जी भी इसके पक्षधर थे । मैंने कहा देखो उँगलबाज, राम नरेश जी का गोरा चौड़ा माथा है और सफेद बाल भी हमेशा खड़े रहते हैं इसका सीधा और साफ अर्थ ये है कि वे बुध्दिजीवी और चिंतनशील व्यक्ति है।  ये मामला जितना सीधा दिखता है उतना है नहीं । मैं पहले तो ये बता दूँ कि गाँधी जी सामाजिक समरसता के पुजारी थे, सो वे सपने में भी मल त्याग केंद्र का समर्थन नहीं कर सकते । हाँ ये बात अलग है कि चूँकि मल त्याग केंद्र निर्माण में भारी रकम खर्च होगी इसलिए परम्परा का पालन करते हुए इसका नामकरण बापू के नाम पर करना चाहिए लेकिन अगर बापू जिंदा होते तो मेरी तरह ही इसका घोर विरोध करते । हालांकि नैतिक रूप से देखा जाय तो ये गाँधीवादी नेता बापू के नाम पर देश का खा-खा कर इतना मल त्याग चुके हैं कि अब नाम ना भी दें तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता ।



लेकिन उँगलबाज ये मामला राजनैतिक से ज्यादा सामाजिक महत्व का है । सर्वप्रथम तो ये कि मल त्याग केंद्र व्यक्ति को नैसर्गिक जीवन जीने में बाधा उत्पन्न करती है । हरी हरी दूब घास पर स्वच्छंद और मुक्त वातावरण में मल त्याग करने वाले ग्रामीण जनजीवन को नष्ट करने की गहरी चाल है और जैविक स्वदेशी खाद को एक जगह इकठ्ठा करने की बहुराष्ट्रीय पूँजीवादी साजिश । सोचो अगर ये मल एक स्थान पर एकत्रित होने की जगह खुले मैदान में सीधे त्यागे जाते तो उससे जो स्वदेशी खाद निर्माण होता वह समान रूप से सार्वजनिक हित में झाड़ियों में बिना किसी भेदभाव से फैल जाता और उससे पोषित होकर झाड़ियाँ हरे-भरे वृक्ष मे रूपांतरित होकर ऑक्सीजन देते जो हर, अमीर-गरीब को बिना किसी भेदभाव से उपलब्ध होता । मल त्याग केंद्र बनने से ये सारे मल एक ही जगह इकठ्ठे होंगे और जब ये मल स्वदेशी खाद में बदल जायेगा तो फिर पूँजीवादी सरकार इसे सफाई के नाम से इकठ्ठी कर इस बेशकीमती जैविक खाद को कोल ब्लाक, 2 जी स्पेक्ट्रम और गैस बेसिन के जैसे ही किसी पूँजीपति उद्योगपति को उसके फार्म हाऊस के लिए कौड़ियों के मोल बेच देगी । फिर वो उद्योगपति गरीबों के ही खाद से पौधे को पोषित कर ऑक्सीजन का निर्माण कर मनमाने दाम पर उसे बेचेगा ।  जिससे गरीब अपने हिस्से के ही नैसर्गिक ऑक्सीजन से वंचित होकर उसे खरीदने को मजबूर हो जायेगा ।



लेकिन सबसे गहरी और विचारणीय बात तो ये हैं कि ये मल त्याग केंद्र शत प्रतिशत सवर्ण मानसिकता का परिचायक है और आज जो सामाजिक असमानता की खाई है इसका मूल जड़ ये मल त्याग केंद्र ही है ।  ये कोई छोटी बात नही है, बड़े बड़े आलीशान महलों में निर्मित सर्वसुविधायुक्त मलत्याग केंद्रों में चैन से मल त्याग करने की मनुवादी सामंती इच्छा ने ही मैला ढोने वाले दलित पैदा किये। मनुवादी सोच के पूँजीवादी सवर्ण अगर अपने कोठियों में बने वातानूकूलित मल त्याग केंद्र मे मल त्याग करने की राजसी प्रवृत्ती त्याग देते तो आज बहन मायावती की मूर्तियाँ किसी खेत मे लोटा लेकर बैठी होती और पासवान सवर्ण स्त्री के साथ दूसरी शादी कर मस्ती में जीने के बजाय अपनी पहली दलित पत्नी के साथ गृहस्थ होते । जब दलित ही न होता, छुआछूत ही न होती तो ना तो भारत कमजोर होता ना ही मनुवादी सोचवाले दलित नेता पैदा होते । ये मल त्याग करना गहन राष्ट्रीय शोध का विषय है । आश्चर्य की बात है कि मोहनजोदड़ो की खुदाई की सारी बाते सामने आयी पर वहाँ स्नानागार तो मिलते हैं लेकिन मलत्याग केंद्र का कोई उल्लेख नही मिलता । उस समय लोग इन सब मनुवादी प्रवुत्तियो से उपर थे और समाज में समरसता थी ।



दरअसल जिसे हम सभ्यता का विकास कहते हैं वो मूल रूप से मल त्याग करने की विभिन्न विधाओं का विकास है । ज्यूँ ज्यूँ मल त्यागने की भिन्न भिन्न नवीन आधुनिक सुविधाओं का विकास हुआ समाज में असमानता की खाई बढ़ने लगी । क्या अगड़ी जाति और क्या पिछड़ी जाति सभी पूँजीवादी सामंती लोग, जिसे भी मौका मिला वो अपनी सुविधानुसार मलत्याग केंद्र का निर्माण कर मल त्यागने लगे और धीरे धीरे वो सारा मल एक जगह इकठ्ठा होकर देश की आम गरीब जनता के उपर मँहगाई और भुखमरी के रूप में परिवर्तित हो गया है । अब अपने मोंटू चाचा को ही देख लो, पैंतीस लाख के मल त्याग केंद्र में बैठकर गरीबों और पिछड़े लोगों को अमीर बनाने के लिए योजना बनाता है और जादू की छड़ी घुमाकर रातों रात सभी को 32 रू वाला अमीर बना देता है ।



इसलिए सर्वप्रथम तो ये मनुवादी सवर्ण मानसिकता वाले मल त्याग केंद्र बनाने की पूँजीवादी सोच का सभी को संगठित होकर विरोध प्रदर्शन करना चाहिए । बापू ने स्वच्छता के साथ स्वालम्बन का भी सपना देखा था इसलिए “ईटाईलेट” को देश की जनता पर थोपने के बजाय सभी लोगों को अपनी सुविधानुसार मल त्याग करने का अधिकार मिलना चाहिए और ये सुनिश्चित होना चाहिए कि किसी का भी मल देश पर बोझ ना बने और मल से बनने वाले खाद का लाभ सर्वजन हित में बराबर वितरित हो । इस देश में गरीबों का भी बराबर का हक है ।  देश के सभी संसाधनों पर उनका भी बराबर का अधिकार होना चाहिए इसलिए उन्हे अपने स्व निर्मित जैविक खाद के उपयोग करने का अधिकार मिलना ही चाहिए और इस हेतु वे किस प्रकार के मलत्याग केंद्र बनायें इसका भी उन्हे ही निर्णय करने का अधिकार होना चाहिए, तभी सही मायनो में बापू के सपने पूरे होंगे वरना शौचालय में लगे बापू के नाम की तख्ती से केवल सड़ांध ही आयेगी स्वराज नहीं ।

शनिवार, 16 जून 2012

कौन बनेगा राष्ट्रपति




नमस्कार मित्रों ,
स्वागत है आपका देश के इस अद्भुत राजनैतिक खेल में जिसका नाम है “कौन बनेगा राष्ट्रपति” । इस खेल के नियम आपको पता है । जैसा कि लिखा हुआ है राष्ट्रपति का चुनाव कैसे होगा और कौन उन्हे चुनेगा लेकिन दुनिया के सभी निर्माण नियमों के अनुसार सदैव महल का निर्माण मजदूर ही करते हैं लेकिन महल की असली मालकिन कोई और होती है । साथ ही उस महल में कौन निवास करेगा ये मकान की मालकिन ही निर्णय करती है । 


फिर भी देश के मनोरंजन के लिए इस बार बंधुआ मजदूरों का अकाल पड़ने के कारण पड़ोसी ठेकेदारों से मजदूर सप्लाई का आग्रह किया जा रहा है । पड़ोसी ठेकेदार भी मौके की नजाकत देखते हुए अपने मुताबिक निर्माण शर्ते ठोंक रहे हैं । इसी कारण इस अद्भुत खेल का आयोजन हो रहा है ।

तो आईये खेल को देते हैं गति और चालू करते हैं - कौन बनेगा राष्ट्रपति ? 

फास्टेस्ट फिंगर फर्स्ट के लिए ये रहा आपका सवाल .. इस देश में गधे क्या खाते हैं ? और आपका समय शुरू होता है अब .... और सबसे पहले बजर दबाया है आलू परसाद ने ..  

हाँ तो आलू परसाद जी बताईये आपका जवाब क्या है ? 

आलू परसाद – चुप बुड़बक , हम नहीं पहिले तुम बताओ कि गधा दू पाया है के चार पाया | 

 अरे लालू जी आप जो भी समझ ले 

आलू परसाद – साला आजकल चार पाया को खाने को कहाँ मिलता है पूरा चारा तो दू पाया गधा ही खा जाता है । 

ओह अच्छा तो आपका मतलब इस देश में गधे चारा खाते हैं । 

आलू परसाद – अऊर का, हमरा को फुल एक्सीपिरिएंस है । 

 तो आईये हॉट सीट पर आपका स्वागत है .. देवियों और सज्जनो थप्पड़ों से माफ कीजीएगा तालियों से स्वागत करें आलू परसाद जी का ..

आलू परसाद – हट बुड़बक .. हम अपना कुर्सी नहीं छोड़ूँगा अगर सीट को हाटे बनाना है तो इही सीट के नीचे अलाव जलाओ । 

चलिए कोई बात नहीं आलू परसाद जी आप वहीं से बैठे बैठे बतायें कि कौन बनेगा राष्ट्रपति ।  

अरे अऊर कौन बनेगा ? परधान मम्मी जिसे बोलेंगी उही बनेगा । सुनो तुमका हम अंदर का बात बताता हूँ देखो साढ़े पाँच लाख में हमरा पास दस गो हजार है तो रजनीती इही कोहती है कि बिटवा ज्यादे चुपुड़ चुपुड़ मत करो अऊर परधान मम्मी के पल्लू से चिपक कर मजा करो । 

एक गो बात अऊर सुनो एनाउंसर बाबू । ई राम बिलवा कोचवान अगर बजर दबाये तो उका मत पूछना । साला हमरा ही आंसर का कापी पेस्ट जबाब देगा सो बजरे बंद कर दो । 

चलिए आलू परसाद जी ने तो सही जवाब नहीं दिया इसलिए फिर से खेल को देते हैं गति और चालू करते हैं कौन बनेगा राष्ट्रपति । फिर से फास्टेट फिंगर के लिए आपका प्रश्न है - -  
गरीबों का सबसे बड़ा मसीहा कौन है ? 

 इस बार कोलावरी दीदी मेरा मतलब है निर्ममता दीदी ने सबसे पहले बजर दबाया । हाँ तो अपना उत्तर बताईये निर्ममता दीदी ।  

निर्ममता दीदी - होम है, औऊर कोन हो सोकता हे । देखो हमरा हालत कितना सादगी के साथ रहता हे होम । रात दिन गोरीबों के लिए पेकेज पेकेज चिल्ला चिल्लाकर सोन्घोर्ष कर रहा हूँ । औऊर सुनो इ फालतू का खेला बोंद कोरो । होम जो बोलेगा उही होगा । होम लास्ट मोमेंट तक कोलाम के लिए सोन्घोर्ष कोरेगा । येदि मोनमोहोन होमको स्पेशल पेकेज देगा तो होम पोलोट कोर दादा को भी भोट कोर सोकता है , देयर ईज नो प्रोब्लोम । आमोर साथ मुल्ला यम स्विंग साहब भी हे । यकीन नोई आता तो पूछ लो उ होमरा सिनियर है, क्यूँ दादा .. 

मुल्ला यम स्विंग - हम कोई ऐरे गेरे नहीं है एयर कण्डीशन धोती पहनते हैं और हम क्यूँ बतायें हमसे तो किसी ने पूछा ही नहीं । 


टन्न्न्नन्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न


ओह मॉफ कीजीये समय समाप्त होने का घण्टा बज गया और किसी ने भी सही जवाब नहीं दिया और अच्छा भी हुआ साला पैसा बच गया क्योंकि इस बार के एपिसोड में टीआरपी भी नहीं था । 

इतने में दर्शक दीर्घा से कुछ युवा बिगरैड़ी लोग चिल्लाये – बबलू भैय्या से पूछे बिना ये कार्यक्रम खतम नहीं होने देंगे । बबलू भैय्या जिंदाबाद । एनाऊंसर ने कहा भाईयों कार्यक्रम खतम हो चुका है लेकिन इतने में एपिसोड के डायरेक्टर ने इशारा किया साले इस कार्यक्रम का प्रायोजक वही है एडजस्ट कर उससे भी पूछ ले ।

एनाऊंसर ने फिर पलट कर माईक में चिल्लाया – कार्यक्रम में अंत में हमारे एक्सपर्ट बबलू भैय्या से पूछते हैं कि कौन बनेगा राष्ट्रपति ?

बबलू भैय्या ने अचानक चौंककर कहा .. कौन बनेगा ! हमारे परिवार की कई पीढ़ियों ने इस देश को खून दिया है तो उन्ही की परम्परा में से ही कोई बनेगा लेकिन मैं किसी पद की दौड़ में नहीं हूँ । मैं केवल देश की सेवा करना चाहता हूँ । पहले मैं किसी का पति बन जाऊँ फिर इस बारे में सोचूँगा । इतने बड़े राष्ट्र का पति होने से पहले काफी अनुभव की आवश्यकता है । 

चलते चलते --- देश के एक अच्छे और जिम्मेदार नागरिक होने के नाते मुझे व्यक्तिगत रूप से इस बात की खुशी है कि चाहे प्रणव दा बने या कलाम साहब दोनो ही योग्य और अनुभवी हैं और ये राष्ट्रपति की कुर्सी पर बोझ बढ़ाने के बजाय इनके पदासीन होने से पद की गरिमा ही बढ़ेगी इतना तो यकीन है | !! जय हो शुभ हो !!

शनिवार, 2 जून 2012

सच का सामना

दोस्तों, देश के सबसे मशहूर शो “सच का सामना” में आज आपकी मुलाकात एक ऐसे व्यक्ति से करायेंगे जो पैसों के लिए नहीं केवल शोहरत बटोरने आईं है । पेशे से जल बचाओ आंदोलन के अंतराष्ट्रीय ख्यातिलब्ध मोमबत्ती ब्रिग्रेडी अग्निप्रज्वलकर्ता आदरणीया “ मेरिण्डा फटीचादर” आज सच का सामना के तीखे प्रश्नो का जवाब देंगी और इनकी इज्जत बच गई तो इसकी फुटेज अमेरिका भेजकर चंदा बटोरेंगी । अगर आपका दिल करता है तो स्वागत करें बाबा मेरिण्डा ताई जी का ..  नहीं  करता तो ना करें । ताई ने पहले से ही स्वागत के लिए अपने चमचों को बुला रखा है । 

तो मेरिण्डा ताई जी आपने अपना पूरा जीवन जल बचाओ आंदोलन में लगा दिया है । आपके सुनहरे बाल बिखरे हुए जरूर हैं लेकिन शरीर बिल्कुल स्वच्छ है और भीनी भीनी खूशबू भी आ रही है ।

महाराज का पहला सवाल आपसे है => क्या आपने कभी नग्न अवस्था में स्नान किया है ?

मेरिण्डा =>  नहीं 

आईये देखते हैं पालीग्रफिक मशीन क्या कहती है .. 

कम्प्यूटर =>   ये जवाब ...........................  बिल्कुल सही है

आप ये कैसे कर लेतीं हैं ... मतलब पूरे कपड़े पहन कर कैसे नहा लेतीं हैं ??

मेरिण्डा ताई =>  चिंतन से ! किताबों से नहाने की विधि पढ़कर मन में ये भाव उत्पन्न कर लेतीं हूँ कि अथाह जल में डुबकी लगा रही हूँ ।  इस तरह से स्नान की अनुभुति हो जाती है और जल का दुरूपयोग भी नहीं होता । मैं जल के दुरूपयोग की सख्त मुखालफत करती हूँ ।

महाराज => मतलब क्या आप शौच हेतु भी जल का प्रयोग नहीं करती ?

मेरिण्डा ताई => नहीं मैंने आपको कहा ना जल का  किसी भी रूप में अपव्यय समाज और पर्यावरण के लिए हानिकारक है । हमारे आंदोलन से जुड़े कुछ विदेशी भाई बहन भी हैं जो हमें इस कार्य हेतु  विशेष प्रकार के कागज भेजते हैं ।

महाराज => फिर तो आप गर्मी में कूलर का भी उपयोग नहीं करती होंगी ?

मिरिण्डा ताई => बिल्कुल नहीं ऐसा कोई भी कार्य जो जिसमें जल का उपयोग होता है उसका हम विरोध करतें  हैं । नैसर्गिक जल पर समाज के निचले तबके का अधिकार होना चाहिए अत: इसका उपयोग किसी भी स्थिति में उच्च वर्ग के लोगों के लिए प्रतिबंधित होना चाहिए । इसिलिए हम पीने का पानी भी बोतल वाला पीते हैं , हैण्डपंप या कुँये का नहीं ।

महाराज =>  तो आप अपने पसीने और मैल की बदबू से कैसे निजात पाते हैं ?  

मिरिण्डा ताई => हम हमेशा वातानूकूलित कक्ष में रहते हैं सो पसीने का सवाल ही नहीं ।  हाँ गरीबों पर चिंतन करते करते कभी कभी आन्दोलन आदि के लिए झोपड़पट्टी की तरफ फोटो खिचाने जाते हैं तो वापसी पर स्टीमबाथ लेकर परफ्यूम स्प्रे करते हैं लेकिन जल का उपयोग नहीं करते क्योंकि जल संरक्षण हमारे जीवन का मुख्य लक्ष्य है ।

महाराज =>  आप कपड़े धोने के लिए तो पानी का इस्तेमाल करती ही होंगी ?

मिरिण्डा ताई => नहीं इसका तो सवाल ही नहीं उठता, हमारे सारे कपड़े ड्राईक्लीन होते हैं।

इससे पहले की महाराज मिरिण्डा ताई से और सच उगलवाते उनके बोतल में मिलाये गये अफीम का नशा उतर गया और तमरमाती हुई बोलीं सुनो महाराज अगर धोखे से भी इस एपिसोड का प्रसारण हुआ तो सारे बाँध बचाओ आंदोलन की दिशा तुम्हारी तरफ मोड़ दूँगी । तुम्हारे इस एक एपिसोड से मेरे जीवनभर की  मेहनत खराब हो जायेगी । हाँ अगर कुछ चंदा पानी या एवार्ड की  चाहत है तो बताओ उसका जुगाड़  करवा दूँगी लेकिन ये एपिसोड किसी भी स्थिति में टेलिकॉस्ट नहीं होना चाहिए ।

हमने कहा सुनो ताई ये धमकी और लालच किसी और को देना । नंगा नहायेगा क्या और निचोड़ेगा क्या ? हमारे पास है ही क्या जो तुम बिगाड़ लोगी ? रही बात तुम्हारे चरित्र की तो अब धीरे धीरे सारी दुनिया में तुम्हारे जैसे जयचंदों की तस्वीर साफ होते जा रही है लेकिन अफसोस तो ये है कि तुम्हारी प्रजाति भी बेशरम के पौधे की तरह है एक के जड़ जमने की देर है पूरी बस्ती ही बसा लेते हो ।

सोमवार, 28 मई 2012

फुरसतनामा: तेल का खेल मतलब केएलपीडी

फुरसतनामा: तेल का खेल मतलब केएलपीडी: इन दिनों नौतपा ने तपा कर रखा हुआ है और तेल ने अलग से आग सुलगाई हुई है। ऐसे में किसी असरदार व्यक्ति से राहत की उम्मीद करना और वो भी...

तेल का खेल मतलब केएलपीडी

इन दिनों नौतपा ने तपा कर रखा हुआ है और तेल ने अलग से आग सुलगाई हुई है। ऐसे में किसी असरदार व्यक्ति से राहत की उम्मीद करना और वो भी दोपहर के बारह बजे ठीक वैसा ही है जैसे शाहरूख की बात मानकर मर्दों वाली क्रीम लगाकर गोरा होना ।  सारे शरीर से जल की निकासी हो रही है और जहाँ से नहीं हो रही वहाँ से तेल निकल रहा है । ए.सी.के कम्प्रेसर ने भी दम तोड़ दिया तो नये कम्प्रेसर की स्थापना की गई लेकिन उसने भी बेवफा की तरह अपनी ताम्र नसों से तेल लिकेज कर आत्महत्या कर ली |
ऐसा मैं अपने पुराने ए.सी.इंजीनियर के उस बयान के आधार पर कह रहा हूँ जिसने कम्प्रेसर चेक करने के बाद बताया की ये खराब हो गया है । मैने पूछा ये तुम्हे कैसे मालूम हुआ तो उसने कहा देखिए इसका तेल निकल गया है । अब पुन: शिकायत दर्ज की है कम्पनी का मेसेज आया है कि कोई विरेंद्र नामक इंजीनियर टाईप चिकित्सक आयेगा और कम्प्रेससर ट्रांसप्लांट कर मुझे और ए.सी. दोनो को नवजीवन प्रदान करेगा। कुल मिलाकर ए.सी. ने मेरी ऐसी की तैसी कर रखा है ।
खैर ये तो हुई अंदर की बात और इसलिए लिखी कि भाई साहब अब हमें भी पता चल गया है कि बिना ए.सी. की सुविधा के कोई भी बुध्दजीवी “तोड़ती पत्थर” टाईप की रचना लिख नहीं पाता है । है कोई माई का लाल जो नाले का पानी पीकर “मधुशाला” लिखकर दिखाये ।
अरे तेल से याद आया कल एक परजीवी जिसे आम बोलचाल में बुध्दजीवी कहा जाता है मुझे तेल का गणित समझाने का प्रयास कर रहे थे । ठीक वैसे ही जैसे हरिया दूधवाला अपनी भैंस को दुहने के पहले पुचकारता है । कहा देखो महाराज तेल का 80 प्रतिशत हम आयात करते हैं तो इसकी कीमत अंतराष्ट्रीय बाजार पर निर्भर करती है । हमने कहा ठीक है भाई ये बात तो पहले कई बार पिंचुदादा भी बता चुके हैं इसमें नया क्या है । सवाल हमारा ये है कि क्या अभी अंतराष्ट्रीय बाजार में तेल का दाम बढ़ा है क्या ?  उन्होने कहा नहीं तो हमने दूसरा बाल फेंका तो फिर तेल का भाव क्यों बढ़ाया ?
उनके चेहरे के भाव देखकर हम समझ गये कि ये हमसे आज शास्त्रार्थ करेगा नहीं और इसे बिना कुछ खिलाये पिलाये हमारी बातों का जवाब देगा नहीं । तेल की कीमतों से जो हमारा तेल निकल रहा है उसका गुस्सा किसी पर तो निकालना ही था सो हमने ये सोचकर उसे जलपान का आमंत्रण दिया कि चलो साईकिल चला कर दो लीटर पेट्रोल कम डलवा लेंगे लेकिन अपनी भड़ास निकालेंगे जरूर ।    
आगे से हम सभी परजीवी बुध्दजीवीयों को “मामू” कहकर सम्बोधित करेंगे आपको ये सनद रहे कन्फ्यूजियाईगा नहीं ।
मामू ने कचौड़ी को कलमाड़ी की तरह कामनवेल्थ समझकर अपने गोदाम में पहुँचाया और कनिमोझी की तरह मुस्कुराकर कहा देखो महाराज तेल हम डॉलर में खरीदते हैं और रूपिया का भाव गिर गया है सो डॉलर मँहगा हो गया इसलिए हमको तेल रूपिया में मँहगा पड़ रहा है ।  हम कहा चलो ठीक है लेकिन केरोसीन, एलपीजी और डीजल के लिए रूपिया नहीं गिरा क्या या ये सब हम अपनी बाड़ी में ही पैदा करते हैं ?  
मामू ने सिर पकड़ा और कहा अरे यार महाराज आप तो निपट गँवार हो । अरे इस केएलडी (KLD) पर सरकार कम्पनियों को सबसीडी दे रही है इसलिए इनका नियंत्रण सरकार के पास है । हम कहा चलो ये भी मान लिया लेकिन ये केएलडी क्या है और इस पर सरकार क्यूँ सबसीडी दे रही है । मामू ने लगभग झल्लाते हुए कहा महाराज अपने खिलाये नमक का ज्यादे इम्तिहान मत लो । अरे यार केएलडी (KLD) मतलब केरोसीन, एलपीजी और डीजल और इसमें सबसीडी इसलिए दे रही है क्योंकि इसका उपयोग गरीब और किसान करते हैं ।
लेकिन हम भी ठहरे पक्के मारवाड़ी अपने कचौड़ी का पैसा वसूल किये बिना छोड़ने वाले नहीं थे भले ही दस रूपिया और इंवेस्ट हो जाय पर उँगली पूरी करेंगे । इसलिए चाय का आर्डर देते हुए पूछा अरे यार मामू ये बताओ जब इस देश का साठ परसेंट आदमी 32 रूपिया रोज कमाता है तो वो सिलेंडर और डीजल क्या खाक खरीदता होगा और रही बात किरोसिन की वो तो आजकल बहुओं को जलाने के ही काम आती है और ये हमें बेवकूफ मत बनाओं गरीब आदमी या तो गोबर के कण्डों से खाना बनाता है या फिर भूखे ही सो जाता है किरोसीन और डीजल बड़े बड़े उद्योगपतियों के कारखानों में या फिर पुरानी ट्रकों और बसों के टैंक में नजर आती है । और रही बात एलपीजी की तो आधी गैस तो मँहगी पेट्रोल कारों के डिक्की में इंधन सप्लाई करती नजर आती है ।
अब हमें मामू का चेहरा कैबिनेट की तरह नजर आ रहा था सो हमने मामू के उपर भड़ास तो खूब निकाली लेकिन एक फेसबुकिये दोस्त ने कहा वो सब मत लिखो क्योंकि ज्यादे लम्बे लिखोगे तो कोई पढ़ेगा नहीं और फिर बात निकलेगी तो फिर लेख में शब्द सर्वसाधारण के प्रयुक्त होने लगेंगे और कुछ मामू इसे अश्लील भाषा कह “A” सर्टिफिकेट घोषित करवाने के लिए घण्टा बजायेंगे इसलिए मामू को जो आपने आखिरी पंच मारा था वही लिख दे, समझने वाले समझ जायेंगे । हमने कहा ये भी ठीक है तो आखिरी पंच आप भी सुने और हमें विदा दें ।
हमने मामू से कहा अरे सुनो मामू इस सरकार से कहो कि ये केएलडी (KLD) पर सबसीडी का दिखावा बंद करे । या तो टैक्स कम कर पेट्रोल के दाम घटाये या फिर सबका दाम बढ़ाकर इस KLD में पेट्रोल का P भी घुसा ले ताकि ये पूरा केएलपीडी (KLPD) हो जाये जिससे आम जनता के प्रति उसका चरित्र भी सार्थक हो जायेगा ।

रविवार, 20 मई 2012

औसत का गणित


एक प्रसिध्द गणितज्ञ हुए । गणित की कई किताबें पढ़ी,शोध किया । फिर उन्होने औसत का सिध्दांत प्रतिपादित किया और प्रख्यात हुए । एक दिन अपनी पत्नी और तीन बच्चों के साथ वे किसी दूसरे गाँव की ओर जा रहे थे । रास्ते में नदी पड़ी । उन्होने अपने परिवार और किताबों को किनारे रख पानी की गहराई मापने नदी में उतर पड़े । कई स्थानों की गहराई मापी और किनारे पर वापस आ गये । दूसरे चक्र में स्वयं की, अपने पत्नी एवं बच्चों की उँचाई नापी एवं आँकड़ों से औसत उँचाई ज्ञात की । फिर नदी में पानी की गहराई के मापों का माध्य ज्ञात कर औसत गहराई निकाल दोनो औसतों की तुलना की और पाया कि उँचाई का औसत पानी की गहराई के औसत से काफी अधिक है ।

उन्होने अपनी पत्नी से कहा हमारी औसतन उँचाई नदी की औसतन गहराई से काफी ज्यादा है अत: नदी पार करने में डूबने का कोई खतरा नहीं है और वे नदी में उतर गये । नदी प्राकृतिक रूप से किनारों पर उथली थी और मध्य की ओर गहरी होती जा रही थी । मध्य में पहुँचते पहुँचते  अचानक पीछे से पत्नी ने आवाज लगाई छोटा लड़का डूब रहा है । गणितज्ञ पलटा । एक पल उसे लगा जैसे सारा जीवन व्यर्थ हो गया है, इसलिए नहीं कि बच्चा डूब रहा है बल्कि इसलिए कि उसके जीवन भर के शोध पर प्रश्न चिन्ह लग गया था । आघात बड़ा जबरदस्त था, लेकिन उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था अतएव बदहवासी में बच्चे को बचाना छोड़ किनारे की ओर दौड़ा और अपने गणना की जाँच करता हुआ बड़बड़ाने लगा ये हो ही नहीं सकता की मेरा शोध गलत हो । मुझसे गणना में कहाँ चूक हो गई ।  

लेकिन सत्य तो यही था कि न तो शोध गलत था ना ही गणना गलत थी । यदि कुछ गलत था तो केवल उसका अनुप्रयोग । जीवन के गणित और किताबी गणित में कोई मेल नहीं है । जीवन में हमेशा दो और दो का जोड़ चार नहीं होता । किताबें, शोध, मनीषियों की बातें, जिंदगी जीने में सहायता कर सकती हैं लेकिन केवल उन्ही के सहारे अगर जिंदगी जीयेंगे तो हालात वही होंगे जो उस बच्चे का मँझधार में हुआ । जिंदगी को किताबों से हटाकर देखा जाना चाहिए । बुध्दिजीविता मानसिक संतुष्टि दे सकती है, अहम को तृप्त कर सकती है लेकिन खाने को दाने, तन ढकने को कपड़े और सर पर छत नहीं दे सकती । अगर ऐसा होता तो दुनिया में जितनी किताबें है उससे हर गरीब के लिए चार जोड़ी कपड़े सिल गये होते, हर घर में अनाज का भण्डार होता और तो और केवल अखबारों से ही कई मकान बना लिये गये होते ।

बस्तर में फैला नक्सलवाद भी इसी जद में आता है । तथाकथित मानवाधिकारी और समाजसेवी इसे उचित ठहराने के लिए कभी शोषण के खिलाफ विद्रोह, कभी अधिकारों के लिए युध्द कह महिमा मण्डित करने का प्रयास करते रहें है । वास्तव में इसका उन गरीब आदिवासियों से कोई सरोकार नहीं है । सरोकार है तो केवल अपनी दुकानदारी चलाने का ।

यद्यपि इस प्रभावित क्षेत्र में कई मोर्चों पर प्रशासनिक विफलता है और बुनियादी सुविधाओं का अभाव है तथा इसके कारण ही नक्सलवाद पोषित हो रहा है, लेकिन ये कहना कि इस क्षेत्र के समग्र विकास के लिए, शोषितों के मूलभूत अधिकारों के लिए और शोषण और दमन के विरूध्द नक्सलवाद है, कम से कम उन लोगों के लिए बेवकूफी है जो जमीनी हकीकत से वाकिफ हैं । अगर सचमुच में ये शोषितों और आदिवासियों के हक के लिए लड़ रहें है तो फिर ये अपने ही मजलूम और निर्दोष आदिवासी की हत्या नहीं करते । ये सड़कों, स्कूल भवनों और अस्पतालों को क्षति नहीं पहुँचाते और सबसे बड़ी बात ये कि कम से कम बीमार स्कूली बच्चों को ले जा रही एम्बूलेंस पर तो गोली नहीं दागते ।

क्या ये अच्छा नहीं होता कि वे सभी सरकारी अधिकारी और कर्मचारियों को पूरे क्षेत्र में निर्बाध आने जाने देते और जो अपने कर्तव्यों का ठीक ढंग से निर्वहन ना कर रहा हो उसके खिलाफ कार्यवाही करते या आवाज उठाते । आज तक ऐसे कितने मौके आये हैं जब नक्सलियों ने भ्रष्ट और कामचोर अधिकारियों को प्रताड़ित किया है या उनकी जनअदालत में सुनवाई की है । कहीं ऐसा तो नहीं कि लाभ के हिस्से में उनका भी प्रतिशत तय हो ।